अभी तक  क्यों अपराजित हैं असद ?

(प्रभातकुमाररॉय)

सीरिया में राष्ट्रपति पद के लिए सपन्न हुए चुनाव में बशर अल असद को फतेहयाब घोषित किया गया।समग्र प्रजातांत्रिक दृष्टि से इस चुनाव का सार्थक अर्थ है, क्योंकि गृहयुद्ध में लिप्त रहे सीरिया में बाथ  पार्टी की एक दलीय तानाशाही व्यवस्था रही, किंतु इस बार राष्ट्पति पद के लिए बहुदलीय चुनाव आयोजित किए गए जिसमें बाथ पार्टी के बशर अल असद का खुला मुकाबला दो अन्य उम्मीदवारों से हुआ।

सीरिया में सन् 2000 में सत्तानशीन हुए राष्ट्रपति बशर अल असद की हुकूमत के विरुद्ध सन् 2011 से अलकायदा से संबद्धित और वहाबी विचारधारा से प्रेरित अलनुसरा और आईएसआईएस जेहादियों का सशस्त्र संग्राम निरंतर जारी रहा है।

अलकायदा से प्रतिबद्ध रही जिस जेहादी तंजीम आईएसआईएस अर्थात इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक एंड सीरिया ने इराक में अपनी फतह के झंडे गाड़ दिए, उसी आईएसआईएस के दहशत गर्दों को सीरिया में राष्ट्रपति बशर अल असद की फौज़ के हाथों जबरदस्त शिकस्त का सामना करना पड़ा है। सीरिया के फौजों द्वारा दमिश्क, अल्लापो, रक्का आदि अनेक शहरों से आईएसआईएस और अलनुसरा के जेहादी दहशत गर्दो को खदेड़ दिया गया है।

उल्लेखनीय है कि सीरिया की हुकूमत के विरुद्ध आईएसआईएस के छापामारों को सउदी अरब और कतर की सरकारों से विशाल मात्रा में फौजी और वित्तीय मदद प्राप्त होती रही है। सीरिया की असद हुकूमत को रशिया, चाइना और ईरान का प्रत्यत्क्ष समर्थन हासिल रहा है। प्रारम्भ में प्रतीत हो रहा था कि बशर अल असद का हश्र भी इराक के तानाशाह सद्दाम हुसैन, ईजिप्ट के तानाशाह हुस्नी मुबारक और लीबिया के कर्नल गद्दाफी की तरह ही अंजाम दे दिया जाएगा।

किंतु आश्चर्यजनक तौर पर बशर अल असद पश्चिम एशिया के अरब तानाशाहों के पतन के क्रम में अभी तक अपवाद सिद्ध हुएहैं ।

कट्टर जेहादियों का नृशंस दमन करके जिस तरह बशर अल असद के पिता हाफिज अल असद ने अपनी राजसत्ता को एक निरंकुश तानाशाह की हद तक ताकतवर बनाया था । अपने पिता का अनुगमन करते हुए बशर अल असद ने अपने कट्टरपंथी जेहादियों का जबरदस्त तौर पर दमन किया है। सीरिया के गृहयुद्ध में अभी तक तकरीबन एक लाख लोग मारे जा चुके हैं।

तानाशाही के बरखिलाफ प्रजातंत्र का कथित तौर पर समर्थन करने वाले अमेरिका और पश्चिमी यूरोप के देशों ने सीरिया के तानाशाह बशर अल असद के विरुद्ध कोई फौजी कार्यवाही केवल इसलिए अंजाम नहीं दी, क्योंकि उनके समक्ष बशर-अल-असद को सत्ताच्युत करने का सीधा अर्थ होता कि अलकायदा की कोख से उत्पन्न जेहादी आईएसआईएस को सीरिया में सत्तानशीन कर देना।अफगानिस्तान, इराक और सीरिया में अमेरिकन राजदूत रहे रियान क्राकर ने अमेरिकन सरकार को सलाह पेश की सीरिया में आईएसआईएस को सत्तानशीन करने से कहीं अधिक बेहतर है कि बशर असद की तानाशाही सीरिया में बरकरार बनी रहे। इसके अतिरिक्त रशिया और चाइना जो कि राष्ट्रपति बशर असद की हुकूमत का सहयोगी देश रहेहैं, इन देशों ने भी अमेरिका और उसके सहयोगी पश्चिमी देशों को यह समझाने में कामयाबी हासिल की है कि सीरिया पर आईएसआईएस के आधिपत्य का अर्थ होगा कि समूची दुनिया के लिए अलकायदा का खतरा और अधिक बढ़ जाएगा ।यूएन सिक्योरिटी कॉउंसिल में रशिया और चाइना ने सदैव ही सीरिया में किसी तरह के अंतरराष्ट्रीय सैन्य हस्तक्षेप का जबरदस्त विरोध किया है और किसी तरह के प्रतिबंध आयद करने के प्रस्ताव पर वीटो किया ।

सीरिया के राष्ट्रपति असद सीरियाई समाज के शिया अलवाईट समुदाय से ताल्लुक रखते हैं। सीरिया में शिया समुदाय की तादाद कुल आबादी का मात्र 13 फीसदी है। देश का बहुसंख्यक सुन्नी समुदाय कुल आबादी का तकरीबन 70 फीसदी है। सीरिया में शिया समुदाय के अतिरिक्त अन्य अल्पसंख्यक गुटों में ईसाई और कुर्द समुदाय शामिल हैं। देश के गैर-सुन्नी समुदाय के अल्पसंख्यकों के मध्य खौफ व्याप्त रहा है कि अगर बशर असद का शासन समाप्त हो जाता है तो फिर उनका क्या भविष्य होगा? सीरिया पर सुन्नी कट्टरपंथी आईएसआईएस के आधिपत्य का परिणाम होगा कि अल्पसंख्यक समुदायों का दमन किया जाएगा। भले ही बशर अल असद शिया अलवाइट समुदाय से संबंधित रहे, किंतु बाथ पार्टी से ताल्लुक रखने के कारण उनकी सत्ता का आचरण परम्परागत तौर पर संप्रदाय निरपेक्ष (सेकूलर) रहा है और सभी समुदायों के प्रति राजसत्ता का समान व्यवहार रहा है।

सन् 1970 में सीरिया में जब बाथपार्टी हाफिज-अल-असद की कयादत में सत्तानशीन हुई थी, तो इस्लामिक कट्टरपंथियों ने इसका जबरदस्त विरोध किया था। परिणाम स्वरुप स्वयं को सोशलिस्ट घोषित करने वाली सत्तानशीन बाथ पार्टी द्वारा इस्लामिक कट्टरपंथियों का नृशंतापूर्वक दमन किया गया। सन् 1971 में सीरिया सरकार ने अपने बंदरगाह शहर तारतुस में रशियन नौसैनिक अड्डा बनाने की अनुमति प्रदान करके अमेरिका को अपना प्रबल शत्रु बना लिया था। सोवियत संघ से खात्मे के पश्चात भी सीरिया और रशिया की गहन दोस्ती बदस्तूर कायम बनी रही। सन् 2010 तक रशिया, सीरिया को तकरीबन डेढ अरब डॉलर के हथियार प्रदान कर चुका था। 2012 में भी रूस, सीरिया को चार अरब डॉलर के हथियार देने का समझौता कर चुका है। 4 फरवरी, 2012 को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सीरिया के खिलाफ प्रतिबंध प्रस्ताव चीन और रूस द्वारा वीटो कर दिए जाने के कारण पास नहीं हो सका। सीरिया के गृहयुद्ध में अमेरिका और उसके सहयोगी यूरोपीय राष्ट्रों के समक्ष एक तरफ कुंआ है तो दूसरी तरफ खाई है। अमेरिका बशर-अल-असद को तो सत्ता से हटाना चाहता है, किंतु सत्ता अलकायदा से भी अधिक खतरनाक बन चुके आईएसआईस के हाथों में चली जाए ऐसी स्थिति अमेरिका भी कदापि नहीं चाहता। यही कारण है कि अमेरीका ने कोई सैन्य कार्यवाही सीरिया सरकार के विरुद्ध अंजाम नहीं दी है। वस्तुतः यही कारण है कि बशर अल असद अभी तक अपराजित है।

बेशुमार पैट्रो डालर खर्च करने वाले अमेरिका के पिठ्ठू देश सऊदी अरब की वहाबी विचारधारा की राजनीति के लिए सीरिया एक प्रयोगशाला बन गया है। सऊदी अरब और कतर की सीरिया में बहुत दिलचस्पी है। इराक  में जीत भले अमेरिका की हुई, लेकिन वहां भी शियाओं को सत्ता में शिरकत मिल गई। ईरान की सरहद इराक  से मिलती है और इराक  की सीरिया से। राजसत्ता के इस शिया त्रिकोण को अरब की राजनीति में सऊदी अरब बिलकुल मंजूर नहीं कर सका। ईरान पर दबाव बनाने के लिए सऊदी अरब को यह आवश्यक प्रतीत होता है कि सीरिया में बशर अल असद को सत्ताच्युत किया जाए। सऊदी अरब को सीरिया में धर्मनिरपेक्ष व्यवस्था पसंद नहीं। सऊदी अरब शासकों के लिए कट्टर सुन्नी सत्ता की स्थापना ही एक मकसद रहा है।

अरब बसंत अमेरिका विरोधी माने जाने वाले देशों अथवा सऊदी अरब की वहाबी विचारधारा के अनुरूप नचलने वाले देशों में आकर ही क्यों खत्म हो गया?  यह कौन-सा अरब बसंत है जो राजशाही वाले अरब देशों में अपनी बहार नहीं लाता अथवा वहाबी विचारधारा वाले सुन्नी राष्ट्रों में प्रजातंत्र के फूल नहीं खिलाता?  राजशाही लेकिन वहाबी विचारधारा वाले राष्ट्र अभी तक शांत  और सुरक्षित रहे हैं, चाहे वह खुद सऊदी अरब हो या फिर संयुक्त अरबअमीरात,  कतर, बहरीन और कुवैत। लेकिन आधुनिक, धर्मनिरपेक्ष और गैर-सुन्नी, गैर-वहाबी राष्ट्र गृहयुद्धों में तबाह हो गए हैं। संपूर्ण अरब जगत के लिए यह आत्ममंथन का दौर है। एक दलीय तानाशाही के साथ धर्मनिरपेक्ष आधुनिक देश संचालित नहीं हो पाएंगे और कट्टरपंथी वहाबी विचारधारा से लैस राष्ट्र अल्पसंख्यकों समुदायों साथ कदाचितन्याय नहीं कर पाएंगे। ‘अरब बसंत’ का असली मकसद तो तभी हासिल होगा, जबकि अरब राष्ट्रों में सच्चे जनतंत्र की स्थापना हो जाए और आम जनमानस राजसत्ता में अपनी भागीदारी महसूस कर सकें।

(पूर्व सदस्य नेशनल सिक्योरिटी एडवाइजरी कॉउंसिल)

 

 

 

 

Advertisements

Leave your reply:

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s

%d bloggers like this: