भारत और पाकिस्तान मे कैसे खत्म हो शत्रुता?


(प्रभात कुमार रॉय)

कश्मीर के प्रति अपनी गहन प्रतिबद्धता प्रदर्शित करने की गरज से भारत और पाकिस्तान के मध्य अंजाम दी जाने वाली परस्पर कूटनीतिक वार्ताओं से ठीक पहले भारत स्थित पाकिस्तान के हाईकमिश्नर और जम्मू-कश्मीर के पृथकतावादी लीडरों के मध्य दोस्ताना मुलाकातें प्रायः पहले भी होती रही हैं। कांग्रेस की कयादत में संचालित हुकूमत द्वारा इन कुटिल रहस्यमय मुलाकातों को लेकर कभी भी कोई कड़ी कूटनीतिक प्रतिक्रिया का कदाचित इजहार नहीं किया गया। विदेश सचिव स्तर पर 25 अगस्त से प्रारम्भ होने वाली कूटनीतिक वार्ता से पहले पाकिस्तान हाईकमिश्नर के साथ कश्मीर के पृथकतावादी लीडरान की मुलाकात को नरेंद्र मोदी सरकार ने बहुत संजीदगी से लिया और इस मुलाकात को भारत के आंतरिक मामालात में पाकिस्तान की नाकाबिले बर्दाश्त दखंलदाजी करार दिया। भारत स्थित पाकिस्तान हाईकमिश्नर की इस बेजा हरकत को मद्देनजर रखते हुए नरेंद्र मोदी हुकूमत द्वारा भारत और पाकिस्तान के मध्य विदेश सचिव स्तर की कूटनीतिक वार्ता को बाकायदा रद्द कर दिया गया है। भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता सैयद अकबरुद्दीन ने शिमला समझौते की शर्तो का उल्लेख करते हुए बहुत कड़े अलफाजों में फरमाया कि पाकिस्तान के समक्ष एक ही कूटनीतिक मार्ग शेष बचा है कि वह भारत के साथ अपने सारे विवादों का समाधान केवल द्वपक्षीय वार्ता के तहत ही तलाश करें। कश्मीर के जटिल प्रश्न पर नरेंद्र मोदी हुकूमत का कूटनीतिक दृष्टिकोण यकीनन पूर्व की केंद्रीय सरकार से एकदम विलग प्रतीत हो रहा है।

सर्वविदित है कि हुर्रियत काँफ्रेस के पृथकतावादी लीडरों ने कश्मीर में जेहादी दहशतगर्दी के लिए अनुकूल समूचा वातावरण तशकील करने में सबसे अहम किरदार निभाया है। पाकिस्तान की पुश्तपनाही में और उसके सक्रिय समर्थन से ही  सन् 1988 से कश्मीर में आतंकवादी जेहाद प्रारम्भ हुआ था। पाक सरपरस्ती में कश्मीर में जेहादी आतंकवादियों की समस्त कारगुजारियों के जारी रहते हुए भी भारत सरकार ने विगत 15 वर्षो से परस्पर सहमति द्वारा कश्मीर समस्य़ा का निदान निकालने की खातिर कूटनीतिक वार्ता का दरवाजा सदैव खुला रखा। प्रथम अवसर है कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में हुकूमत-ए-हिंदुस्तान द्वारा पाकिस्तान की पाखंडपूर्ण दोहरी कूटनीतिक चालबाजियों के बरखिलाफ कड़े रुख का स्पष्ट परिचय दिया गया है। एकतरफ भारत के साथ कश्मीर समस्था का शांतिपूर्ण निदान निकालने के लिए पाकिस्तान द्विपक्षीय कूटनीतिक वार्ताएं अंजाम देता रहा है और दूसरी तरफ वही पाकिस्तान जेहादी प्राक्सीवार के जरिए कश्मीर को बलपूर्वक हड़प लेने की खूनी साजिशें भी बाकायदा अंजाम देता रहा है। पाक अधिकृत कश्मीर इलाके में आईएसआई द्वारा संचालित जेहादी प्रशिक्षण शिवरों के संचालन की संपूर्ण जानकारी पूरी तफसील के साथ भारतीय खुफिया ऐजेंसी रॉ के पास विद्यमान है। ऐसे कुटिल और दुष्कर हालातों  में पाखंडी पाकिस्तान के साथ कूटनीतिक वार्ता जारी रखने का कोई वाजिब औचित्य शेष नहीं रह जाता है।

भारतीय विदेशनीति के नियंता इस तथ्य को बखूबी जानते हैं कि पाकिस्तान की फौज दरअसल हकूमत-ए-पाकिस्तान की अंदरुनी पांतों में मौजूद एक खुदमुख्तार हुकूमत के तौर पर कार्य करती है। कश्मीर में सक्रिय आतंकी जेहाद के पृष्ठभूमि में सदैव ही पाक खुफिया ऐजेंसी आईएसआई विद्यमान रही है। खुफिया ऐजेंसी आईएसआई पर पाकिस्तान की नागरिक हुकूमत का कोई प्रभावी नियंत्रण कदापि स्थापित नहीं कर सकी है। पाक खुफिया ऐजेंसी आईएसआई वस्तुतः पाकिस्तानी फौज के नियंत्रण में अपना काम अंजाम देती आई है। पाक खुफिया ऐजेंसी आईएसआई का शीर्ष कमांडर भी पाक फौज का लेफ्टिनेंन्ट जनरल रैंक का अफसर होता है। भारत और पाकिस्तान के मध्य जारी कूटनीतिक वार्ताओं का सार्थक परिणाम इसलिए सामने नहीं आ रहा है, क्योंकि पाकिस्तान की फौज अपनी खुदगर्जी के कारण कश्मीर मसअले का शांतिपूर्ण समाधान बिलकुल भी नहीं चाहती है। स्मरण करें कि जिस वक्त पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी बाजपेई पाकिस्तान के तत्कालान प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के साथ कूटनीतिक वार्ता करने के लिए लाहौर यात्रा अंजाम दे रहे थे, तकरीबन उसी वक्त जनरल परवेज मुशर्रफ की कमांडरशिप में पाक फौज ने जेहादियों को अपनी ढाल बनाकर करगिल की गगनचुंबी पहाडियों पर साजिशन आधिपत्य जमा लिया था। नवाज शरीफ का दावा रहा कि प्रधानमंत्री के तौर पर उनको करगिल की पहाड़ियों पर पाक फौज द्वारा कब्जा जमाने की कारकर्दगी के विषय में कोई ठोस जानकारी नहीं थी। इसके विपरीत अपने संस्मरण में जनरल परवेज मुशर्रफ एकदम उल्टा दावा पेश करते हैं कि पाक फौज द्वारा करगिल में उठाए गए प्रत्येक कदम की जानकारी नवाज शरीफ को प्रदान की जाती रही थी।

सन् 1947 से ही कश्मीर को लेकर ही भारत और पाकिस्तान के मध्य भयानक क़शीदगी और जबरदस्त तनाव पनपा और परवान चढ़ा। सन् 1947 में ही हुकूमत ए पाकिस्तान ने वादी-ए-कश्मीर को बलपूर्वक हासिल करने के लिए अपनी संपूर्ण फौजी ताकत झोंक दी थी। कश्मीर पर आधिपत्य स्थापित करने के लिए जारी आतंकवादी प्राक्सी वार के तहत दोनो तरफ के तकरीबन एक लाख लोगों की हलाक़त के पश्चात भी पाकिस्तान को अभी तक कुछ भी हासिल नहीं हो सका। ऐतिहासिक तौर पर पाकिस्तान ने भारत के साथ तीन बड़ी फौजी जंगों में पूर्णतः पराजित होकर, अंततः कुटिल कुनीति के कारण 1971 में पूर्वी पाकिस्तान (बंगला देश) को गंवा दिया था। कश्मीर के प्रश्न पर संयुक्त राष्ट्र प्रस्ताव से भारत और पाकिस्तान के मध्य समझौते की दास्तान शुरु हुई और ताशकंद समझौता, शिमला समझौता, वाजपेयी की लाहौर यात्रा, आगरा सम्मिट आदि कितने ही कूटनीतिक प्रयास कश्मीर समस्या को निपटाने में एकदम नाक़ाम सिद्ध हुए। विगत 15 वर्षो से आपसी ताल्लुकात को दुरुस्त करने की दिशा में कूटनीतिक कोशिशें बाकायदा जारी रही। आपसी ताल्लुकात सुधारने की दिशा में दोनों देशों के मध्य गहन आर्थिक संबंधों में निरंतर जारी बढोत्तरी एक संभवतया एक नई इबारत की संरचना कर सकती है। भारत-पाकिस्तान के मध्य आपसी व्यापार तकरीबन तीन अरब डालर तक पंहुच चुका है, जिसके आगामी पांच वर्षों में तकरीबन 12 अरब डालर के विशाल स्तर तक पहुंच जाने की संभावना व्यक्त की जा रही है।

पाकिस्तान और भारत के मध्य ताल्लुकात सुधारने की प्रथम और अनिवार्य शर्त है कि हकूमत-ए- पाकिस्तान सुनिश्चित तौर पर भारत के बरखिलाफ जारी अघोषित आतंकवादी प्राक्सी वार का मुकम्मल खात्मा करे। हुकूमत-ए-पाकिस्तान ने लश्कर-ए-तैयबा सरगना हाफिज़ सईद, जैश-ए-मौहम्मद सरगना मौलाना अज़हर मसूद, नृशंस अपराधी दाऊद इब्राहीम, सरीखे तमाम भारत विरोधी दशहतगर्दों को प्रश्रय प्रदान किया। इन तमाम दहशतगर्द गुटों ने कश्मीर और शेष भारत में बर्बर जेहादी आतंक मचाना जारी रखा। पाकिस्तान की सरजमीं पर विद्यमान सारे दहशतगर्द सरगनाओं को हुकूमत-ए-पाकिस्तान अंतराष्ट्रीय कानून के तहत तत्काल भारत सरकार के हवाले करे। हुकूमत-ए-पाकिस्तान अपनी इंटैलिजैंस एजेंसी आईएसआई पर पूरी तरह से कड़ी लगाम कसे और आईएसआई को भारत विरोधी गतिविधियां खत्म करने का सख्त हुक्म जारी करे। पाक-अधिकृत कश्मीर में आतंकवादी प्रशिक्षण शिवरों को तत्काल बंद किया जाए।हुकूमत-ए-पाकिस्तान आतंकवाद के प्रश्न पर अपनी पाखंडपूर्ण दोरंगी नीतियों का तत्काल परित्याग करे। कश्मीर को हथियाने के प्रयास में आतंकवादी गिरोहों को प्रबल प्रश्रय प्रदान करके पाकिस्तानी राजसत्ता ने वस्तुतः पाकिस्तान को ही विध्वंस कर डालने की दुर्भाग्यपूर्ण राष्ट्रीय राजनीति का सृजन किया है जो आखिरकार विनाशकारी सिद्ध होगी। पाकिस्तान और भारत के मध्य कूटनीतिक वार्ता तभी कामयाब हो सकती है जबकि हुकूमत-ए-पाकिस्तान आत्मघाती कुटिल कूटनीति का परित्याग करके भारत को अपने ही कुनबे का राष्ट्र समझे, जिससे कि वह साम्राज्यवादी साजिश के कारण 1947 में विलग हो गया था।भारत और पाकिस्तान दोनों ही वस्तुतः न्यूक्लियर बमों से लैस राष्ट्र हैं, जोकि 67 वर्ष पुरानी दुश्मनी को खत्म करके समूची दुनिया के समक्ष शांतिपूर्ण सह-अस्तीत्व का मार्ग प्रशस्त कर सकते हैं। इसके पश्चात किसी भी ताकतवर साम्राज्यवादी देश के लिए मौका फराहम ही नहीं रह जाएगा कि दोनों देशों के मध्य दुश्मनी के शोले भड़का कर अपनी युद्ध इंडस्ट्री से बेशुमार मुनाफा कमा सके। इसके लिए सबसे पहले पाकिस्तान को अपने दिलो-दिमाग से कश्मीर हड़पने की वहशियाना लालसा का पूर्णतः परित्याग करना होगा।

(पूर्व सदस्य नेशनल सिक्यूरिटी एडवाइजरी काऊंसिल)

 

Yezidis are distant relatives of Indian people


By: Shreepal Singh

Yezidi people living around Mount Sinjar in Kurdistan area of Iraq are in great distress today. They face the danger of total annihilation at the hands of ISIS. Who are these Yezidis? Where can we get some information about the origin of these people? There are many sources about their origin. One can go to the very well-known history book ” The Decline and Fall of the Roman Empire” by Edward Gibbon, which is a multi-volume work (71 chapters covering a period from the second century AD to the fall of Constantinople in 1453). There we find at the birth of Islam a people (most likely Yezidis) living in this (today’s Kurdistan) area worshiping a goddess whose eyes were gem-studded sparkling ones. (Refer: Chapter 50, page 801: “Description of Arabia and its in habitants – birth, character, and doctrine of Mahemet – he preaches at Macca – flees to Medina – propagates his religion by the sword – voluntary or reluctant submission of the Arabs – his death and successors – the claims and fortunes of Ali and his descendants: “The Decline and Fall of the Roman Empire, by Edward Gibbon; Wordsworth Classics of World Literature) Another source of their origin is their religion, which holds that there is the spirit taking birth from life to life and finally gets salvation. Their worship peacock, a bird that is not found in this part of the world. They put figure of snake on their doors. Another source of information about them is their ancient traditions: there was some war with their king and they had concluded a treaty with their opponent invoking Indra and some other Rig-Veda or Indian sounding names of Devatas. There are many Gotras in Kurdistan / Yezidi people that are also found in India; one such Gotra or surname common to both India and Kurdistan is: Bargoti. Also note that Kurdistan has “stan” attached to it, which means the land of Kurds. “Stan” is a Sanskrit derived name for “Land or place of a people”. A sure source of their origin could be found in their DNA analysis. Also get some more information about them here. There is some very interesting material on Yazidis here also, of which some parts are off the mark.

In all probability, Yezidis are distant relatives of Indian people. This is one consideration to keep in mind. Another consideration is: they are innocent human beings, who are being persecuted solely because of their religious belief. Today they are in mortal danger of their annihilation.  What Should India do to save them from annihilation?

India has a long tradition of offering refuge to suffering people: Jews; Parsees; Tibetans; Bangladeshis; etc. India is a rising world power and important actor in Asia and Asian affairs. India should offer refuge to Yezidis, till matters are cooled down.

One more lesson India should take from this incident: No one helps the one who is helpless. The whole world, UN, US, Russia, China, is watching impotently at the destruction of Yezidis. Today it is Yezidis, tomorrow it could be you or anybody else. So, Let India get strong at every cost: strong in science and technology, in military powers, in every spheres.

Today, India is fortunate to have Modi at the helms of affairs. He must remain firm in his pursuit of a great and strong India. We Indians have gone down in our own selfish pursuits and we Indians need tough treatment to get ourselves on the right track. See the world around us: it is burning. And we – and more than that our politicians – are indulging in ill motivated and selfish criticism of the man who has set before himself the goal of making India a strong nation.

महिलाओं की सुरक्षा के अनुत्तरित यक्ष प्रश्न


(प्रभात कुमार रॉय)

दिल्ली की सरजमीं पर अंजाम दिए गए निर्भया कांड की वहिशाना वारदात ने समस्त राष्ट्र को झकझोर कर रख दिया था। केंद्रीय हुकूमत के प्रति दिल्ली के नौजवानों के शानदार प्रतिरोध आंदोलन को समस्त देश के नागरिकों द्वारा अपना जबदस्त समर्थन प्रदान किया गया। महिला सुरक्षा के वैधानिक उपायों सुझाने के लिए अंततः केंद्रीय हुकूमत ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीष जस्टिस जेएस वर्मा कमेटी का गठन किया गया। जस्टिस जेएस वर्मा की अनुशंसाओं को लागू करने की खातिर बालात्कार कानून में बुनियादी बदलाव अंजाम दिया गया। जघन्य बालात्कार केस के तहत आरोपी मुलजिम पर केस साबित होने पर सजा को दस वर्ष से बढ़ाकर उम्रकैद कर दिया गया। इस बदलाव के बावजूद बालात्कार की वारदातों के आंकड़ों में कदाचित कमी नहीं आ सकी है। इसका सीधा अर्थ है वारदात अंजाम देने वाले दरिंदों के दिलों दिमाग में कानून का खौफ बिलकुल कायम नहीं हो सका है। तेजाब फेंककर महिलाओं के चेहरों को वीभत्स बना देने वाले खूंखार अपराधियों को सख्त सजा प्रदान करने के मक़सद से कानून में संशोधन करने का प्रयास किया जा रहा है जिसे अभी तक कामयाबी हासिल नहीं हुई है।

भारत के नागरिकों एवं विशेष कर समाज के सबसे कमजोर सामाजिक तबकों महिलाओं और दलितों की सुरक्षा की जिम्मेदारी हुकूमत पर आयद है। दुर्भाग्यवश कमजोर राजनीतिक इच्छाशक्ति के चलते हुए भारत के सरजमीं पर महिलाओं पर ढाए जाने वाले जघन्य अपराधों को कदाचित कम नहीं किया जा सका। वरन् महिलाओं के विरुद्ध जारी जघन्य अपराधों में निरंतर बढ़ोत्तरी दर्ज की गई। महिलाओं के विरुद्ध अपराधों की रोकथाम के लिए हुकूमत ने जिन अनुशंसाओं को स्वीकार किया गया, उनके तहत दस लाख महिलाओं की तादाद पर एक महिला थाना स्थापित करने का वादा किया गया था। किंतु दुर्भाग्यवश अभी तक प्रांतीय सरकारों द्वारा कोई कदम उठाया नहीं गया है, जिन पर कि कानून व्यवस्था को दुरुस्त करने की विशिष्ट जिम्मेदारी आयद है। महिलाओं के बरखिलाफ अंजाम दिए जाने वाले अपराधों पर त्वरित न्याय प्रदान करने के लिए विशेष फास्टट्रैक कोर्ट कायम करने की प्रबल अनुशंसा की गई थी, किंतु अभी तक इस दिशा कोई ठोस पहल अंजाम नहीं दी गई। पर्याप्त महिला पुलिस थानों के आभाव और त्वरित न्याय प्रदान करने वाले फास्टट्रैक अदालतों के घनघोर आभाव में महिलाओं पर घोर जुल्मों सितम ढाने वाले यौन अपराधों पर कड़ी लगाम कदाचित कसी नहीं जा सकी।

अत्यंत आवश्यकता इस बात की है कि यथाशीघ्र राष्ट्रीय स्तर पर पुलिस, प्रशासनिक और न्यायिक सुधारों के बाकायदा लागू किया जाए, ताकि हुकूमत महिला सुरक्षा पर किए गए अपने तमाम वादों को निभा सके। केवल कड़ी राजनीतिक इच्छाशक्ति को अपनाकर ही कोई हुकूमत अपने वादों के निभा सकती है अन्यथा पुलिस सुधारों की पहली सिफारशें धर्मवीर आयोग द्वारा 1990 में की गई थी जोकि सरकारी फाइलों में दर्ज होकर अभी तक अलमारियों की धूल चाट रहीं हैं। इसके पश्चात अनेक बार पुलिस सुधारों की तलवार तेज करने की बात सामने आई किंतु प्रत्येक बार सरकार अपने वादों से मुकर गई। भारत के राजनेताओं को लगता है कि यदि पुलिस सुधारो के बाकायदा संजीदगी के साथ लागू कर दिया गया को पुलिस का मनमाने तौर पर जारी नियंत्रण उनके हाथों से निकल जाएगा और पुलिस जिस तरह से भारत के आम नागरिकों की सुरक्षा करने के स्थान पर केवल राजनेताओं की सुरक्षा का अस्त्र बनकर रह गई है, वो स्थति समाप्त हो जाएगी इसी कारण जानबूझकर पुलिस सुधारों की कवायद आगे नहीं बढ़ पाती है। महिलाओं की सुरक्षा का प्रश्न भी आम नागरिकों की सुरक्षा के प्रश्न से पृथक करके कदाचित नहीं देखा जा सकता। देश की आधी आबादी को सुमुचित सुरक्षा प्रदान करने के लिए पुलिस व्यवस्था में बड़े पैमाने पर सुधार अंजाम देने होगें। दुनिया के अग्रणी राष्ट्रों में उदाहरण के लिए अमेरिका, इग्लैंड, रशिया और चाइना में एक लाख की आबादी पर पर औसतन पांच सौ पुलिस पर्सन तैनात किए जाते हैं, जबकि दुर्भाग्यवश भारत में एक लाख की आबादी पर महज 125 पुलिस बल तैनात रहा है। इसी तरह अग्रणी देशों में खुफिया पुलिस एजेन्ट्स की तादाद एक लाख पर तकरीबन एक सौ रहती है, जबकि भारत में जोकि आतंकवाद से ग्रसित देश रहा है, एक लाख की आबादी पर केवल दस खुफिया एजेन्ट्स तैनात रहे हैं। पुलिस बलों को पर्याप्त संख्या में तैनात किए बिना आधी आबादी की हिफाजत किस तरह मुमकिन हो सकती है। बड़ी संख्या में देश भर में महिला पुलिस थानों के कायम करने का वादा कागजी इसलिए रह गया कि राजनेताओं की प्राथमिकताओं में राष्ट्र की महिलाओं की सुरक्षा का सवाल कदापि शामिल नहीं रहा है। वह तो जब कभी दिल्ली में नौजवानों के प्रबल आंदोलन सरीखे आंदोलन का ज्वार शांत करने की गरज से कोई आयोग गठित कर दिया जाता है और फिर ज्वार शांत हो जाने पर राजनेतागण अपने द्वारा ही गठित आयोगों की सिफारिशों को ठंडे बस्ते में डालकर आराम से अपनी सत्ता कायम बनाए रखने की जुगत करने में मशगूल हो जाते हैं।

भारतीय राजनीति के इस अधोपतित चरित्र के कारण ही राजनीति का कुटिल अपराधीकरण संभव हो गया। जघन्य अपराधी बड़ी तादाद में संसद और विधान सभा की कुर्सियों पर बाकायदा विराजमान हो गए। अब सुप्रीमकोर्ट की जोरदार पहल पर कहीं बहुत देर से राजनीति के आपराधिक चरित्र को दुरुस्त करने की शानदार शुरुआत हुई है अन्यथा किसी राजनेता को अपराध सिद्ध हो जाने पर भी जेल भेजना पहले कहां संभव हो सका था। अब तो लालू यादव और रशीद मसूद सरीखे ताकतवर एवं प्रभावशाली राजनेताओं को जेल की सलाखों के पीछे वर्षो व्यतीत करने पड़ सकतें हैं।

आधी आबादी पर भी अपराधों का कहर तभी कहीं जाकर थम सकता है, जबकि राष्ट्र की राजनीति अति प्रबल इच्छाशक्ति का परिचय दे और यौन अपराधियों एवं महिलाओं पर आपराधिक अत्याचार और अनाचार अंजाम देने वाले सभी अपराधियों के दिलो-दिमाग में कानून और न्याय व्यवस्था की जबरदस्त खौफ-ओ-दहशत कायम हो सके। महिलाओं के उपर अंजाम दिए जाने वाले जघन्य अपराधों की रोकथाम करने के लिए राष्ट्र के संपूर्ण सांस्कृतिक और सामाजिक वातावरण को परिवर्तित करने की कोशिश भी करनी होगी, ताकि पश्चिमी संस्कृति के अंधानुकरण को समुचित तौर पर रोका जा सके। यौन आजादी की आड़ में सामाजिक दुराचार को बढ़ावा प्रदान किया जा रहा है। यौन अपराधों में इतना बड़ा इजाफा इस कटु तथ्य को इंगित करता है कि राष्ट्र के नैतिक संस्कारों और मूल्यों में किस कदर गंभीर गिरावट आ गई है। जिस प्राचीन राष्ट्र में महिला को देवी जगदंबा का स्वरुप करार दिया गया है, वहां वह भोग्या बनकर क्यों रह गई है? इस विकट तौर पर खराब स्थिति को सुधारने के लिए जिम्मेदारी राजनेताओं के साथ ही साथ सांस्कृतिक और धार्मिक पुराधाओं को अपना दायित्व संभालना होगा। महिलाओं के साथ दुराचारों, अनाचारों और अत्याचारों का निरतंर गति से वढ़ता जाना केवल राजनीतिक गिरावट का ही परिचायक नहीं है वरन सांस्कृतिक, नैतिक और धार्मिक पतन का भी द्योतक है। अतः इस प्रश्न का समुचित हल निकालने के लिए चौतरफा संग्राम करना होगा।

Give the status of permanent citizen to Taslima Nasrin


By: Parmanand Pandey, Advocate, Supreme Court (General Secretary IPC)

    I read in today’s newspapers that the long term VISA of the famous Bengali writer Taslima Nasrin has been extended for two months. She is a celebrated writer and her contribution to the literature has been immense. It is not only an insult to her but is a blot on the secular fabric of India which appeared to have been caved in the pressure of Islamic fundamentalists. I have gone through one of her novels ‘Lajja’ (Shame). It is a marvelous piece of literature. Its narrative is unique, full of empathy, sorrow, pain, suffering and heart-rending at places. She has vividly pictured in the novel the mindset of the bigots and fanatics of the Muslim community perpetrating atrocities on the Hindu minority of Bangladesh. Although it has been written in the background of anti-Hindu riots that broke after the demolition of the disputed structure of Ramjanmabhoomi-Babri Masjid on 6 December 1992, yet it provides the glimpse of the over-all pitiable conditions caused by fear and terror under which the Hindus have been living in Bangladesh, erstwhile East Pakistan, after partition of India in 1947.

The Hindus, living in Bangladesh from time a memorial, generation after generation have been made to live like second rather third class citizens. The Hindu community of Bangladesh has to suffer indescribable barbarities by goondas belonging to the Muslim community. Their properties have been plundered, houses have been burnt, women have been raped, children have been maimed, men have been killed and family after family have been forcibly converted to a religion in which they did not have even a iota of faith. Those wearing dhoties were targeted and forced to wear lungies, those celebrating Durga pooja were asked to become iconoclasts and the worshippers of cows were compelled to become beefeaters. Humanity has got ashamed of the savagery of such a scale. Lajja is, therefore, a very apt title of the novel.

The novel is very realistic one and is based on facts. The description might have some fictional touches here and there to make it readable but largely it is a true story. In the novel the main character Sudhamoy, a patriarch of the Hindu family feels that the Bangladesh is his motherland. He has been living under the impression that his motherland (Bangladesh) would not let him down. His wife Kiranmoyi stood by her husband, his son Suranjan also believed that nationalism will be stronger than communalism and he used to have more faith and trust in his Muslim friends then Hindu friends. Nilanjana is the young daughter, who asks her brother Suranjan to shift the family to the house of any Muslim friend for the safety. However, her all hopes were shattered when men, including the friends of his brother, turned into wolves in the wake of horrendous communal riots.

There are nearly 20 to 25 million illegal Bangladeshis living in India. Communal riots often break out in Assam, other Northeastern states, Bihar and Bengal because of illegal migrant Bangladeshis. All major cities of India are inundated with these illegal Bangladeshis. Prime Minister Narendra Modi has been saying during his election campaign that his government would see to it that illegal Bangladeshis are sent back to their country. Although, no tangible efforts seem to have been made so far to expatriate the Bangladeshis, yet what we find is that a famous writer like Taslima Nasrin’s, long-term visa has been extended only for two months. She is, without doubt, an epitome of courage, conviction and secularism. India must stand by like a rock behind her.

Taslima Nasrin’s stay in India will strengthen the roots of secularism. She is a victim of the fatwa of zealots even in India. She is arguably the most controversial writer of South Asia. Her grandfather was a Hindu, who converted to Islam not by choice but under compulsion. She is a medical doctor by education but has taken to full-time writing and is an acclaimed across the world. Meyebela, My Girlhood: A Memoir of Growing up Female in a Muslim World is Nasrin’s heart-wrenching account of a desperate childhood in Mymensingh, a relatively small town in Bangladesh. In this memoir (one of two volumes), Nasrin openly questions her religion, Islam, and its discrimination against women. Her sad and depressing childhood was an unfortunate byproduct of a unique combination of cruel elements, one of which was a repressive society where she says “I was simply supposed to accept without asking questions whatever the grownups decided to bestow on me, be it punishment or reward.” Her uncles horrifically abused this woman. Taslima Nasrin’s books are banned in Bangladesh but read with the great interest throughout the world. Even in India she has to live in anonymity because of the threat of religious tyrants. She is welcome to live in western countries but she longs to live in India, particularly in Calcutta because here she finds the affinity of the people and homogeneity of culture, language and eating habits.

It may be possible that this short sighted decision of extending the Visa only for two months might have been taken by bureaucracy without the knowledge of political leadership. However, now since the matter has become known to everybody, the Government of India must step in to grant her the status of a permanent citizen to Taslima; so that she may not have to face any further ignominy and insult.

%d bloggers like this: