यूगोस्लाविया के हश्र तक न पंहुचे कहीं इराक?

(प्रभात कुमार रॉय)

इराक में जारी गृहयुद्ध को लेकर भारत में भी बड़ी चिंताजनक स्थिति व्याप्त हो गई है। शिकस्त खाती हुई इराक की फौज़ एक के बाद एक इलाके को विद्रोही आईएसआईस के दहशतगर्दो के हाथों गंवाती जा रही है। इराक की एक कारोबारी कंपनी में कार्यरत भारतीय नागरिकों के अपहरण ने चिंताजनक स्थिति को और भी अधिक संगीन बना दिया है। इराक में तकरीबन उन्नीस हजार भारतीय कार्यरत हैं। भारत अपनी आवश्यकता का करीब एक चौथाई तेल इराक से आयात किया करता रहा है। इराक के गृहयुद्ध में यदि और अधिक तेजी आती है तो तेल उत्पादन पर बहुत बुरा असर पड़ सकता है। इराक का गृहयुद्ध पहले से लड़खड़ाई हुई भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए भी अत्यंत संकटपूर्ण साबित हो सकता है। सोवियत संघ के पराभव के तत्पश्चात 1991 में विश्व की एकमात्र ध्रुवीय विश्वशक्ति बनकर उभरे अमेरिका ने सद्दाम हुसैन को निर्णायक तौर पर शिकस्त दी और कुवैत को इराक के आधिपत्य से मुक्त कराया था। इराक में न्यूक्लियर अस्त्रों की मौजूदगी का बहाना बनाकर अमेरिका द्वारा 2003 में इराक पर पुनः आक्रमण किया गया और सद्दाम हुसैन को सत्ता से बेदखल किया। किंतु निरंतर आठ वर्षो का अमेरिकन आधिपत्य इराक में शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक सत्ता की स्थापना करने में पूर्णतः विफल रहा। बहुत बेहतर होता कि इराक में निष्पक्ष आम चुनाव कराने के पश्चात ही अमेरिकन फौज इराक को अलविदा कहती और एक लोकतांत्रिक राष्ट्र के तौर पर इराक के सभी समुदाय अमन-ओ-चैन से तरक्की कर पाते। किंतु बेहद खुदगर्ज राष्ट्र अमेरिका से यह उम्मीद करना तो एकदम व्यर्थ था। अमेरिका ने अपने राष्ट्रीय हितों की खातिर इराक में फौजी दखंलदाजी अंजाम दी और अपने हितों को साधता हुआ वहां से पलायन कर गया। आज जबकि फिर से इराक की हुकूमत चीखकर अमेरिकी को इमदाद करने के लिए पुकार रही है तो अमेरिका अपने तीन सौ फौजी सलाहकार भेजकर अपने दायित्व की इतिश्री कर रहा है।

इराक में जारी गृहयुद्ध में चार सवाल खासतौर पर उभरे हैं। बागी तंजीम आईएसआईस कौन सी ताकतें मदद कर रही हैं। इराक के गृहयुद्ध का आखिरकार किसे फायदा होगा। इराक पर आईएसआईस का आधिपत्य हो गया तो इसका क्या राजनीतिक मुस्तकबिल होगा। इराक के गृहयुद्ध का दुनिया के तेल बाजार पर क्या प्रभाव होगा।

आईएसआईएस यानी इस्लामिक स्टेट ऑफ ‘इराक़ और सीरिया नामक तंजीम दरअसल एक कट्टरपंथी वहाबी तंजीम है, जोकि इराक पर अमेरिकी आक्रमण के बाद इराक में उभरे अलकायदा से संबद्ध रही। आईएसआईएस चाहती है कि इन्हें ‘सुन्नी’ तंजीम करार दिया जाए। सुन्नी समुदाय के नाम पर संचालित तंजीम आईएसआईएस अमेरिका परस्त सत्तानशीन शिया लीडरों की संकीर्ण सियायत के कारण अत्यंत ताकतवर हो उठी है। मुजाहिदीन शूरा कौंसिल, जैश-ए-फातिहीन, जुंद अलसहाबा, कतबिया अंसार अलतौहीद और जैश अलतायफा अलमंसूरा आदि तंजीमों के नौजवान लड़ाकों को अली अब्दुल्लाह अलरशीद अलबगदादी उर्फ अबू अलकुरैशी अलबगदादी ने आईएसआईएस के परचम के तहत एकजुट किया था। बताया जाता है कि अलबगदादी सात साल पहले मारा गया, लेकिन उसे देखा किसी ने नहीं है। तो क्या अलबगदादी एक गढ़ा गया चरित्र है?

हम जो आजकल इराक-सीरिया के गृहयुद्ध में देख रहे हैं वह इस्लाम के भीतर विद्यमान शक्तियों के मध्य जारी हिंसक संघर्ष है। सदियों पुरानी सांप्रदायिक नफरत और दुश्मनी को साम्रज्यवादी शक्तियों ने बाकायदा साजिशन हवा दी और अत्याधुनिक हथियार देकर ताकतवर बनाया है। सोवियत-अफगान युद्ध के दौर में अमेरिका द्वारा पाकिस्तान के सहयोग से अलकायदा को अफगानिस्तान में ताकतवर बनाया गया था। इराक की सरजमीं पर द इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक एंड सीरिया (आईएसआईएस) तंजीम का उदय भी अलकायदा के गर्भ से ही हुआ है। अमेरिकी फौजों के इराक से पलायन कर जाने के बाद यह आशंका व्यक्त की ही जा रही थी, अलकायदा इराक में गृहयुद्ध का आग़ाज कर सकता है। इसके लक्षण कई माह पहले ही नजर आने लगे थे, जबकि अल कायदा की प्रबल मौजूदगी के कारण इराक के रामादी और फालुजा जैसे शहरों में सांप्रदायिक हिंसा भड़क उठी थी। सीरिया में जारी गृहयुद्ध ने उत्तरी इराक में अलकायदा को यह अवसर फराहम कराया कि वहाबी कट्टरपंथी तंजीमों को एकजुट करके तकरीबन बीस हजार जंगजू दहशतगर्दों से लैस आईएसआईएस सरीखी खतरनाक तंजीम की तशकील कर सका। सर्वविदित है कि आईएसआईएस को सीधी फौजी और वित्तीय इमदाद सऊदी अरब से हासिल हो रही है, जोकि अमेरिका का विशिष्ट सहयोगी देश रहा है। कुछ वर्ष पूर्व जिस तरह से अफगान और पाकिस्तान युद्ध का विलय हो गया था, तकरीबन उसी तर्ज पर इराक, सीरिया और लेबनान युद्धों का विलय एक ही युद्ध के तौर पर हो गया है।

इराक में अमेरिकन फौजों की मौजूदगी में बाथ पार्टी का भी पूर्णरुपेण पतन हो गया था और अंततः इराक की राजसत्ता अमेरिका परस्त शक्तियों के हाथों में आ गई, जिन्होने संकीर्ण सांप्रदायिक राजनीति का संचालन करते हुए इराक के सुन्नी संप्रदाय को सत्ता प्रतिष्ठान से एकदम अगल थलग करने की साजिश अंजाम दी। सीरिया के संघर्ष में भी अमेरिकन उदासीनता के कारणवश शिया अलावाइट की ताकत में जबरदस्त इजाफा हुआ और सीरिया का राष्ट्रपति असद अजेय बनकर उभरा। ईरान-हिजबुल्ला-अलावाइट-इराक (सारे शिया या शिया छटा वाले) धुरी ने पश्चिमी अफगानिस्तान से लेकर मध्यपूर्व के पूर्वी हिस्से तक शिया शक्तियों की पकड़ मजबूत की है। समस्त क्षेत्र में शिया शक्तियों के शनैः शनैः शक्तिशाली होते चले जाने की स्थिति को सऊदी अरब के कट्टरपंथी शासक बरदाश्त नहीं कर पा रहे थे, अतः बहाबी कट्टरपंथियों को उन्होने पूरी ताकत से इमदाद फराहम की। अब उत्तरी इराक में वहाबी ताकतों के प्रबल उदय से इराक में शिया प्रभुत्व को गंभीर खतरा पैदा हुआ है। अमेरिका द्वारा प्रशिक्षित इराकी फौज परास्त होती हुई प्रतीत हो रही है। इस जटिल स्थिति में विभिन्न वैचारिक छटाओं वाले अनेक खिलाड़ी पैदा हो गए हैं और इसके कारण संयुक्त अरब अमीरात, तुर्की, सऊदी अरब और खुद अमेरिका अलग-अलग गुटों को समर्थन दे रहे हैं। हालांकि अल कायदा से जुड़े आईएसआईएस के ताकतवर विद्रोही गुट के रूप में उभरने से अब इन देशों को अपने समर्थन पर फिर विचार करना होगा। आईएसआईएस की फतह का इराक और सीरिया की स्थिति पर निर्णायक प्रभाव पड़ेगा।

तेल पर आधिपत्य स्थापित करने के अमेरिकन साम्रज्यवाद की खूनी साजिशों में इंसानियत रौदी जा रही है। संकीर्ण संप्रादायिकता को हथियार प्रदान करके साम्रज्यवादियों ने सदैव भाई से भाई को कत्ल कराया है। सन् 680 करबला में इमाम हुसैन का नवाज अदा करते हुए सजदे में कत्ल किया गया था। जालिम यजीद की रवायतें आज भी नए रंग-ढ़ंग में जारी है, सिर्फ राजनीतिक दौर और अंदाज-ए-हुकुमत बदल गया है। अमेरिकन परस्त शिया हुकूमत का कट्टरपंथ समाप्त हुए बिना आईएसआईएस के वहाबी कट्टरपंथ को कदाचित खत्म नहीं किया जा सकेगा। इराक में सुन्नी और शिया समुदाय सदियों सदियों से शांतिपूर्ण बंधुत्व के साथ रहे हैं और राजसत्ता में भी साझीदार रहे हैं। इराक में गृहयुद्ध का मुक्म्मल खात्मा तभी मुमकिन हो सकेगा, जबकि इराक में सही अर्थ में सच्चे जनवाद की स्थापना हो जाए और सभी संप्रदायों के नागरिकों का प्रतिनिधित्व करने वाली और सभी के साथ न्याय करने वाली लोकतांत्रिक हुकूमत कायम हो जाए। संकीर्ण सांप्रदायिकता किस तरह से किसी राष्ट्र को नेस्तोनाबूद कर सकती है इस नजारे का दुनिया एक दौर में शक्तिशाली रहे राष्ट्र यूगोस्लाविया में दीदार कर चुकी है, जोकि सांप्रदायिक गृहयुद्ध के कारण अनेक देशों में तकसीम हो चुका है। यही खौफ सता रहा कि कहीं सांप्रदायिक जंग इराक को भी उसी हश्र तक न पंहुचा दे, जहांकि यूगोस्लाविया पंहुच गया था।

(पूर्व सदस्य नेशनल सिक्योरिटी एडवाइजरी कॉउंसिल)

 

 

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