स्वागत-शब्द

इंडियन पीपुल्स कांग्रेस – जैसा इसके नाम से ही प्रतीत होता है – एक राजनैतिक पार्टी है।

भारत में पहले से मौजूद राजनैतिक पार्टियों की इस भीड़ में, एक और पार्टी बनाने की आखिर क्या जरूरत थी ?

किसी भी सवाल का जवाब, किसी दृष्टिकोण से दिया हुआ जवाब ही होता है। इस दुनिया में चीजों को समझने और देखने के बहुत सारे द्रष्टिकोण मौजूद हैं। आओ, हम इस सवाल का जवाब देने से पहले दृष्टिकोण के बारे में बात करें।

एक व्यक्ति के द्रष्टिकोण से, उस व्यक्ति के सारे सरोकार और समस्याएं उसके जन्म से आरम्भ होती हैं और उसकी मृत्यु पर समाप्त हो जाती हैं। लेकिन उन लोगों के द्रष्टिकोण से, जो मरने वाले के बाद पीछे रह गए हैं और धरती पर जिन्दा बचे हुए हैं, उनके अपने सरोकार और समस्याएं बरकरार बानी रहती हैं। ये जीवित लोग ‘समाज’ कहे जाते हैं। ‘समाज’ अपनी ऊम्र में – जीवन की तरह ही – प्राचीन काल से इस धरती पर सनातन है, सदा रहने वाला है। सामूहिक जीवन – समाज – लोगों से यह अपेक्षा रखता है कि वे समाज के सरोकारों और समस्याओं पर ध्यान दें।

जो लोग अपनी अंतर-आत्मा की आवाज का ज़रा सा भी ख्याल करते हैं उनके लिए एक राजनीतिज्ञ जैसा जीवन जीना कोई अच्छा अनुभव नहीं होता। वास्तव में, राजनैतिक जीवन किसी भी व्यक्ति को सार्वभौम नैतिक मूल्यों के सबसे नीचे स्तर पर ले जाता है – उसे पतित कर देता है। किसी भी भले व्यक्ति के लिए एक राजनीतिज्ञ की तरह जीवन जीना मनोवैज्ञानिक दृष्टि से सबसे खराब स्थिति है। एक राजनीतिज्ञ को – अपनी परिस्थितियों की मजबूरी के कारण – जहाँ उनका काम आसान होता हो झूठ बोलने और जहाँ जरूरी हो सच्चाई को छुपाने के लिए अपने आप को जानबूझ कर तैयार करना पड़ता है। नैतिक मूल्यों पर आधारित एक विवेकी आदमी के जागरूक जीवन के दृष्टिकोण से, जानबूझ कर झूठ बोलना अपनी अंतरात्मा के साथ सबसे बड़ा विश्वासघात होता है।

लेकिन इतना सब होने के बावजूद भी, राजनीति – जो एक सामाजिक औजार है – मानव समाज को बदलने का सबसे ताकतवर और असरदार हथियार है। जिस कठोर और निर्दयी दुनिया में हम रहते हैं वहाँ चाह कर भी हम राजनीति से दूर नहीं रह सकते। हमें किसी ना किसी तरह इसका बोझ ढोना ही पड़ता है; जरूरत केवल इस बात की है कि हम इस सामाजिक औजार को अपनी अक्लमंदी से ठोकपीट कर सुधारें – इसे सधाएँ – और इसे सम्पूर्ण मानव जाति की भलाई के लिए इसकी आश्चर्यजनक ताकत का भरपूर इस्तेमाल करें।

इंडियन पीपुल्स कांग्रेस इसी लक्ष्य की ओर उठाया गया एक कदम है – एक प्रयास है। इस लक्ष्य – इस मंजिल – को हासिल करना कोई आसान काम नहीं है; कार्य-क्षेत्र के मामले में यह लक्ष्य एक बहुत बड़े विस्तार वाला – बहुत बड़ा – काम है, जिसके लिए एक संगठित जन-संपर्क स्थापित करने, जनता से लगातार संवाद कायम रखने और आम लोगों की इस कार्य में भागेदारी सुनिश्चित करने की जरूरत होती है। लेकिन यह आधुनिक प्रजातंत्र का दुर्भाग्य ही है कि इस तरह की जन-गतिविधियां करने के लिए – यानि राजनीति करने के लिए – कोई भी आदमी आम जनता तक करोड़ों – अरबों रूपया खर्च किये बिना नहीं पहुँच सकता।

लेकिन इस तरह का अकूत धन सभी लोगों को आसानी से प्राप्त होने वाली चीज नहीं है। क्योंकि राजनीति का सीधा सम्बन्ध राजसत्ता प्राप्त करने से होता है, जहाँ इतना अधिक धन और सुख सुविधाएँ हासिल करने के अवसर ही अवसर मौजूद रहते हैं, इसलिए राजनीति में सभी तरह के लोगों की भीड़ लगी रहती है। राजनैतिक नेताओं की इस भीड़ में हमेशा ही जबरदश्त आपसी मुकाबला चलता रहता है। आपसी  मुकाबले में, धन के इस अम्बार को जुटा कर अपने प्रतिद्वंदी को हर हाल में हराने की जुगत में ही, राजनीति और सरकारी संस्थाओं में हर किस्म के घोटालों और भ्रष्टाचार का जन्म होता है। इस समस्या को और भी अधिक गंभीर बनाते हुए, राजनीति में बहुत सारे ऐसे लोग भी घुस जाते हैं जिनका चरित्र और नैतिकता घटिया दर्जे के होते हैं और जिनका मकसद सिर्फ धन-संपत्ति इकठ्ठी करना और विशिष्ट लोगों की तरह मजे लूटना होता है, जिसके बहुत सारे अवसर सार्वजनिक जीवन में उपलब्ध रहते हैं। सार्वजनिक जीवन में ऐसे लोगों की मौजूदगी, धन और भ्रष्टाचार के एक ऐसे दुष्चक्र को जन्म देती है जहाँ ऐसे आम लोगों के लिए कोई जगह नहीं बचती जो सार्वजनिक जीवन में बिना धन के अच्छे इरादों के साथ आना चाहते हों। खासतौर से, भारत में तो ऐसा ही है जहाँ आम जनता ज्यादा पढ़ी लिखी नहीं है और जातियों और धर्मों के नाम पर बंटी हुई है। भारत में “अपना राज” – “खुद मुख्त्यारी” – की अभी तक की यही कहानी है।

सौभाग्यवश, आज इनफार्मेशन टेक्नोलॉजी धन की ताकत को चुनौती देने और उसे हराने के लिए उस आम आदमी के हाथ में एक वरदान की तरह आ गयी है, जिस आदमी के पास कोई धन नहीं है। एक उच्चतर लक्ष्य की पूर्ती हेतू आम जनता तक अपनी पहुँच बनाने के लिए  इंडियन पीपुल्स कांग्रेस इनफार्मेशन टेक्नोलॉजी की केवल इसी ताकत के भरोसे है – इसी इनफार्मेशन टेक्नोलॉजी पर पूर्णतया निर्भर है, आश्रित है।

स्पष्ट तौर पर, इंडियन पीपुल्स कांग्रेस क्या चाहती है ? कम शब्दों में, हम कह सकते हैं कि अपनी विहंगम सोच में इंडियन पीपुल्स कांग्रेस जीवन की द्रष्टि से क्रम-विकास की सोच रखती है और समाज की द्रष्टि से क्रांतिकारी विचार है।

हम यह कैसे कह सकते हैं कि जीवन की द्रष्टि से यह क्रम-विकास वादी है ? आओ हम इसको देखें। मानव जाति अभी भी राष्ट्रों, धर्मों, मूल उद्भव और राजनैतिक विचारधाराओं के आधार पर बंटी  हुई है, यह हम जानते है। लेकिन, इस स्पष्ट से दिखने वाले इन केवल ऊपरी – सतही – विभागों में बंटे होने के बावजूद भी, सम्पूर्ण मानव जाति का सर्वोपरि हित – केंद्रीय हित – मौलिक रूप में एक ही है। मानवजाति का यह सर्वोपरि – केंद्रीय – हित क्या है ?

हम यह जानते है कि इस पृथ्वी ग्रह पर मानव जाति क्रमिक विकास करती हुई “होमो सेपियन्स” (मनुष्य) के रूप में आ जाने के बाद भी उनका यह क्रमिक विकास रुक नहीं गया है। माववजाति के सर्वोपरि हित इसी बात में हैं कि वह क्रमिक-विकास की इस सच्चाई को खुले आम स्वीकार करे, इस विकास प्रक्रिया के लिए – जो भी कदम उठाने जरूरी हों उन्हें उठाने में – मदद करे और इस विकास प्रक्रिया को  बिना गलती किये और तेजी से आगे बढ़ाये।

मानवजाति की इस विकास प्रक्रिया में उसके “जैविक विकास” और “आध्यात्मिक विकास” दोनों ही आयाम मौजूद हैं। जीवों की विभिन्न जातियों को सदैव जिन्दा रख कर और उस जातियों को एक से एक बेहतर बना कर प्रकृति जैविक विकास की इस प्रक्रिया को पूरा करती है, लेकिन उनका आध्यात्मिक विकास इस जैविक विकास तक ही सीमित नहीं होता। यह जीव विज्ञान से आगे बढ़ कर मनोविज्ञान तक पहुंचता है – और मनोविज्ञान से भी आगे बढ़ कर जीवन की चेतना के उस आयामों तक, उस स्तरों तक, जाता है जिनकी जानकारी अभी भी हमारे विज्ञान को नहीं है। एक प्रबुद्ध जीव होने के नाते, हम इंसानों को उस कल के लिए भी कुछ गुंजायश छोड़ रखनी चाहिए जो हमारे लिए आज नामालूम – अज्ञात – बने हुए है, और यदि इस मामले में – इस चुनाव में – हमसे कोई गलती भी होती हो तो वह गलती भी हमें सही दिशा में ही करनी चाहिए।

इस बारे में शक या संदेह की कोई गुंजायश नहीं है कि यह भौतिक जगत और इसके तमाम भौतिक संसाधन, मानवजाति के इस जैविक और मनोवैज्ञानिक विकास – आध्यत्मिक विकास – के केवल “साधन” मात्र हैं। हम कह सकते हैं कि जहाँ एक ओर इंसानों के जैविक विकास की प्रक्रिया इन्हीं “कुदरती भौतिक संसाधनों” के बल पर आगे बढ़ती है, वहीँ दूसरी ओर इंसानों के आध्यात्मिक विकास की प्रक्रिया “मानव निर्मित सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक संस्थाओं” के माध्यम से आगे बढ़ती है, जो संस्थाएं समय बदलने के साथ  हमारी सभ्यता के द्वारा जरूरत के मुताबिक नए नए रूपों में गढ़ी जाती रहती हैं और सुधार कर बेहतर बनाई जाती रहती हैं।

मानवजाति की अक्लमंदी इसी बात में है कि वह इन साधनों को क्रम विकास के परिपेक्ष्य – सन्दर्भ – में समझे और उन संसाधनों को विकास के इन दोहरे स्वरूपों के लिए सही उपयोग करे। मूल्य निर्धारण करने के हमारे सभी सन्दर्भ – चाहे वे जितने भी सार्थक लगते हों – क्रमिक-विकास की तुलना में वे सभी (सन्दर्भ) हमारे अपने निजी स्वार्थ भर हैं, वे अंदाजे में मनमाने हैं और मनुष्यों की सर्वोत्तम भलाई की बाबत कीमत में बहुत ही घटिया दर्जे के हैं।

हमें अपने इतिहास में मानवीय क्रम-विकास की इस गति को अबाध बनाये रखने और उसका सतत संवर्धन करते रहने के लिए, इस बात की बार बार जरूरत पड़ती है कि हम क्रम-विकास के इन साधनों के “इस्तेमाल के स्वरुप” को बदलें, पुनः बदलें और लगातार बदलते रहें, ताकि ये साधन हमारे क्रम-विकास के सर्वोपरि हित की सेवा में अच्छी तरह काम आ सकें और हमारे सर्वोत्तम भले के लिए अच्छे से अच्छे ढंग में इस्तेमाल होते रहें।

दुनिया का यह विकासवादी-द्रष्टिकोण, हमारी जानने की उत्सुकता, ज्ञान अर्जित करने और नए नए अन्वेषण करने की प्रवत्ति को सबसे अधिक महत्वपूर्ण समझता है। एक तरफ तो यह द्रष्टिकोण हमारी इस जरूरत पर बल देता है कि हम बार बार बदलाव लाते रहें – ऐसे बदलाव जो हमारे द्वारा अर्जित हुए नए ज्ञान की रोशनी में किये गए हों; ऐसे बदलाव जो हमारे द्वारा हासिल किये गए अन्वेषणों की रोशनी में किये गए हों; ऐसे बदलाव जो सम्पदा – कुदरत द्वारा प्रदान की गई सम्पदा और मनुष्यों द्वारा पैदा की गई सम्पदा – दोनों – के हमारे आपसी बंटवारे के बारे में हों; ऐसे बदलाव जो इस सम्पदा के सभी के द्वारा उपभोग किये जाने के बारे में हों। दूसरी तरफ, यह द्रष्टिकोण हमारी इस जरूरत पर बल देता है कि हम बिना रुके बदलाव लाते रहें – ऐसे बदलाव जो हमारी सामाजिक संस्थाओं में हों; जो बदलाव उन संस्थाओं में मनुष्यों के आध्यात्मिक लाभ के लिए हों; जो बदलाव उन सामाजिक संस्थाओं में इस हिसाब से हों कि सम्पदा के आपसी बंटवारे के मामले में वे एक से एक बेहतर रूप में हों।

इंसानों में पाए जाने वाली हर चीज को जानने की उनकी उत्सुकता, ज्ञान प्राप्त करने की उनकी प्रवत्ति और नए अन्वेषण करने की उनकी इच्छा की वजह से ही हम विज्ञान और टेक्नोलॉजी के रूप में आज उनके मीठे फल चख रहे हैं, जिन्होंने मानवजाति को बड़ा फायदा पहुंचाया है और सुविधाएं प्रदान की हैं। एक तरफ तो, वैज्ञानिक ज्ञान और टेक्नोलॉजी द्वारा मनुष्यों को दिए गए औजार उनकी रोजमर्रा की जिन्दगी को उसकी नियति गढ़ने में निर्णायक लाभ और सुविधाएं देते हैं और इस तरह से उनके जैविक विकास की रफ़्तार को और भी अधिक तेज करने में मदद करते हैं। वहीं दूसरी तरफ, मनुष्यों की सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक और सांस्कृतिक संस्थाऐं उनके आध्यत्मिक विकास को और भी आगे बढाने में बहुत बड़ा रोल अदा करती हैं।

मानव इतिहास की लम्बी यात्रा हमें यह सिखाती है कि कुदरत की यही मंशा है कि मानवजाति की उत्सुकता, ज्ञान और अन्वेषण के ये मीठे फल मानवजाति के हर एक सदस्य तक पहुँचे; और इस तरह से, मनुष्य – एक जाति के रूप में – विकास क्रम की सीढ़ी पर एक और कदम ऊपर चढ़ जाएँ।

लेकिन, हमारे अपने समय के सन्दर्भ में, हम यह पाते हैं कि आज एक तरफ तो इंसानों की मेहनत और प्रयास के ये मीठे फल आम लोगों के बहुत बड़े वर्ग तक पहुंचने का इंतजार कर रहे हैं और दूसरी तरफ, मानवजाति की सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक और सांस्कृतिक संस्थाऐं उनके आध्यत्मिक विकास में और आगे बढ़ने के रास्ते में रूकावटें डालने लगी हैं। पहली वाली कमी को दूर करने के लिए इस बात की जरूरत पड़ती है कि हम सम्पदा-वितरण की व्यवस्था को फिर से नए नए रूपों में गढ़ें ताकि यह सम्पदा-वितरण और भी बेहतर हो जाये; यह सम्पदा-वितरण और ज्यादा न्याय संगत बन जाये; और इंसानों की साझा मेहनत के ये मीठे फल हर एक आम आदमी तक आसानी से पहुँच जाएँ। दूसरी कमी को दूर करने के लिए इस बात की जरूरत पड़ती है कि हम अपनी इन सामाजिक संस्थाओं को फिर से नए नए रूपों में गढ़ें ताकि ये संस्थाएं और बेहतर हो जाएँ और मनुष्यों के लिए, उनके और आगे आध्यत्मिक विकास करने के मामले में, उनकी जरूरतों के अनुकूल बन जाएँ। आज के समय में हम इन दोनों उद्देश्यों को कैसे हासिल कर सकते हैं ?

आज हम एक विवेकशील युग में रहते हैं और प्रजातंत्र की राजनैतिक संस्था द्वारा अपने आप को संचालित करते हैं ताकि हम यह सुनिश्चित कर सकें कि वहां आम जनता के ऐसे बहुमत का शासन कायम हो जिनकी अन्तर्निहित लालसा हमेशा अपनी स्वतंत्रता और आज़ादी बनाये रखने की होती है। परन्तु, आम लोगों का वह बहुत बड़ा हिस्सा – जिसे प्रजातंत्र में हम जनमत या बहुमत कहते है – कई वजह से इस काबिल नहीं होता कि वह मानवजाति की प्रगति-यात्रा के मामले में उसका नेतृत्व कर सके। प्रकृति का काम करने का तरीका ही कुछ ऐसा है कि इस विशालकाय मानवजाति में से उसका केवल एक छोटा सा हिस्सा – एक छोटा सा टुकड़ा, दल या झुंड  – भर ही इस इस विशालकाय मानवजाति के आगे बढ़ने में उसका नेतृत्व करता है।

जहाँ मानवजाति का यह विवेकशील अल्पमत, विकास-क्रम में उसके आगे बढ़ने में नेतृत्व करता रहता है, वहीं औसत दर्जे के लोग – जो मानवजाति का बहुमत होते हैं – उस कूच-यात्रा में पीछे छूटते चले जाते हैं, पिछड़ते चले जाते हैं। लेकिन पीछे छूटने वाला मानवजाति का यह झुंड प्रकृति का  एक  बहुत जरूरी काम – गलती सुधारने का काम – पूरा करता है: औसत दर्जे के मनुष्यों का यह मानवीय भार, नेतृत्व करने वाले लोगों के आगे बढ़ते हुए कदमों को पीछे की ओर खींच लेता है; कुछ समय के लिए उनकी आगे बढ़ने वाली गति में रूकावट डाल देता है और मानवजाति के उस चमकते सितारों के उन गलत कदमों को सुधार देता है जो उन्होंने अनजाने में या बिना सोचे समझे आगे की ओर बढ़ा दिए हों।

यह प्रकृति द्वारा किया गया सुधारने का काम है; इस सुधारने के काम से यह सुनिश्चित हो जाता है कि मानवजाति की कूच-यात्रा द्रढ़ता के साथ आगे की ओर बढ़ती रहे, भले ही वह धीमी गति से आगे बढे।

यही वजह है कि हमारे विकास-क्रम की रफ़्तार एक धीमी प्रक्रिया है, इतनी धीमी कि इस विकास का शताब्दियों – बल्कि हजारों साल – में मुश्किल से ही हमें आभास हो पाता है। इस मामले में, पहले सारी मनुष्यजाति में से केवल बहुत थोड़े से ही विवेकशील लोग आगे की ओर कदम बढ़ाते हैं, और फिर प्रकृति उनके तेजी से आगे बढ़ते हुए कदमों में रुकावट डाल देती है ताकि मानवजाति का बाकी बचा औसत लोगों का झुंड भी आगे की ओर बढ़ सके और नेतृत्व करने वाले लोगों के साथ कदमताल कर सके।

विकास क्रम की इस धीमी गति का यही कारण है।

औसत मानवजाति की यह पिछड़ी हुई हालत, बहुमत की जन इच्छा – जनमत – के रूप में दिखाई पड़ती है, जोकि आधुनिक युग में प्रजातंत्र की राजनैतिक संस्था के रूप में स्थापित की गयी है। लेकिन प्रजातंत्र की यह सामाजिक संस्था इंसानों द्वारा ही चलाई जाती हैं और इस संस्था में वे सभी खामियां मौजूद हैं जो खामियां इंसानों में कुदरती तौर से मौजूद रहती हैं, और जो खामियां समय के उस दौर की कमी के कारण होती हैं जिस दौर में वे इंसान रहते हैं। प्रजातांत्रिक व्यवस्था के आधुनिक रूप की खोज एक नयी चीज की रचना थी और इन दो-मुखी सीमाओं के रहते हुए इस व्यवस्था ने अभी तक अच्छा काम किया है। लेकिन विकास क्रम में आगे की ओर बढ़ते कदम किसी भी बिंदु पर आकर ठहर नहीं जाते। अब यह प्रजातान्त्रिक व्यवस्था समय के बढ़ते कदमों से पिछड़ गई है। इसमें बदलाव की जरूरत है।

सूचना-टेक्नोलॉजी में हाल के वर्षों में हुई बेहताशा तरक्की के कारण, आज का हमारा प्रजातंत्र एक “ठहरा हुआ और पुराना” राजनैतिक यंत्र बन कर रह गया है। जितनी उम्मीद हम प्रजातंत्र से करते हैं, इस डिजिटल-युग में, यह पुराना पड़ गया प्रजातंत्र उतना काम यह नहीं कर पा रहा है और हम यह नहीं कह सकते कि आज यह बहुमत की आकांक्षओं और इच्छाओं को सही रूप में प्रकट करता है।

हम इंडियन पीपुल्स कांग्रेस के लोगों का यह मानना है कि पुराने पड़ गए इस प्रजातंत्र को आज एक ऐसे नए गतिशील प्रजातंत्र में बदल डालने की जरूरत है, जो टेक्नोलॉजी के माध्यम से मजबूत हुए लोगों की प्रतिक्षण बदलती हुई जन-इच्छा को यथार्त में प्रकट करने में समर्थ हो। केवल इस तरह का गतिशील प्रजातंत्र ही सही मायने में ऐसा शासन कहा जा सकेगा कि वह ‘जनता का, जनता के द्वारा, जनता के लिए’ है।

यह हमारे समय की माँग है कि ऐसे गतिशील प्रजातंत्र की स्थापना हो और इसकी स्थापना को थोड़े से लोगों के – अल्पमत के – भारी प्रतिरोध के बावजूद भी अब बहुत दिनों तक टाला नहीं जा सकेगा। यह गतिशील प्रजातंत्र, जैसे ही इसकी स्थापना होगी, हमारी जीवन-शैली में बहुत बड़ा परिवर्तन ला देगा, जिससे क्रम विकास की प्रक्रिया में हमें तेजी से आगे बढ़ने की प्रेरणा मिलेगी।

मानवजाति – और उसकी संस्थाओं – के क्रम-विकास  का यह द्रष्टिकोण आज मानवता के सामने एक एजेंडा पेश करता है : हम मनुष्यों को अपने सोचने के ढंग और काम करने के तरीके को बदल लेना चाहिए।

इस तरह सामाजिक तौर पर, यह एजेंडा एक क्रांतिकारी विचार है।

इसके लिए जरूरी है कि हम मनुष्य पहले यह तो स्वीकार कर लें कि इस तरह के परिवर्तन की आवश्यकता है; इसके बाद जरूरत इस बात की है कि हम मनुष्यजाति की भौतिक और आध्यात्मिक प्रगति को संभव बनाने वाली आवश्यक शर्तें और साधन, प्रजातांत्रिक तरीके से, उनको उपलब्ध कराएं।

क्रम-विकास का यह द्रष्टिकोण हमसे इस बात की दरकार रखता है कि हम, अपने भविष्य की खातिर, अपने वर्तमान को – वर्तमान की सामाजिक संस्थाओं और अपनी सभ्यता को – इस क्रम-विकास के परिपेक्ष्य में सावधानी से गढ़ें – उस भविष्य की खातिर जो हमारी आँखों के सामने आकार ले रहा है। इस तरह की किसी भी कोशिश का यह मतलब होगा कि हम अपने वर्तमान को नया आकार देगें ताकि हमारा भविष्य हमारे हिसाब से रूप ले सके – एक ऐसा भविष्य जो क्रम विकास की द्रष्टि से बेहतर हो।

यदि हम क्रम विकास इस द्रष्टिकोण से अपने भविष्य को आकार देने के लिए, अपने वर्तमान को गढ़ें तो, दुर्भाग्य से, वह रूप हमारे आज के उस आदर्श के विरुद्ध होगा, जो घोषणा करता है : “इंसान केवल उपभोक्ता ही तो हैं; सब कुछ बाजार को तय करने दो”। इंडियन पीपुल्स कांग्रेस मानवता की उदारवादी द्रष्टि के इस झंडे को हाथ में थामे हुए है।

कोई सवाल कर सकता है : थोड़े शब्दों में बताइये, आखिर इंडियन पीपुल्स कांग्रेस क्या चाहती है ? हम इस सवाल का यह जवाब दे सकते हैं : सार-तत्व में, इंडियन पीपुल्स कांग्रेस जीवन और विश्व के क्रम विकास का एक द्रष्टिकोण है। लेकिन एक सीमित मायने में, यह भारत के लोगों का अपने सामूहिक जीवन में, इस राजनैतिक यंत्र के माध्यम से, क्रम विकास की प्रक्रिया में, अग्रगामी गति को तेज करने का एक प्रजातान्त्रिक प्रयास है। यह द्रष्टिकोण जिन चीजों को सबसे अधिक कीमती मानता है, वे हैं : जानने की जिज्ञासा, ज्ञान हासिल करने की लालसा और नयी चीजों की खोज करने की उत्कंठा।

हालाँकि, एक राष्ट्रीय संगठन होने के नाते, इंडियन पीपुल्स कांग्रेस का सरोकार भारत से है, फिर भी आध्यात्मिक भारत, नम्रता और दया के भाव के साथ, एक विश्व-व्यापी द्रष्टि का वाहक है। इस वेब-साइट पर मौजूद इंडियन पीपुल्स कांग्रेस का “विज़न डॉक्यूमेंट”  इस द्रष्टि की एक झलक पेश करता है, जिस द्रष्टि की आज बहुत जरूरत है।

आओ, हम सब एक बेहतर युग की ओर कदम बढ़ाएं – एक ऐसा युग जहाँ पृथ्वी पर विवेकी मनुष्य रहते हों !


विषयों के वर्गीकरण के अनुसार नीचे दी गयी सामग्री पढ़ें :

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