भारत और पाकिस्तान मे कैसे खत्म हो शत्रुता?

(प्रभात कुमार रॉय)

कश्मीर के प्रति अपनी गहन प्रतिबद्धता प्रदर्शित करने की गरज से भारत और पाकिस्तान के मध्य अंजाम दी जाने वाली परस्पर कूटनीतिक वार्ताओं से ठीक पहले भारत स्थित पाकिस्तान के हाईकमिश्नर और जम्मू-कश्मीर के पृथकतावादी लीडरों के मध्य दोस्ताना मुलाकातें प्रायः पहले भी होती रही हैं। कांग्रेस की कयादत में संचालित हुकूमत द्वारा इन कुटिल रहस्यमय मुलाकातों को लेकर कभी भी कोई कड़ी कूटनीतिक प्रतिक्रिया का कदाचित इजहार नहीं किया गया। विदेश सचिव स्तर पर 25 अगस्त से प्रारम्भ होने वाली कूटनीतिक वार्ता से पहले पाकिस्तान हाईकमिश्नर के साथ कश्मीर के पृथकतावादी लीडरान की मुलाकात को नरेंद्र मोदी सरकार ने बहुत संजीदगी से लिया और इस मुलाकात को भारत के आंतरिक मामालात में पाकिस्तान की नाकाबिले बर्दाश्त दखंलदाजी करार दिया। भारत स्थित पाकिस्तान हाईकमिश्नर की इस बेजा हरकत को मद्देनजर रखते हुए नरेंद्र मोदी हुकूमत द्वारा भारत और पाकिस्तान के मध्य विदेश सचिव स्तर की कूटनीतिक वार्ता को बाकायदा रद्द कर दिया गया है। भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता सैयद अकबरुद्दीन ने शिमला समझौते की शर्तो का उल्लेख करते हुए बहुत कड़े अलफाजों में फरमाया कि पाकिस्तान के समक्ष एक ही कूटनीतिक मार्ग शेष बचा है कि वह भारत के साथ अपने सारे विवादों का समाधान केवल द्वपक्षीय वार्ता के तहत ही तलाश करें। कश्मीर के जटिल प्रश्न पर नरेंद्र मोदी हुकूमत का कूटनीतिक दृष्टिकोण यकीनन पूर्व की केंद्रीय सरकार से एकदम विलग प्रतीत हो रहा है।

सर्वविदित है कि हुर्रियत काँफ्रेस के पृथकतावादी लीडरों ने कश्मीर में जेहादी दहशतगर्दी के लिए अनुकूल समूचा वातावरण तशकील करने में सबसे अहम किरदार निभाया है। पाकिस्तान की पुश्तपनाही में और उसके सक्रिय समर्थन से ही  सन् 1988 से कश्मीर में आतंकवादी जेहाद प्रारम्भ हुआ था। पाक सरपरस्ती में कश्मीर में जेहादी आतंकवादियों की समस्त कारगुजारियों के जारी रहते हुए भी भारत सरकार ने विगत 15 वर्षो से परस्पर सहमति द्वारा कश्मीर समस्य़ा का निदान निकालने की खातिर कूटनीतिक वार्ता का दरवाजा सदैव खुला रखा। प्रथम अवसर है कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में हुकूमत-ए-हिंदुस्तान द्वारा पाकिस्तान की पाखंडपूर्ण दोहरी कूटनीतिक चालबाजियों के बरखिलाफ कड़े रुख का स्पष्ट परिचय दिया गया है। एकतरफ भारत के साथ कश्मीर समस्था का शांतिपूर्ण निदान निकालने के लिए पाकिस्तान द्विपक्षीय कूटनीतिक वार्ताएं अंजाम देता रहा है और दूसरी तरफ वही पाकिस्तान जेहादी प्राक्सीवार के जरिए कश्मीर को बलपूर्वक हड़प लेने की खूनी साजिशें भी बाकायदा अंजाम देता रहा है। पाक अधिकृत कश्मीर इलाके में आईएसआई द्वारा संचालित जेहादी प्रशिक्षण शिवरों के संचालन की संपूर्ण जानकारी पूरी तफसील के साथ भारतीय खुफिया ऐजेंसी रॉ के पास विद्यमान है। ऐसे कुटिल और दुष्कर हालातों  में पाखंडी पाकिस्तान के साथ कूटनीतिक वार्ता जारी रखने का कोई वाजिब औचित्य शेष नहीं रह जाता है।

भारतीय विदेशनीति के नियंता इस तथ्य को बखूबी जानते हैं कि पाकिस्तान की फौज दरअसल हकूमत-ए-पाकिस्तान की अंदरुनी पांतों में मौजूद एक खुदमुख्तार हुकूमत के तौर पर कार्य करती है। कश्मीर में सक्रिय आतंकी जेहाद के पृष्ठभूमि में सदैव ही पाक खुफिया ऐजेंसी आईएसआई विद्यमान रही है। खुफिया ऐजेंसी आईएसआई पर पाकिस्तान की नागरिक हुकूमत का कोई प्रभावी नियंत्रण कदापि स्थापित नहीं कर सकी है। पाक खुफिया ऐजेंसी आईएसआई वस्तुतः पाकिस्तानी फौज के नियंत्रण में अपना काम अंजाम देती आई है। पाक खुफिया ऐजेंसी आईएसआई का शीर्ष कमांडर भी पाक फौज का लेफ्टिनेंन्ट जनरल रैंक का अफसर होता है। भारत और पाकिस्तान के मध्य जारी कूटनीतिक वार्ताओं का सार्थक परिणाम इसलिए सामने नहीं आ रहा है, क्योंकि पाकिस्तान की फौज अपनी खुदगर्जी के कारण कश्मीर मसअले का शांतिपूर्ण समाधान बिलकुल भी नहीं चाहती है। स्मरण करें कि जिस वक्त पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी बाजपेई पाकिस्तान के तत्कालान प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के साथ कूटनीतिक वार्ता करने के लिए लाहौर यात्रा अंजाम दे रहे थे, तकरीबन उसी वक्त जनरल परवेज मुशर्रफ की कमांडरशिप में पाक फौज ने जेहादियों को अपनी ढाल बनाकर करगिल की गगनचुंबी पहाडियों पर साजिशन आधिपत्य जमा लिया था। नवाज शरीफ का दावा रहा कि प्रधानमंत्री के तौर पर उनको करगिल की पहाड़ियों पर पाक फौज द्वारा कब्जा जमाने की कारकर्दगी के विषय में कोई ठोस जानकारी नहीं थी। इसके विपरीत अपने संस्मरण में जनरल परवेज मुशर्रफ एकदम उल्टा दावा पेश करते हैं कि पाक फौज द्वारा करगिल में उठाए गए प्रत्येक कदम की जानकारी नवाज शरीफ को प्रदान की जाती रही थी।

सन् 1947 से ही कश्मीर को लेकर ही भारत और पाकिस्तान के मध्य भयानक क़शीदगी और जबरदस्त तनाव पनपा और परवान चढ़ा। सन् 1947 में ही हुकूमत ए पाकिस्तान ने वादी-ए-कश्मीर को बलपूर्वक हासिल करने के लिए अपनी संपूर्ण फौजी ताकत झोंक दी थी। कश्मीर पर आधिपत्य स्थापित करने के लिए जारी आतंकवादी प्राक्सी वार के तहत दोनो तरफ के तकरीबन एक लाख लोगों की हलाक़त के पश्चात भी पाकिस्तान को अभी तक कुछ भी हासिल नहीं हो सका। ऐतिहासिक तौर पर पाकिस्तान ने भारत के साथ तीन बड़ी फौजी जंगों में पूर्णतः पराजित होकर, अंततः कुटिल कुनीति के कारण 1971 में पूर्वी पाकिस्तान (बंगला देश) को गंवा दिया था। कश्मीर के प्रश्न पर संयुक्त राष्ट्र प्रस्ताव से भारत और पाकिस्तान के मध्य समझौते की दास्तान शुरु हुई और ताशकंद समझौता, शिमला समझौता, वाजपेयी की लाहौर यात्रा, आगरा सम्मिट आदि कितने ही कूटनीतिक प्रयास कश्मीर समस्या को निपटाने में एकदम नाक़ाम सिद्ध हुए। विगत 15 वर्षो से आपसी ताल्लुकात को दुरुस्त करने की दिशा में कूटनीतिक कोशिशें बाकायदा जारी रही। आपसी ताल्लुकात सुधारने की दिशा में दोनों देशों के मध्य गहन आर्थिक संबंधों में निरंतर जारी बढोत्तरी एक संभवतया एक नई इबारत की संरचना कर सकती है। भारत-पाकिस्तान के मध्य आपसी व्यापार तकरीबन तीन अरब डालर तक पंहुच चुका है, जिसके आगामी पांच वर्षों में तकरीबन 12 अरब डालर के विशाल स्तर तक पहुंच जाने की संभावना व्यक्त की जा रही है।

पाकिस्तान और भारत के मध्य ताल्लुकात सुधारने की प्रथम और अनिवार्य शर्त है कि हकूमत-ए- पाकिस्तान सुनिश्चित तौर पर भारत के बरखिलाफ जारी अघोषित आतंकवादी प्राक्सी वार का मुकम्मल खात्मा करे। हुकूमत-ए-पाकिस्तान ने लश्कर-ए-तैयबा सरगना हाफिज़ सईद, जैश-ए-मौहम्मद सरगना मौलाना अज़हर मसूद, नृशंस अपराधी दाऊद इब्राहीम, सरीखे तमाम भारत विरोधी दशहतगर्दों को प्रश्रय प्रदान किया। इन तमाम दहशतगर्द गुटों ने कश्मीर और शेष भारत में बर्बर जेहादी आतंक मचाना जारी रखा। पाकिस्तान की सरजमीं पर विद्यमान सारे दहशतगर्द सरगनाओं को हुकूमत-ए-पाकिस्तान अंतराष्ट्रीय कानून के तहत तत्काल भारत सरकार के हवाले करे। हुकूमत-ए-पाकिस्तान अपनी इंटैलिजैंस एजेंसी आईएसआई पर पूरी तरह से कड़ी लगाम कसे और आईएसआई को भारत विरोधी गतिविधियां खत्म करने का सख्त हुक्म जारी करे। पाक-अधिकृत कश्मीर में आतंकवादी प्रशिक्षण शिवरों को तत्काल बंद किया जाए।हुकूमत-ए-पाकिस्तान आतंकवाद के प्रश्न पर अपनी पाखंडपूर्ण दोरंगी नीतियों का तत्काल परित्याग करे। कश्मीर को हथियाने के प्रयास में आतंकवादी गिरोहों को प्रबल प्रश्रय प्रदान करके पाकिस्तानी राजसत्ता ने वस्तुतः पाकिस्तान को ही विध्वंस कर डालने की दुर्भाग्यपूर्ण राष्ट्रीय राजनीति का सृजन किया है जो आखिरकार विनाशकारी सिद्ध होगी। पाकिस्तान और भारत के मध्य कूटनीतिक वार्ता तभी कामयाब हो सकती है जबकि हुकूमत-ए-पाकिस्तान आत्मघाती कुटिल कूटनीति का परित्याग करके भारत को अपने ही कुनबे का राष्ट्र समझे, जिससे कि वह साम्राज्यवादी साजिश के कारण 1947 में विलग हो गया था।भारत और पाकिस्तान दोनों ही वस्तुतः न्यूक्लियर बमों से लैस राष्ट्र हैं, जोकि 67 वर्ष पुरानी दुश्मनी को खत्म करके समूची दुनिया के समक्ष शांतिपूर्ण सह-अस्तीत्व का मार्ग प्रशस्त कर सकते हैं। इसके पश्चात किसी भी ताकतवर साम्राज्यवादी देश के लिए मौका फराहम ही नहीं रह जाएगा कि दोनों देशों के मध्य दुश्मनी के शोले भड़का कर अपनी युद्ध इंडस्ट्री से बेशुमार मुनाफा कमा सके। इसके लिए सबसे पहले पाकिस्तान को अपने दिलो-दिमाग से कश्मीर हड़पने की वहशियाना लालसा का पूर्णतः परित्याग करना होगा।

(पूर्व सदस्य नेशनल सिक्यूरिटी एडवाइजरी काऊंसिल)

 

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