सारांश

यहाँ धरती पर जीवन के भिन्न भिन्न रूप पनप रहे हैं और हम – मनुष्य – धरती पर जीवन के विकसित होते इस कारवां के नेता हैं। इस पृथ्वी पर हमारा एक विशिष्ट स्थान होने के कारण,  हमारी न्याय की अवधारणा ही हम पर यह नैतिक जिम्मेदारी लाद देती है कि हम अपने प्रति – और सभी जीवों के प्रति – अपने व्यवहार को न्यायस॔गत बनाये रखने के विश्वास को कभी ना तोड़ें। यह बात हम पर एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी डाल देती है कि हम सदैव अपना व्यवहार हर तरह से उचित रखें।

हम इंसान हैं, समझदार हैं और यह अच्छी तरह से जानते हैं कि इस धरती पर हमारा वजूद केवल इसी लिये सम्भव बना हुआ है कि यहां धरती पर बहुत सी नाजुक भोगोलिक परिस्तिथियों मौजूद हैं। हमारी धरती इस अनंत ब्रह्माण्ड में एक विन्दु मात्र से ज्यादा कुछ नहीं है। हम यह भी यह जानते हैं कि इंसान धीमी गति से जीवन के विकास की यात्रा करता हुआ एक पशु ही है।लेकिन उसके पास सवाल करने की, उन सवालों के जवाब ढूंढने की और खोज करने की एक ऐसी ताकत मोजूद है जोकि पशु के पास नहीं है।

वास्तव में धरती पर हम सभी मनुष्यों का एक ही आदर्श है, एक ही लक्ष्य है और हम सबका एक ही अंतिम हश्र भी होगा। सवाल करने और उसका हल ढूंढ लेने की अपनी ताकत के बल पर ही अपनी विकास-यात्रा में आज हम एक ऐसे मुकाम पर पहुँच गए हैं जोकि गर्व करने लायक है। हमने टेक्नोलॉजी में आश्चर्यजनक दक्षता हासिल कर ली है। आज हम धरती से दूर दूसरे ग्रहों की यात्रा कर सकते हैं ; हम जीन में बदलाव करके जीवन की संरचना को बदल सकते हैं ; हम कृत्रिम बुद्धि – आर्टिफीसियल इंटेलिजेंस – बना सकते हैं ; और, हमारी यह भी ताकत है कि हम इस पृथ्वी पर से अपने अस्तित्व को ही मटियामेट कर दें और अपने साथ ही बाकि बचे जीवन के तमाम रूपों को भी नष्ट कर दें !

लेकिन यह एक बहुत बड़ी विडम्बना है कि बावजूद इसके कि हमारे पास चमत्कारी टेक्नोलॉजी है, हम बुद्धि का इस्तेमाल कर सकते हैं, खोज और आविष्कार कर सकते हैं – जिन खूबियों की वजह से हम जानवरों से अलग बन गए हैं – बहुत से मामलों में हम अभी भी  जानवर सरीखे ही हैं। अपने मन की गहराइयों में हम अभी भी मूल रूप से जानवर ही हैं। जानवरों की तरह ही हम अपने कार्य-कलापों में बहुत हद तक अक्लमंदी का थोड़ा बहुत इस्तेमाल करते हुए, अभी भी ‘अपना अस्तित्व बनाये रखने’ और ‘दूसरों पर अपना प्रभुत्व स्थापित करने’ जैसी नैशर्गिक प्रवत्तियों द्वारा ही नियंत्रित होते हैं।

दुर्भाग्यवश, हम लगभग हमेशा ही अपनी सोचने-समझने की ताकत को अपनी इन्ही नैषार्गिक प्रवत्तियों की मांग को पूरा करने में ही इस्तेमाल करते हैं। जानवरों की तरह ही, इन नैशर्गिक प्रवत्तियों के मूल से उपजे हमारे आपसी विरोध और झगड़े होते हैं। जानवरों की तरह ही, हम आपस में लड़ाई करते हैं – ऊपर से तुर्रा यह कि हम अपने दुष्टता से भरे इरादों को छुपाने के लिए यह ढकोसला भी करते हैं कि हमारा पक्ष न्यायसंगत है, जोकि जानवरों नहीं करते।

अपने हाथ में एक बहुत बड़ी ताकत रखने और रचना में अपने अंदर पाशविक प्रवत्तियाँ संजोये रखने की वजह से आज हम ताकतवर परन्तु खतरनाक जीव बन गए हैं। इस अजीब स्तिथी ने – कि अंदर हम जानवर सरीखे हैं और बाहर अपने आस पास की दुनिया को अपने वश में कर लेने की ताकत रखते हैं – आज हमें पूरी तरह से किंकर्त्तव्यविमूढ़ कर दिया है। हम इस स्तिथी में नहीं रह गए हैं कि हम यह निर्णय कर सकें कि इस ताकत का सही इस्तेमाल कैसे किया जाये। हमें इस बात का भी अंदाजा नहीं है कि हम सही रास्ते पर आगे कैसे बढ़ें। हम इस बात से पूरी तरह बेखबर हैं कि हमारा अस्तित्व जीवन के विकास की केवल एक अवस्था मात्र है और हमारे आगे अभी बहुत लम्बी यात्रा बाकि पड़ी है। आज हम मानव-जाति के भाग्य के कूच – उसके लक्ष्य की ओर यात्रा – में एक ऐसे चौराहे पर आ खड़े हुए हैं  जहाँ चौंधिया कर हम अपनी विकास-यात्रा में दिग्भ्रमित हो गए हैं।

हमारे अपने भले के लिए, हमारे सामने कई महत्वपूर्ण सवाल मुंह बाए खड़े हैं कि हम इस बात की गारंटी कैसे करें कि हम अपने ही हाथों आपस में युद्ध करके नष्ट न हो जाएँ ? हम अपनी टेक्नोलॉजी की ताकत – जैसे कि जीवन की रचना में उलट फेर कर देना, कृत्रिम अक्ल बना लेना , परमाणु के जोड़ और तोड़ से भयानक शक्ति  पैदा कर लेना, आदि – का अक्लमंदी से कैसे इस्तेमाल करें ? हम अपने दिमागी स्वास्थ्य को जीवन में दिनों दिन बढ़ते टेक्नोलॉजी के अतिशय उपयोग के खतरों से कैसे बचा सकते हैं ? हम जीवन में ख़ुशी और शांति की अपनी इच्छा को कैसे पूरा कर सकते हैं ? हम किस तरह से अपने आने वाले भविष्य का अन्दाज़ा लगा सकते हैं और अपने भाग्य निर्धारित लक्ष्य की ओर ठीक तरह से कैसे आगे बढ़ सकते हैं ?

हालाँकि हम इस बात का अंदाजा नहीं लगा सकते कि भविष्य में किस तरह की खोजें होंगी और उनका हमारे जीवन पर कैसा प्रभाव पड़ेगा, तो भी हम समझदारी अपनाते हुए इस बात के लिए अपने को तैयार कर सकते हैं कि उस पड़ने वाले प्रभाव से ठीक से कैसे निबटा जाए। हम एक नाजुक दौर में रह रहे हैं। एक तरफ तो, आज क्षितिज पर इस बात के संकेत मौजूद हैं कि हम एक ऐसे युग में प्रवेश कर रहे हैं जहाँ हमारी अकल्पनीय क्षमताएं होंगी और दूसरी तरफ, इस बात की बराबर संभावना बनी हुई है कि हम कभी भी खतरनाक कदम उठा सकते हैं।

मानव इतिहास के इस निर्णायक मोड़ पर, प्राचीन भारत की वाणी – और उतनी ही प्राचीन उसकी योग की विद्या – मनुष्य जाति को आगे बढ़ने के सही मार्ग को ढूंढ़ने में एक बार फिर से मदद कर सकती है। भारत की यह प्राचीन वाणी और उसकी प्राचीन योग विद्या अन्वेषण एवं तर्क-संगत आधार पर टिकी है।इसमे अन्धविश्वास और कटट्रपन के लिये कोई स्थान नही है और ना ही इसको धर्म की संकुचित सीमाऔं मे बांधा जा सकता है। हालाकिं यह कोई धर्म नही है, पर इसने दुनिया के बहुत सारे महान धर्मों को जन्म दिया है। यह मनुष्य जाति के विवेक की वाणी है। यह सबके सर्वोत्म भले के लिए है – जीवन के सबसे नीचे स्तर से लेकर उसके विकसित होते हुए सबसे ऊँचे स्तर तक सबके भले के लिए है। मनुष्य जाति की जिज्ञासाओं, भ्रमों, दुखों, दुविधाओं और अज्ञानता को प्रशंशनीय ढंग से सुलझाने में इस वाणी की महान  उपयोगिता  युगों-युगों के अनुभवों द्वारा जांची-परखी हुई है।

प्राचीन भारत के विवेक की यह वाणी और योग की टेक्नोलॉजी – विद्या – मानवीय जिज्ञासा और उनकी खोज बीन पर आधारित है। जिज्ञासा और खोज बीन हमारे लिए सत्य के ज्ञान के दरवाजे खोल देते हैं और हमारी तरक्की और विकास के ऊर्जा स्रोत्र बन जाते हैं। ज्ञान हमें जानवरों से भिन्न बना देता है। अन्वेशण – खोज बीन – करके ही हम वह सब ढूंढ पाते हैं जो हमे स्पष्ट दिखाई देता है – यानि  वह जो भौतिक पदार्थ है और स्पष्ट है – और वह भी जो स्पष्ट नही है – यानि वह जो इस स्पष्ट भौतिक पदार्थ से परे है। खोज बीन और ज्ञान का मार्ग भौतिक जगत से होकर ही उन सच्चाइयों तक जाता है जो भौतिक जगत से परे हैं।

हमारे लिए बिना गलती किये आगे बढ़ने का केवल एक ही मार्ग है: खोज बीन करना – ऐसी खोज बीन करना जो अपने सार में गहरी हो! हम जानवरो से इतने अधिक ऊँचे स्तर पर आज केवल इसीलिये है कि हम सारगर्भित सवाल कर सकते हैं और उन सवालों के उत्तर पाने के लिए खोज बीन कर सकते हैं। हम केवल इसीलिए ही भौतिक सुख सुविधाऐं  हासिल कर सके हैं – और उन सुख सुविधाओ पर आधारित अपनी आधुनिक सभ्यता स्थापित कर सके हैं – क्योंकि हम सवाल कर सकते हैं और उन सवालों का जवाब ढूंढने के लिये अपना दिमाग लगा सकते हैं।

लेकिन हमारी खोज बीन करने की प्रवत्ति हमे उन सुख सुविधाओ मे ही संतुष्ट बने रहने नही देती, जो हमने हासिल कर ली हैं। सुख सुविधाओं के बावजूद बना रहे वाला हमारा असंतोष, और भी अधिक जानने की हमारी जिज्ञासा और हमारे अंदर बहुत गहराई मे छिपी आगे बढने की एक प्रेरणा – एक केन्द्रीय सचेतन पुन्ज – हमें लगातार इस बात के लिये उकसाता रहता है कि हम अपनी खोज मे और भी आगे बढें और इस विश्व के अंतिम सत्य को और इस विश्व मे अपने अस्तित्व के सत्य को जानें। आज जब हम यह जानते है कि इस विश्व मे सभी चीजें ‘स्थान’ और ‘समय’ में स्तिथ हैं तो फिर हम इस बात की संभावना को भी बखूबी देख सकते है कि सभी चीजें इस विश्व में न केवल ‘स्थान’ और ‘समय’ में ही स्तिथ हों, बल्कि ‘स्थान’, ‘समय’ और ‘चेतना’ में भी स्तिथ हों। यह एक ऐसी संभावना है जिसकी ओर आधुनिक विज्ञान केवल संकेत भर कर रहा है और जिसकी सच्चाई को योग का विज्ञान पूरी मजबूती के साथ घोषित करता है।

योग घोषणा करता है कि इस विश्व में एक कण भी ऐसा नहीं है जो जीवन न हो – एक ऐसा जीवन जो या तो प्रकट रूप में मौजूद हो या फिर जीवन के संभावित रूप में मौजूद हो। वास्तव में, इस विश्व में जो कुछ भी आज मौजूद है – जीवन समेत – वह एक संभावना के रूप में सदा से ही मौजूद रहा है – यानि एक सुप्त अवस्था के रूप में मौजूद रहा है। लेकिन यह तो एक सिद्धांत भर – शब्दों का जाल भर – है; फिर वह कौन सी कसौटी है जिस से यह गारंटी हो कि यह कथन वास्तव में सत्य है ?

किसी कथन की सत्यता को परखने की – चाहे वह कथन आधुनिक विज्ञान द्वारा घोषित किया गया हो या फिर प्राचीन योग द्वारा घोषित किया गया हो – एक ही कसोटी है : उस कथन में यह योग्यता होनी चाहिए कि वह भविष्य में होने वाली ‘घटना’ को पहले से बता दे। जैसे ही वह घटना उसी रूप में घटित होती है वैसे ही उस कथन की सत्यता की पुष्टि हो जाती है। जैसे विज्ञान भविष्य में घटने वाली घटनाओं की सही सही भविष्यवाणी कर देता है, वेसे ही योगी लोग भी भविष्य में होने वाली घटनाओं की सही सही भविष्यवाणी कर देते हैं। लेकिन दोनो की विधियों में एक फर्क है: जहां वैज्ञानिक लोग  प्रयोगशाला की ‘नियंत्रित शर्तों’ के ही आधीन होने वाली भविष्य की घटनाओं की भविष्यवाणी करते हैं; वहीं योगी लोग आंतरिक रूप में अपने आप को पूरी तरह बदल कर खुद ‘मानव प्रयोगशाला’ बन जाते हैं और इस ‘अनंत विश्व की अनंत शर्तों’ के आधीन होने वाली घटनाओं की भविष्यवाणी करते हैं !! दोनों के बीच केवल यही अंतर है।

योग स्वयं को सम्पूर्ण रूप में परिवर्तित कर देने का एक विज्ञान  है और योगी एक तरह के तकनीकी विशेषज्ञ ही हैं। स्वयं को योग के द्वारा सम्पूर्ण रूप से परिवर्तित कर लेने पर व्यक्ति को एक नया जन्म लेने जैसे जाग्रति होती है। ऐसे योगी लोगों का यह कथन है कि इस स्पष्ट भौतिक जगत के पीछे एक और सचेतन अधिभौतिक जगत भी है। वे बताते हैं कि वास्तव में, एक व्यक्ति का ‘मैं’ उसकी चेतना के बहुत सारे स्तरों  – तहों – से मिल कर बना होता है। ये स्तर  इस भौतिक जगत के पीछे छुपे हुए अधिभौतिक जगत से ऐसे ही अनेक आयामों से जुड़े रहते हैं जिनके बारे हम सचेतन नही होते। हजारों साल पहले योग द्वारा दिए गए इस ज्ञान के मुकाबले में, सिग्मंड फ्रायड द्वारा हाल में ही स्थापित यह वैज्ञानिक खोज कि हमारी चेतना मन के तीन स्तरों – जाग्रत मन, अवचेतन मन और अचेतन मन – से बनी है, महत्ता में एक बहुत ही छोटी सी खोज है। योग हमें बताता है कि इस भौतिक जगत में घटने वाली हर घटना, यहाँ प्रकट होने से पहले अधिभौतिक जगत में आकार लेती है। उस अधिभौतिक दुनिया से जुड़े रहने के कारण ही, योगी इस भौतिक जगत में होने वाली हर घटना की ‘सही भविष्यवाणी’ कर देते हैं और, यदि उचित हो तो, वे उन घटनाओं को इस भौतिक जगत में घटित होने से रोक भी देते हैं। किसी व्यक्ति की मृत्यु तक को योगी लोग टाल सकते हैं। भारत मे इस तरह की घटनाऔं के बहुत सारे उदाहरण मिल जाते हैं।

योग एक ऐसा विज्ञान है जो हमें उस अधिभौतिक जगत की सच्चाइयों से सम्बन्ध स्थापित करने में सक्षम बनाता है और उस जगत के गूढ़ रहस्यों के दरवाजे हमारे लिए खोल देता है।योग की टेक्नोलॉजी, सनातन – सदैव – कायम रहने वाले इस विश्व में, हमारे अपने अस्तित्व के भी सदैव ही बने रहने के बारे में हमें सचेतन बना देती है। योग हमें इस भौतिक जगत में अपने जीवन का सर्वोत्तम भला – कल्याण – हासिल करने में सक्षम बना देता है। योग भारत की सभ्यता का आधार है। योग पर आधारित यह सभ्यता प्रकृति के हर हिस्से को एक ‘सोये हुए जीवन’ की तरह देखती है। योग की द्रष्टि से यह सारी प्रकृति एक पवित्र सत्ता है और इसके साथ किसी भी तरह की अनुचित छेड़ – छाड़ पूरी तरह मना है।

योग का मनुष्य के मन पर इतना गहरा प्रभाव पड़ता है कि इसकी शिक्षा मानव-व्यवहार को उसकी अपनी बेहतरी के लिए पूरी तरह बदल डालती है। योग-विज्ञान मे इतनी ताकत है कि इसकी शिक्षा हमारे व्यक्तिगत और सामूहिक व्यवहार में और हमारी आर्थिक व सामाजिक संस्थाओं में आमूल चूल बदलाव ला सकती है। यह शिक्षा आज की हमारी आर्थिक और सामाजिक ज्वलंत समस्याओं का बहुत अच्छे से समाधान कर सकती है। इंसानी जिंदगी के सबसे प्रिय लक्ष्यों – ख़ुशी  और शांति – की प्राप्ति के मामले में भी, योग की शिक्षा आधुनिक विज्ञान और उसके द्वारा प्रदान किये जाने वाले भौतिक सुख-सुविधाओं के मुकाबले में कहीं अधिक बेहतर परिणाम देने की क्षमता रखती है।

इंसानी-समाज स्व-नियंत्रण पर आधारित होता है, जो हमारे समाज को जानवरों के समाज से भिन्न किस्म का बनाता है। इस तरह के मर्यादित समाज में व्यतीत होने वाला हमारा जीवन ही हमारी सभ्यता है। हमारी सभ्यता, हमारे कुछ साझा मूल्यों पर आधारित है। हमारी सभ्यता हमारी सामूहिक चेतना की एक विशिष्ट स्तिथि का केवल एक बाहरी रूप – प्रकटीकरण – भर है। यह हमारी आन्तरिक सच्चाई – हमारी सामाजिक चेतना की एक आंतरिक स्तिथि – का एक बाहरी प्रतिबिम्ब मात्र है। आज की हमारी विश्व-व्यापी सभ्यता भी, हमारी सामूहिक आंतरिक मनोस्तिथि – हमारे अस्तित्व की एक विशेष आध्यात्मिक स्तिथि –  का ही एक प्रतिबिम्ब है। इस तरह से हमारी सभ्यता, हमारे आंतरिक आध्यात्मिक विकास का एक बाहरी पैमाना है। पृथ्वी पर जीवन का विकास – जैविक और आध्यत्मिक दोनों ही विकास – एक सतत चलने वाली प्रक्रिया है, जो समय बदलने के साथ साथ हमारी सभ्यता को भी लगातार परिवर्तित करती रहती है।

जीवन के ‘क्रमिक-विकास’ का हमारी पृथ्वी पर आज एक ही एजेंडा है: हमारी चेतना के स्तर को जिस सतह पर वह आज है, उससे एक सतह और ऊपर उठाया जाये और उस उपलब्धी को हमारे सामूहिक जीवन – हमारी सभ्यता – में प्रकट किया जाये। आज हम बौद्धिक चेतना के उस स्तर पर अपना जीवन जीते हैं, जो स्तर जानवरों की चेतना से एक सतह ऊंचा है।जीवन के ‘क्रमिक-विकास’ का पृथ्वी पर एजेंडा यह है कि मनुष्यों को एक ‘जाति’ के तौर पर उनकी आंतरिक मनोवैज्ञानिक रचना को एक अगले और ऊँचे स्तर तक उपर उठाया जाये। जाहिर है कि क्रमिक विकास की वह अवस्था – चाहे वह अवस्था जब भी मनुष्यों को हासिल हो – निश्चित तौर पर आज की हमारी बौद्धिक चेतना से गुणात्मक रूप में ऊंची होगी, ठीक जिस तरह से आज हमारी चेतना जानवरों की चेतना से गुणात्मक रूप में ऊँची है।

ऐसा होने के बाद, तब फिर नयी प्राप्त की गयी वह चेतना हमें भौतिक जगत से परे स्तिथ अधिभौतिक जगत की उन सच्चाइयों से जोड़ देगी जो बिल्कुल स्पष्ट दिखने वाले इस जगत के पीछे आज रहस्यपूर्ण ढंग से छुपी हुई हैं। यह सब हमारे लिए उन बहुत सारे रहस्यों के दरवाजे खोल देगा जो मनुष्य-जाति को आदिम युग से आश्चर्यचकित करते आये हैं।मनोवैज्ञानिक रूप से हमारा यह पूर्ण परिवर्तन – रूपांतरण – सबसे ज्यादा हमारी सभ्यता में ही परिलक्षित होगा – एक ऐसी नयी सभ्यता के रूप में जो अति-महत्वपूर्ण मामलों में हमारी वर्तमान सभ्यता से कहीं बेहतर होगी। हमारी अक्ल और समझदारी हमें यह कहती है कि हमें इसका ज्ञान प्राप्त करना चाहिए; इस ज्ञान को हमें अपने सामूहिक जीवन का हिस्सा बनाना चाहिए ; और इसमें निहित सम्पूर्ण संभावनाओं का अपने फायदे के लिए उपयोग करना चाहिए।

यह हमारी व्यक्तिगत और सामूहिक जिम्मेदारी है कि हम इस क्रम-विकास की आगे बढ़ने वाली गति के बारे में जानें और इसके लक्ष्य को हासिल करने में मदद करें। इसका ज्ञान हमें समझदार बनाता है। इसकी जानकारी हमें आगे बढ़ने, प्रगति करने और हमें अपनी भवितव्यता की ओर सुरक्षित और बेहतर ढंग से कदम बढ़ाने में हमारी मदद करती हैं। क्रम विकास के इस एजेंडे को ध्यान में रखते हुए, हम इस बात के लिए अपने को बाध्य पाते हैं कि हम अधिक से अधिक ज्ञान प्राप्ति की कोशिश करें, सबसे साथ न्याय की स्तिथि का साथ दें, आपसी सौहार्द और विश्व शांति की तरफदारी करें।  इसका मतलब है कि हम अज्ञान के खिलाफ युद्ध में अक्ल और ढूंढ-भाल की प्रवत्ति का साथ दें; कि हम सबको न्याय की प्राप्ति के संघर्ष में निष्पक्षता का साथ दें; कि हम सौहार्द कायम करने में आपसी समझ और सम्मान का साथ दें; कि हम विश्व शांति कायम करने में आपसी झगड़े और विरोध की संभावना को कम करने में मदद करें।

इंडियन पीपुल्स कांग्रेस का जीवन और मिशन, सभी तरह के देश, धर्म, जाति या  विचारधारा के भेदभावों से ऊपर उठ कर, मानव जाति के विकास-क्रम के इन्ही  लक्ष्यों  को  हासिल करने के लिए समर्पित है। इंडियन पीपुल्स कांग्रेस अपनी सभी गतिविधियों में केवल और केवल इन्फार्मेशन टेक्नोलॉजी की ताकत पर ही निर्भर करती है। इस काम में, यह उन सभी राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक ताकतों से आपसी सहयोग की पालिसी अपनाती है, जो भारत में और भारत के बाहर भी इन्ही लक्ष्यों की पूर्ती के काम में लगी हुई हैं।
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