जीवन

हमारी पृथ्वी पर जीवन के विकास का सबसे ऊंचा शिखर मानव के रूप में प्रकट होता है और इसकी तली – सबसे कम विकसित और आदिम स्वरूप – वायरस में पाया जाता है। जीवन की सीढ़ी के सबसे निचले डण्डे पर पाए जाने वाले ये अति सूक्ष्म जीव कभी कभी बहुत ही कठिन वातावरण और परिस्तिथियों में रहते हुए ही नहीं बल्कि मजे में फलते फूलते हुए पाए जाते हैं। वे मनुष्यों के शरीर में भी पाए जाते हैं। कभी कभी बीमारी पैदा करने वाले बैक्टीरिया संक्रमण के माध्यम से मानव शरीर में घुस आते हैं।इनको मारने के लिए, डॉक्टर मानव शरीर को बैक्टीरिया नष्ट करने वाली दवाई – एंटीबायोटिक्स – को पर्याप्त तादाद में और पर्याप्त समय के लिए भर देते हैं। लेकिन यदि यह तादाद या इसका समय इनको (बैक्टीरिया को) पूरी तरह से मार देने के लिए पर्याप्त नहीं है, तो ये बैक्टीरिया कभी कभी घंटे भर में अपने जीवन के जीन की कुंडली (genetic code) को इस तरह बदल लेते है – और अपने जीवन को एक ऐसे नए रूप में विकसित कर लेते हैं – कि वह दवाई उन पर कोई असर नहीं डालती। जहाँ जीवन के उच्चतर विकसित रूप – जैसे इंसान या बन्दर – को अपने जीवन की कुंडली (genetic code ) को बदल कर एक ऐसे रूप में ढाल लेने – और इस तरह जीवन के एक ऐसे नए रूप में विकसित हो जाने – में कि वह जीवन के रास्ते में आई कुदरत की रुकावटों को जीत सकें, लाखों साल लगते हैं वहीं बैक्टीरिया के स्तर पर इसके लिए केवल कुछ दिन या कुछ घंटे ही लगते हैं।

जीवन की विशेषताएं उसके शिखर पर और उसके निचले डण्डे पर मूल रूप में एक जैसी ही हैं। जीवन के वंश-वृक्ष पर, इंसान तथा बैक्टीरिया दोनों की खासियत एक जैसी है। हम यह जानते हैं कि जीवन में ऐसी ताकत है जो वह आगे बढ़ने की अपनी गति से सामने आई चुनौतियों का मुकाबला कर सकती है और उन चुनौतियों पर विजय प्राप्त कर सकती है। हम इस आगे बढ़ने की गति – जो हमें डार्विन के सिद्धांत ‘सर्वोत्तम ही जीवित रहता है’ में दिखाई देती है – के नियम ढूंढ भी सकते हैं  और यह और कुछ नहीं बल्कि ‘जीवन कुंडली (genetic code)’ बदलने की प्रक्रिया (mutation) है, जिस प्रक्रिया का लक्ष्य यह नहीं है कि वह जीवन का सर्वोत्तम रूप विकसित करे बल्कि (लक्ष्य ) यह है कि वह (जीवन ) अपने सामने उपस्तिथ उन मुश्किल हालातों का मुकाबला करे जो उसके जीवन-मरण की चुनौती बनी हुई है।

लेकिन असली सवाल यह नहीं है कि जीवन इस तरह का व्यवहार ‘कैसे’ करता है बल्कि सवाल यह है कि जीवन यह व्यवहार ‘क्यों’ करता है। हम जीवन की आगे की ओर बढ़ने की इस मौलिक प्रवत्ति – ललक – को, आगे बढ़ने की गति में आई रुकावट को पहचान लेने की ताकत को, गति की दिशा को ढूंढ़ लेने की क़ाबलियत को और रास्ते में आई रुकावट को पार करने की खातिर जीवन को नये रूप में विकसित कर लेने की विशेषता को कैसे समझा सकते हैं?

आओ हम प्रकृति के एक और कारनामे को देखें। नदियाँ पृथ्वी के ऊँचे धरातल से नीचे की ओर बहती हैं। यदि हम इसके बहने के मार्ग में पत्थरों का ढेर डाल दें तो इन पत्थरों से पैदा हुई रुकावट को तोड़ने के लिए पर्याप्त मात्रा में वहां पानी इकठ्ठा हो जाता है। ऐसा कैसे हो जाता है इसको समझाने के लिए हम इसके नियम – गुरुत्व आकर्षण का प्रभाव –  भी खोज लेते हैं। लेकिन असली सवाल यह नहीं है कि पानी का बहाव ऐसा “कैसे” करता है बल्कि यह है कि “क्यों” करता है। आज हम जानते हैं कि यह सब कुछ विश्व व्यापी गुरुत्व आकर्षण शक्ति के कारण होता है , जोकि पानी को ऊँचे धरातल से नीचे की ओर खींचती है – यानि गुरुत्व आकर्षण के केंद्र, जो पृथ्वी के केंद्र में स्तिथ है, की ओर खींचती है। यदि हम पानी के बहाव के मार्ग में काफी तादाद में ऊँचाई तक पत्थर भर दें तो पानी का बहाव रूक जाता है।  लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि इस पर प्रभाव डालने वाली गतुत्व आकर्षण की शक्ति वहां मौजूद नहीं है या कि वहां पर पानी के ऊंचाई से नीचे की ओर बहने की कुदरती प्रवत्ति मौजूद नहीं है।  आज हमें यह भी पता है कि ऊंचाई पर इकठ्ठा हुए पानी में अन्तर्निहित (potential ) शक्ति संग्रहित रहती है। यदि हम पानी के बहाव के रास्ते में डाले गए पत्थर कमजोर कर दें या पहले से इकठ्ठा हुए उस पानी में और अधिक मात्रा में पानी डाल दें तो गुरुत्व आकर्षण की शक्ति बढ़ जाएगी और रूका हुआ पानी फिर से नीचे धरातक की ओर बहने लगेगा।  आज हम यही भर नहीं जानते हैं कि पानी ऊँचे धरातल से नीचे की ओर “कैसे ” बहता है बल्कि यह भी जानते हैं कि “क्यों ” बहता है।

हम जानते हैं कि पर्वत , गगन चुम्बी इमारतें , धरती पर पड़े हुए पत्थर आदि सब में गुरुत्व आकर्षण की पोटेंशियल (potential) ताकत संग्रहित होती है या पृथ्वी के अंदर गुरुत्व आकर्षण के केंद्र की ओर गिरने की प्रवत्ति होती है और जिस क्षण हम इन चीजों और इस खींचने वाली ताकत के बीच स्तिथ अवरोध को हटा देंगे ये सभी चीजें गुरुत्व आकर्षण के केंद्र की ओर गिर पड़ेंगे।

  हम जानते हैं कि हमारे सूर्य के सभी ग्रह – पृथ्वी समेत – और हमारी आकाश गंगा के सभी सौर मंडल में पोटेंशियल (potential ) ताकत संग्रहित रहती है जिनमे उनके क्रमशः अपने अपने गुरुत्व आकर्षण के केंद्र – जो हमारा सूर्य और हमारी आकाश गंगा के केंद्र में स्तिथ ब्लैक होल (black hole ) होता है – की ओर गिर पड़ने की प्रवत्ति होती है। लेकिन वे अपने अपने गुरुत्व आकर्षण के केंद्र में नहीं गिर जाते क्योंकि उनके बीच में रूकावट डालने वाली एक “अंडाकार घुमाव की सेन्ट्रीफ्यूगल ताकत (centrifugal force)” एक अवरोध रूप मे मौजूद रहतीहै जो उनको अपने गुरुत्व आकर्षण केंद्र में नहीं गिर पड़ने देती। जैसे कि हम सभी जानते हैं ब्लैक होल (black hole ) की रचना घनीभूत पदार्थ (super dense matter ) के अपनी गुरुत्व आकर्षण शक्ति के कारण स्वयं के ऊपर गिर पड़ने से होती है। इसमें सुपर (super ) गुरुत्व आकर्षण की ताकत होती है, जो अपने आस पास की निहारिकाओ (galaxies ) को अपने केंद्र की ओर खींचता है और वे निहारिकायें उसके केंद्र में नहीं गिर पड़ती क्योंकि उनकी “अंडाकार घुमाव की सेन्ट्रीफ्यूगल ताकत (centrifugal force)” एक अवरोध होती है। इस ब्रहमांड में हर एक कण में एक पोटेंशियल (potential ) शक्ति संगृहीत होती है जिसमे गति की एक दिशा की प्रवत्ति होती है लेकिन यह गति की प्रवत्ति उस दिशा में पूरी नहीं हो पाती क्योंकि उसके मार्ग में कुदरती अवरोध मौजूद होते हैं। जिस क्षण किसी पदार्थ में संग्रहित यह पोटेंशियल (potential ) ताकत उसको रोकने वाले अवरोध की ताकत से अधिक हो जाती है और अबरोध टूट जाता है , उसी क्षण वह उस आकर्षण केंद्र की ओर – अपने लक्ष्य की ओर – चल पड़ती है।

   ये प्राकृतिक प्रक्रियाए जीवन को समझने और मृत मिटटी में से जीवन का सौता फूट पड़ने के लिए किस तरह प्रासंगिक है ?

All these natural phenomena prompt us to think of life as some form of energy – a force – and to visualize it as stored in matter in some potential form. Undoubtedly, life is energy. In the cycle of energy transformation, the life gets its power-supply through food and from Sun (in the ultimate analysis). But there is no equal balancing of the energy-input and the energy-output in the case of life. Life has Will that is an additional quantity of energy on the side of output in the equation of the equivalence of input and output of energy, and it contains in it (that is, Will) the additional energy that came from the initial push, which set the life on its course of forward evolutionary movement.

  It is possible for mind today to conceive that there is life stored in the potential form in every particle of matter in the universe but some counterbalancing barrier bars its emergence, manifestation and forward movement as life. Wherever, and whenever, this barrier is removed by whatever means and for whatever reason, the life comes out of its potential state and starts moving towards its natural destination, towards its center of gravity – that is not gravity but in the context acts like gravity calling all life-forms to meet this center and we see this movement as evolution of life. Then, further it is also possible to conceive that this just released life-energy has the tendency to march – because now it is not blind movement of matter but conscious march  of life – towards her center of gravity, or better still, towards her destiny. As we said, in our mental model the centre of gravity is a symbol of equivalence and has nothing to do with the natural force of gravity; likewise, neither is the stored potential life-energy an amount of stored force of gravity. It is something qualitatively different, of a different dimension, a different plane of existence and a different reality. But, nevertheless, it is a force in real sense of the word. This fundamental universal force is yet to be discovered, detected and harnessed by modern science.

  Moreover, it is also possible for human mind to conceive that such a center of life-gravity or life’s destination is nothing but part and parcel of the grand unified universal force, and that the same is felt differently in different circumstances, including as life (as we know it existing in material world on our Earth) under certain conditions. Only what is required more is bestowing that universal force with the property of consciousness. It does not seem illogical, at least today. It also renders it possible that life may exist extraterrestrial where barriers for life-emergence have been rendered surpass able by suitable conditions of (life’s) hospitable environment. With the help of this model for understanding life, it is possible that it may be created artificially even in laboratory by the scientists.

  Let modern science, a discipline of knowledge dependent on the tool of mind, make its toils and take its time to discover this secret in its own favorite way.

  Man is exploring the universe. He is able to get out of Earth and travel extraterrestrial places. He has touched moon with his hands and peeped into the interiors of universe. Everywhere man has found compounds made of atoms and atoms made of atomic particles. Basically, it is search of physical world and this physical world, so far as he has been able to know, is infinite.

  However, he is not going beyond material world in his search. He has no tools to go beyond material world. He is not capable with his mind to go beyond matter. Nature has set a limit to the capacity of human mind, as his mind is not the supreme tool produced by her. And, Nature has not yet finished her task of producing still better tools of knowledge and she is still at her work of evolution. Beyond physical world, there are other worlds also and man knows the existence of some of these extra physical worlds and makes attempts to study them. Behind atomic particles, there is a world of subatomic particles or waves and this world must be having its own shape, rules and place in the scheme of things. Also there is a gravitational world behind all material particles that must be having its own symmetrical structure and place in the universal scheme.

  We know that water is a compound of Hydrogen and Oxygen but it is basically different from these two gases. You look at the snowy mountains and compare them with Hydrogen and Oxygen, and you find that they are qualitatively different from each other, though ice is made of these two gases. There is a barrier of quality between the two. One can never experience the reality of ice, by simply having these two gases. Though we know that ice is but a compound of these two gases, these two gases are in themselves nothing but a certain atomic structure of atomic particles. And though these atomic particles are likewise a definite structure of subatomic particles or waves, yet ice, gases, atoms and subatomic particles or waves exist with their separate individual identities and rules.

  One can go deep down into the micro world and find independent structures in hierarchy ad infinitum. There is a barrier of quality difference between any two of levels of this hierarchy. Likewise, one can go out in the macro world and find similar independent structural hierarchy ad infinitum.

  Once some scientists thought that with the discovery of atomic particles, the physics will see its end and there will be left nothing more in the material science for scientists to discover. But Nature is not that simple. The beauty of Nature is its mystery. It is endless, in structure, in quality and in operation.

  It is not only the material plane but also the planes that are beyond it that can be descended into by man by suitable means, and they are ad infinitum. Though none of them is primary, all have their independent identities and rules.

 There is a world of desires and impulses that is real with its individual shape, quality and rules.

 Also there is a world of thoughts with similar attributes.

  And, then there are many more worlds in the scheme of creation. Eastern wisdom accepts the existence of these subtle worlds and its leading lights, like Lord Buddha, Lord Jesus Christ, Milarepa, Nizammuddin, Ramakrishna, Sri Aurobindo and countless many others, vouchsafe the truth of these worlds on the basis of their personal experiences, experiences that were validated by objective and verifiable results predicted in advance. These experiences of them were not subjective feelings that had no objective foundations. There are persons living on Earth even today, as ever, who live these experiences and prove their objective correctness by predicting future events.

  We live at three planes, or, we are conscious at three planes. These planes of consciousness are neither the inherent properties nor the bye-products of our biological life. However, for action of the consciousness at these planes in our material world, generally, it needs a physical body.

  • Firstly, at the lowest level, at the threshold of life, we ‘feel and sense’ our living existence. It is the world of consciousness at the gross physical level, the most elementary level of living being. It is the base of the pyramid of human structure and is formed of ‘sensations’ that may be occasioned by the end result of our pursuit of desires and thoughts or, by innocuous natural happenings to the physical body.

  • The second one is that of ‘our’ desires. This world is composed of cravings and impulses. A beauty inherent in the desires and cravings – ranging from love to hate and attachment to revulsion – provides this world its own rhythm.

  • The third plane is that of ‘our’ thoughts. It is a world of mind and its reason, and is composed of symmetry. It provides a congruity in the material world around us and creates a beauty and rhythm of logic,

   Who am ‘I’? The ‘I’ is the ever-shifting bundle of thoughts, desires and sensations. This ‘I’ remains in perpetual flex. Like a kaleidoscope, our ‘I’ is an ever-shifting illusion shaped by ‘our’ thoughts, desires and feelings, and this illusion lasts all our life span, till the death. That is ‘I’ and that is how we spend our life.

  With birth, man gets his physical body that develops over time by absorbing material nutrients from surrounding Nature. But, by indulging in desires, man absorbs these desires and forms an inner subtle body – body constituted of desires. Not only this, likewise, he, by dealing in thoughts, absorbs them and forms an inner subtle body – body composed of thoughts. These three subtle bodies – physical, vital and mental – sustain Para psychological human being from within, like a house is supported from within by a steel structure.

  At his death, man’s physical body disintegrates into its constitutional elements that are absorbed back by Nature for re-cycling. Some time after death, his three subtle bodies, too, are released into (or migrate to, which is the same thing) independently existing subtle worlds that are regulated by their own laws.

   After living their respective lives there for some time, these subtle bodies (or subtle beings) also die and disintegrate into their respective constituent elements and absorbed back by Nature for re-cycling. The ‘I’ that we know, being an illusion of something else, also disappears leaving no trace of its former egoistic existence. There are many cases of rebirth of persons belonging to all the religions and all the countries that have been carefully studied by persons with scientific training. To a scientific mind there is no scope to doubt the veracity of at least some of them.

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