आरक्षण नीति पर पुनर्विचार करना होगा

प्रभात कुमार रॉय

गुजरात से लेकर उत्तर प्रदेश तक समस्त पश्चिमोत्तर प्रांतों में भारत में शासकीय नौकरियौं में आरक्षण को लेकर बड़ा बबाल मचा हुआ है। सुप्रीम कोर्ट की सख्त हिदायत है कि शासकीय सेवाओं में पचास फीसदी से अधिक आरक्षण प्रदान नहीं किया जा सकता है। गुजरात प्रांत में पटेल समुदाय के लिए शासकीय सेवाओं में समुचित आरक्षण की मांग के लिए भारी भीड़ जुटाने वाला 22 वर्षीय हार्दिक पटेल नामक युवक रातों रात मीडिया की सुर्खियों में एक सितारा बन गया। प्रमुख राष्ट्रीय टीवी चैनल उसके लंबे इंटरव्यू प्रसारित करने लगे । गुजरात प्रांत की धरती पर सन् 70 के दशक में नवनिर्माण आंदोलन और सन् 2000 के दशक में नरेंद्र मोदी के अतिरिक्त नौजवान पटेल समुदाय के लीडर के तौर पर उभरे हार्दिक पटेल ने ही इतनी बड़ी भीड़ गुजरात में जुटाई है। इसी तथ्य से ही स्पष्ट हो जाता है कि गुजरात के अपेक्षाकृत समृद्ध समुदाय पटेल के नौजवानों के मनमस्तिष्क में शासकीय सेवाओं में आरक्षण हासिल करने के लिए कितनी अधिक लालसा विद्यमान है। तकरीबन यही मन स्थिति जाट समुदाय के युवाओं में राजस्थान और उत्तर प्रदेश में व्याप्त रही है। राजस्थान का गुजर समुदाय तो आरक्षण को लेकर प्रायःसंघर्षरत रहा ही है।

देशभर में नौजवानों के मध्य बेरोजगारी की समस्या बहुत अधिक गंभीर बनी हुई है। उत्तरप्रदेश के एक अत्यंत तल्ख तथ्य पर दृष्टिपात करें, जहां कि सरकारी चपरासियों के मात्र तीन सौ अठसढ़ पदों के लिए तेईस लाख आवेदन पत्र दाखिल हुए हैं। इन तेईस लाख आवेदन पत्रों में तकरीबन एक लाख पचास हजार आवेदन करने वाले अभ्यार्थी तो उच्चशिक्षा प्राप्त युवक हैं, जिनमें 255 अभ्यार्थी तो पीएचडी हैं, बाकी इंजिनियर, एमबीए, पोस्ट ग्रजुएट आदि हैं। किसी जाति विशेष को आरक्षण हासिल हो जाने से उस जाति के नौजवानों को प्रतीत होता है कि आरक्षण प्राप्त हो जाने से उनको सरकारी नौकरी हासिल हो जाएगी। जबकि हकीकत यह है कि आर्थिक उदारीकरण को दौर में शासकीय नौकरियां बहुत ही कम रह गई हैं और फिर भी सारे देश में आरक्षण के लिए इतनी अधिक मारामारी मची हुई है। अभी राजस्थान सरकार द्वारा कथित तौर पर ऊंची जातियों के नौजवानों को आर्थिक पिछड़ेपन के आधार पर प्रांत की शासकीय नौकरियों में पांच प्रतिशत आरक्षण प्रदान किया गया है।

भारतीय संविधान के निर्माताओं में अधिकतर स्वातंत्रय सेनानी थे और अन्य उच्च कोटि के विचारक, कानूनविद् और समाजशास्त्री थे। भारतीय संविधान के तहत शासकीय सेवाओं में 22 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था सदियों से उत्पीड़ित और शोषित दलितों और जनजातियों के लिए दस वर्षों को लिए की गई थी जोकि अभी तक दलितों के लिए क्रमशः15 प्रतिशत और जनजातियों के लिए सात प्रतिशत बना हुआ है। दुर्भाग्यवश आरक्षण प्राप्त दलितों और जनजातियों के मात्र चाढ़े चार प्रतिशत हिस्से का सामाजिक और आर्थिक उत्थान संभव हो सका है। भारत सरकार द्वारा प्रायोजित आर्थिक सर्वेक्षण में प्राप्त आंकड़े अत्यंत कड़वी हकीकत बयान करते हैं कि केवल साढ़े चार प्रतिशत दलितों और जनजातिय परिवारों की आय ही तकरीबन दस हजार रुपए से अधिक है। भारत के साठ करोड़ भारतीय नागरिक मात्र एक हजार रुपए महीने की आय पर किसी तरह से जिंदा है। भारतवर्ष के तकरीबन 15 करोड़ भारतीय तो द्ररिद्रतम जीवन व्यतीत करने पर विवश हैं। अत्यंत तल्ख हकीकत बयान करती है कि शासकीय नौकरियों में आरक्षण नीति से आखिर कितने दलित और जनजातिय परिवारों का भला संभव हो सका है। अतः फिर से इस तथ्य पर विस्तार से विचार किया जाने की आवश्यकता है. दलितों और जनजातियों के लिए प्रचलित आरक्षण नीति के द्वारा इनकी अंदरुनी पांतों में एक क्रिमी लेयर का बाकायदा निर्माण हो चुका है। अतः दलितों और जनजातियों के मध्य निर्मित हुई क्रिमी लेयर को जातिय आरक्षण व्यवस्था से बाहर किए बिना आरक्षण के वास्तविक अधिकारी वंचित दलितों और जनजातियों के नौजवानों को आरक्षण का लाभ कदापि प्रदान नहीं किया जा सकेगा। संवैधानिक तौर पर आरक्षण व्यवस्था केवल सामाजिक और आर्थिक तौर पर सदियों से दबे हुए और कुचले हुए लोगों के लिए की गई थी, किंतु वास्तविक व्यवहार में दलितों और जनजातियों के मध्य ताकतवर बन चुके लोग ही, अब आरक्षण फायदा उठा रहे हैं। तकरीबन यही हालात मंडल कमीशन के अनुशंसा के आधार पर सामाजिक तौर पर पिछड़ी हुई जातियों को प्राप्त हुए आरक्षण की हो गई है। सामाजिक तौर पर पिछड़ी हुई जिसमें कि कथित तौर पर पिछड़ी हुई ताकतवर जातियों ने अन्य वास्तविक कमजोर जातियों को पीछे धकेल कर शासकीय आरक्षण नीति का समस्त फायदा उठा लिया है।

सामाजिक तौर पर सदियों से दबे कुचलों दलितों और पिछड़ी हुई जातियों को प्रदान किए गए संवैधानिक आरक्षण का वास्तविक लाभ जातियों में विद्यमान ताकतवर तबकों (क्रिमी लेयर) द्वारा उठा लिया जाता है। पूर्णतः परिवर्तित सामाजिक परिस्थिति में भारतीय संविधान द्वारा जातिय आधार पर प्रदान की गई आरक्षण नीति पर फिर से विचार करने का वक्त आ चुका है। सामाजिक और आर्थिक हालात बयान कर रहे हैं कि आरक्षण नीति के तहत दलित और पिछडे हुए लोगों का आर्थिक उत्थान नहीं हो सका है। दलितों और पिछड़े हुई जातियों को शासकीय नौकरियों की उत्कट लालसा को भी त्यागना होगा और समावेशी आर्थिक विकास दर्शन के माध्यम से स्किल इंडिया के प्रयोजन को साकार करके प्रशिक्षित और दीक्षित होकर स्वरोजगार की दिशा में भारत को आगे बढ़ना होगा। मौकापरस्त राजनीतिक पार्टियों का नेतृत्व वोट बैंक के लालच में जातिय राजनीति अंजाम देता रहा है और जातिय आधार पर आरक्षण की मांग उठाकर लोगों को गोलबंद करता रहा है। विकृत राजनीतिक तत्वों द्वारा वस्तुतः जातिय आरक्षण के नाम पर की जाने वाली यह जातिय गोलबंदी समस्त भारत के लिए विनाशकारी सिद्ध हो सकती है। भारत अब एकजुट होकर आर्थिक विकास के मार्ग पर आगे बढ़ने के लिए उत्सुक हो उठा है। छोटे और मंझोले उद्योग धंधों की तेजी के साथ बढ़ोत्तरी भारत के नौजवान बेरोजगारों की विकट समस्या का समाधान कर सकता हैं। भारत के करोड़ो नौजवान केवल शासकीय नौकरियों को हासिल करने की आस लगाए बैठे हैं, क्या वे सरकारी नौकरियां कभी प्राप्त कर सकेगें, जोकि संख्या में कुछ लाख ही हैं। खेती किसानी को अत्याधिक तरजीह प्रदान करके ही कृषि प्रधान राष्ट्र भारत द्वारा अपनी विकट बेराजगारी समस्या निदान निकाला जा सकेगा। किसान और बाजार के मध्य बिचोलियों को पूर्णतः हटाकर किसान को अपनी उपज का पर्याप्त मूल्य मिल सकेगा तो खेतीबाड़ी छोड़कर शहरों में मजदूरी और नौकरी तलाश करने वाले यकीनन कम हो सकेगें। राष्ट्र की एकजुटता बनाए को रखना और भारतीय समाज को जातिय और सांप्रदायिक आधार पर विभाजित होने से रोकना प्रत्येक देशभक्त का पुनीत कर्तव्य है। इसके लिए केवल जातिय आधार पर निर्मित की गई आरक्षण नीति पर फिर से खुलकर विचार विमर्श करने का वातावरण संपूर्ण देश में बनना चाहिए, ताकि मुठ्ठीभर सरकारी नौकरियों की चाह में देश का नौजवान जातिय तौर पर विभक्त होकर ही न रह जाए और कहीं भारत की सामाजिक समरसता और एकजुटता के परखचे न उड़ जाए। भारतीय संविधान के मूल भाव और भावना के अनुरुप ही आरक्षण नाति का पुनर्निर्माण किया जा सके, ताकि सामाजिक और आर्थिक रुप से दबे कुचले दलितों और पिछड़ो को ही आरक्षण प्राप्त हो सकें।

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