महिलाओं की सुरक्षा के अनुत्तरित यक्ष प्रश्न

(प्रभात कुमार रॉय)

दिल्ली की सरजमीं पर अंजाम दिए गए निर्भया कांड की वहिशाना वारदात ने समस्त राष्ट्र को झकझोर कर रख दिया था। केंद्रीय हुकूमत के प्रति दिल्ली के नौजवानों के शानदार प्रतिरोध आंदोलन को समस्त देश के नागरिकों द्वारा अपना जबदस्त समर्थन प्रदान किया गया। महिला सुरक्षा के वैधानिक उपायों सुझाने के लिए अंततः केंद्रीय हुकूमत ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीष जस्टिस जेएस वर्मा कमेटी का गठन किया गया। जस्टिस जेएस वर्मा की अनुशंसाओं को लागू करने की खातिर बालात्कार कानून में बुनियादी बदलाव अंजाम दिया गया। जघन्य बालात्कार केस के तहत आरोपी मुलजिम पर केस साबित होने पर सजा को दस वर्ष से बढ़ाकर उम्रकैद कर दिया गया। इस बदलाव के बावजूद बालात्कार की वारदातों के आंकड़ों में कदाचित कमी नहीं आ सकी है। इसका सीधा अर्थ है वारदात अंजाम देने वाले दरिंदों के दिलों दिमाग में कानून का खौफ बिलकुल कायम नहीं हो सका है। तेजाब फेंककर महिलाओं के चेहरों को वीभत्स बना देने वाले खूंखार अपराधियों को सख्त सजा प्रदान करने के मक़सद से कानून में संशोधन करने का प्रयास किया जा रहा है जिसे अभी तक कामयाबी हासिल नहीं हुई है।

भारत के नागरिकों एवं विशेष कर समाज के सबसे कमजोर सामाजिक तबकों महिलाओं और दलितों की सुरक्षा की जिम्मेदारी हुकूमत पर आयद है। दुर्भाग्यवश कमजोर राजनीतिक इच्छाशक्ति के चलते हुए भारत के सरजमीं पर महिलाओं पर ढाए जाने वाले जघन्य अपराधों को कदाचित कम नहीं किया जा सका। वरन् महिलाओं के विरुद्ध जारी जघन्य अपराधों में निरंतर बढ़ोत्तरी दर्ज की गई। महिलाओं के विरुद्ध अपराधों की रोकथाम के लिए हुकूमत ने जिन अनुशंसाओं को स्वीकार किया गया, उनके तहत दस लाख महिलाओं की तादाद पर एक महिला थाना स्थापित करने का वादा किया गया था। किंतु दुर्भाग्यवश अभी तक प्रांतीय सरकारों द्वारा कोई कदम उठाया नहीं गया है, जिन पर कि कानून व्यवस्था को दुरुस्त करने की विशिष्ट जिम्मेदारी आयद है। महिलाओं के बरखिलाफ अंजाम दिए जाने वाले अपराधों पर त्वरित न्याय प्रदान करने के लिए विशेष फास्टट्रैक कोर्ट कायम करने की प्रबल अनुशंसा की गई थी, किंतु अभी तक इस दिशा कोई ठोस पहल अंजाम नहीं दी गई। पर्याप्त महिला पुलिस थानों के आभाव और त्वरित न्याय प्रदान करने वाले फास्टट्रैक अदालतों के घनघोर आभाव में महिलाओं पर घोर जुल्मों सितम ढाने वाले यौन अपराधों पर कड़ी लगाम कदाचित कसी नहीं जा सकी।

अत्यंत आवश्यकता इस बात की है कि यथाशीघ्र राष्ट्रीय स्तर पर पुलिस, प्रशासनिक और न्यायिक सुधारों के बाकायदा लागू किया जाए, ताकि हुकूमत महिला सुरक्षा पर किए गए अपने तमाम वादों को निभा सके। केवल कड़ी राजनीतिक इच्छाशक्ति को अपनाकर ही कोई हुकूमत अपने वादों के निभा सकती है अन्यथा पुलिस सुधारों की पहली सिफारशें धर्मवीर आयोग द्वारा 1990 में की गई थी जोकि सरकारी फाइलों में दर्ज होकर अभी तक अलमारियों की धूल चाट रहीं हैं। इसके पश्चात अनेक बार पुलिस सुधारों की तलवार तेज करने की बात सामने आई किंतु प्रत्येक बार सरकार अपने वादों से मुकर गई। भारत के राजनेताओं को लगता है कि यदि पुलिस सुधारो के बाकायदा संजीदगी के साथ लागू कर दिया गया को पुलिस का मनमाने तौर पर जारी नियंत्रण उनके हाथों से निकल जाएगा और पुलिस जिस तरह से भारत के आम नागरिकों की सुरक्षा करने के स्थान पर केवल राजनेताओं की सुरक्षा का अस्त्र बनकर रह गई है, वो स्थति समाप्त हो जाएगी इसी कारण जानबूझकर पुलिस सुधारों की कवायद आगे नहीं बढ़ पाती है। महिलाओं की सुरक्षा का प्रश्न भी आम नागरिकों की सुरक्षा के प्रश्न से पृथक करके कदाचित नहीं देखा जा सकता। देश की आधी आबादी को सुमुचित सुरक्षा प्रदान करने के लिए पुलिस व्यवस्था में बड़े पैमाने पर सुधार अंजाम देने होगें। दुनिया के अग्रणी राष्ट्रों में उदाहरण के लिए अमेरिका, इग्लैंड, रशिया और चाइना में एक लाख की आबादी पर पर औसतन पांच सौ पुलिस पर्सन तैनात किए जाते हैं, जबकि दुर्भाग्यवश भारत में एक लाख की आबादी पर महज 125 पुलिस बल तैनात रहा है। इसी तरह अग्रणी देशों में खुफिया पुलिस एजेन्ट्स की तादाद एक लाख पर तकरीबन एक सौ रहती है, जबकि भारत में जोकि आतंकवाद से ग्रसित देश रहा है, एक लाख की आबादी पर केवल दस खुफिया एजेन्ट्स तैनात रहे हैं। पुलिस बलों को पर्याप्त संख्या में तैनात किए बिना आधी आबादी की हिफाजत किस तरह मुमकिन हो सकती है। बड़ी संख्या में देश भर में महिला पुलिस थानों के कायम करने का वादा कागजी इसलिए रह गया कि राजनेताओं की प्राथमिकताओं में राष्ट्र की महिलाओं की सुरक्षा का सवाल कदापि शामिल नहीं रहा है। वह तो जब कभी दिल्ली में नौजवानों के प्रबल आंदोलन सरीखे आंदोलन का ज्वार शांत करने की गरज से कोई आयोग गठित कर दिया जाता है और फिर ज्वार शांत हो जाने पर राजनेतागण अपने द्वारा ही गठित आयोगों की सिफारिशों को ठंडे बस्ते में डालकर आराम से अपनी सत्ता कायम बनाए रखने की जुगत करने में मशगूल हो जाते हैं।

भारतीय राजनीति के इस अधोपतित चरित्र के कारण ही राजनीति का कुटिल अपराधीकरण संभव हो गया। जघन्य अपराधी बड़ी तादाद में संसद और विधान सभा की कुर्सियों पर बाकायदा विराजमान हो गए। अब सुप्रीमकोर्ट की जोरदार पहल पर कहीं बहुत देर से राजनीति के आपराधिक चरित्र को दुरुस्त करने की शानदार शुरुआत हुई है अन्यथा किसी राजनेता को अपराध सिद्ध हो जाने पर भी जेल भेजना पहले कहां संभव हो सका था। अब तो लालू यादव और रशीद मसूद सरीखे ताकतवर एवं प्रभावशाली राजनेताओं को जेल की सलाखों के पीछे वर्षो व्यतीत करने पड़ सकतें हैं।

आधी आबादी पर भी अपराधों का कहर तभी कहीं जाकर थम सकता है, जबकि राष्ट्र की राजनीति अति प्रबल इच्छाशक्ति का परिचय दे और यौन अपराधियों एवं महिलाओं पर आपराधिक अत्याचार और अनाचार अंजाम देने वाले सभी अपराधियों के दिलो-दिमाग में कानून और न्याय व्यवस्था की जबरदस्त खौफ-ओ-दहशत कायम हो सके। महिलाओं के उपर अंजाम दिए जाने वाले जघन्य अपराधों की रोकथाम करने के लिए राष्ट्र के संपूर्ण सांस्कृतिक और सामाजिक वातावरण को परिवर्तित करने की कोशिश भी करनी होगी, ताकि पश्चिमी संस्कृति के अंधानुकरण को समुचित तौर पर रोका जा सके। यौन आजादी की आड़ में सामाजिक दुराचार को बढ़ावा प्रदान किया जा रहा है। यौन अपराधों में इतना बड़ा इजाफा इस कटु तथ्य को इंगित करता है कि राष्ट्र के नैतिक संस्कारों और मूल्यों में किस कदर गंभीर गिरावट आ गई है। जिस प्राचीन राष्ट्र में महिला को देवी जगदंबा का स्वरुप करार दिया गया है, वहां वह भोग्या बनकर क्यों रह गई है? इस विकट तौर पर खराब स्थिति को सुधारने के लिए जिम्मेदारी राजनेताओं के साथ ही साथ सांस्कृतिक और धार्मिक पुराधाओं को अपना दायित्व संभालना होगा। महिलाओं के साथ दुराचारों, अनाचारों और अत्याचारों का निरतंर गति से वढ़ता जाना केवल राजनीतिक गिरावट का ही परिचायक नहीं है वरन सांस्कृतिक, नैतिक और धार्मिक पतन का भी द्योतक है। अतः इस प्रश्न का समुचित हल निकालने के लिए चौतरफा संग्राम करना होगा।

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