नोटबंदी – अंधेरे मे ध्रुव तारे से राह

श्रीपाल  सिंह

भारत में सरकार द्वारा ५०० और १००० रुपये के करेंसी नोटों को चलन से बाहर कर दिया गया है। जिस देश में सवा – डेढ़ अरब लोग रहते हों वहां इस कदम से होने वाली अफरा तफरी को कोई भी आदमी बखूबी समझ सकता है। यह क्यों किया गया है? क्या इस देश की राजनैतिक लीडरशिप ऐसा कदम उठाने के बजाय आराम से और बिना किसी अफरा तफरी के अपने बचे हुए कार्य काल को पूरा नहीं कर सकती थी ? आखिरकार क्या जरूरत थी इस संकटपूर्ण और जोखिम भरे कदम तो उठाने की ? यह सरकार भी सामान्य तौर पर अपने से पहले की ७० वर्षों की सरकारों की तरह समय गुजार सकती थी।  आम तौर पर सभी राजनैतिक नेता ऐसे ही आराम से समय गुजारना पसंद करते रहे हैं।  पहली बार किसी नेता ने – भारत के प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी – ने आज़ादी के बाद ऐसा जोखिम भरा कदम उठाया है।  आखिर क्यों ?

हमें किसी भी कदम को समझने के लिए उस कदम के पीछे रहने वाले आदमी की नीयत और चरित्र को समझना चाहिए। नरेंद्र मोदी एक आध्यात्मिक चरित्रवान व्यक्ती हैं।  लेकिन इस बात से बहुत से लोग सहमती नहीं रखेंगे।  आओ, इस असहमती का महत्व समझने के लिए हम एक बार फिर वही पैमाना इस्तेमाल करें और देखें की इस तरह की असहमती रखने वाले आदमी का व्यक्तिगत चरित्र कैसा है।  जिस आदमी का अपना व्यक्तिगत चरित्र नीचे स्तर का है, उसकी असहमती का कोई भी महत्व नहीं है। असहमती व्यक्त करने वाले राजनैतिक लोगों का व्यक्तिगत चरित्र कैसा है,  यह हम जनता के विवेक पर छोड़ते हैं।

सचमुच में भारत में सभी लोग इस कदम से बहुत परेशानी में हैं।  यह एक तरह का उनका बलिदान है।  इस कदम के क्या परिणाम होंगे ? उम्मीद है इस कदम से भारत एक शक्तिशाली और आधुनिक देश होकर निकलेगा।  आओ हम एक विहंगम दृष्टी डालें – दुनिया की एक बड़ी तस्वीर में भारत को समझें और इस तरह के कदम की जरूरत को समझें।

प्रकर्ति का अस्तित्व बड़ा रहस्य पूर्ण है ; चाँद, सितारे, पृथ्वी, जीवन, मानव सभी कुछ अनूठे रहस्य से भरे हैं।  ऐसे रहस्य जो मधुर आश्चर्य हैं; जो बुद्धिमानो में बच्चों जैसा कौतुहल जगाते हैं; जो सभ्यताओं को जन्म देने वाले अग्रदूतों, वैज्ञानिकों और महापुरषों को पैदा करते हैं।  इन रहस्यों में सबसे अधिक रहस्य पूर्ण हैं : मानव और मानव जाति की विकास यात्रा।

काल चक्र के पथ पर , जिसे हम इतिहास कहते हैं , बहुत सी सभ्यताएं उभरी हैं और नष्ट हुईं हैं। उन सभ्यताओं के समक्ष कई बार संकट के भयावह क्षण आये।  कई बार उन संकटों को हल कर लिया गया और कई बार उनको हल नहीं किया जा सका और वे नष्ट हो गईं।  लेकिन हर बार वे सभ्यताएं केवल कुछ जातियों या राष्ट्रों तक ही सीमित रही थी।

आज एक बार फिर हमारी सभ्यता के संकट ग्रस्त होने के स्पष्ट संकेत मौजूद हैं। लेकिन इस बार सभ्यता का यह संकट एक देश या जाति तक सीमित नहीं है।

इस बार संकट पहले से अधिक व्यापक और संहारक होगा।  समूची मानव जाति इस संकट की चपेट में आ सकती है और पृथ्वी पर जीवन का अस्तित्व ही दांव पर लग सकता है।

आज का संकट उस मानव के पतन का संकट है जिसके हाथ में जन संहारक शस्त्र हैं ; यह उसकी सभ्यता के पतन का संकट है।  यह उस संधिकालीन युग का संकट है जहाँ एक ओर तो आधुनिक सभ्यता अपने सार रूप में जर्जर हो कर अपने जीवन के सांध्यकाल में पहुँच गयी है लेकिन दूसरी ओर एक ऐसी बेहतर और नयी सभ्यता जन्म नहीं ले पाई है जो पुरानी का स्थान ले सके।

इस संकट के निवारण पर ही मानव जाति का भविष्य निर्भर करता है।

आज की दुनिया को विज्ञानं ने सचमुच ही एक छोटा सा गाँव मात्र बना कर रख दिया है।  संचार से लेकर युद्ध, पर्यावरण, व्यापार, संस्कृति आदि तक कोई भी देश शेष दुनिया से कट कर अलग थलग नहीं रह सकता।

जो राष्ट्र और संस्कृतियाँ मानव जाति की समस्याओं को समझने और उनको हल करने में जागरूक हो कर पहल करेंगे वे दुनिया को रास्ता दिखायेंगे और मानव जाति  के भविष्य को अपनी समझ, आकांक्षाओ और मर्जी के मुताबिक़ गढ़ेंगे और जो देश अपने अंतर्विरोधों और झगड़ों में उलझे रहेंगे उनके लिए इसके अलावा और कोई दूसरा विकल्प नहीं होगा कि वे दूसरों की बनायी सभ्यता , संस्कृति और विश्व व्यवस्था में अपने आप को ढालें।

पिछले सौ वर्षों में पश्चिमी देशों द्वारा की गयी प्रगति ने हमारी दुनिया को अभिभूत कर दिया है और उनकी सभ्यता आज मानव जाति की सभ्यता बन गयी है।  उनकी संस्कृति के मानदंड और कीर्तिमान पृथ्वी के एक कोने से दूसरे कोने तक मान्य हैं।  हमारे सभ्य होने की पुष्टि उस संस्कृति की अवधारणाओं से माप कर होती है।  स्वतंत्रता, समानता, धर्म निरपेक्षता, प्रजातंत्र, मुक्त स्पर्धा, भोगवाद  और समाजवाद जैसे बौद्धिक अवधारणाओ को नितांत पवित्र, शाश्वत सत्य  और सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। उनकी अपूर्णता की ओर इंगित करने का अर्थ असभ्य संस्कृति का प्रतीक मात्र है।

पश्चिमी सभ्यता, जिसे आधुनिक सभ्यता कहा जाता है, के ये तथाकथित ऊँचे मानदंड – स्वतंत्रता और समानता जैसी बौधिक अवधारणाएं – वास्तव में पूर्वी देशों – जिन्हें आज पिछड़ा कहा जाता है – की आध्यात्मिक सभ्यता के खंडहरों  में से बाक़ी बची अच्छी चीजों पर ही  निर्मित हुई है।

लेकिन  आज पूर्वी देशों के लोग अपनी उस सभ्यता के बाक़ी बचे अवशेषों – पुराने खडहरों – से ही चिपके हुए हैं। ये लोग अपनी सभ्यता के खंडरहित अवशेषों – धर्म, मंदिर, मस्जिद, जाति, दहेज़, पर्सनल क़ानून, जेहाद, धर्म  राज्य आदि आदि – को अभी भी सीने से लगाये फिर से उसके लौट आने का इन्तजार कर रहे हैं।

लेकिन वह पुरानी सभ्यता फिर से लौट कर नही आ सकती; वह पुरानी सभ्यता फिर से आधुनिक मानव की गौरवपूर्ण सभ्यता नहीं बन सकती।  प्रकर्ति का यह नियम है कि वह आगे के ओर बढ़ती है, पीछे की ओर नहीं लौटती।  अब वह पुरानी सभ्यता एक मृत-सभ्यता है।

लेकिन पश्चिमी देशों की आज की सभ्यता – तथाकथित आधुनिक सभ्यता – भी अपने वर्तमान वैभव के बावजूद अब बहुत दिनों तक आधुनिक मानव द्वारा स्वीकार्य सभ्यता नहीं बनी रह सकती।

आधुनिक सभ्यता अपने पतन के कगार पर खडी हुई है।  इस सभ्यता के स्थान को लेने के लिए एक बेहतर , गंभीर और सशक्त सभ्यता ने अभी जन्म नहीं लिया है।  उसका जन्म लेना अभी बाक़ी है।

नयी सभ्यता के जन्म की प्रक्रिया एक युग परिवर्तन की तरह है। इस नई सभ्यता के जन्म लेने की शुरुआत इस बात से होगी कि पहले हमारी दुनिया नए सत्यों – विज्ञान द्वारा उद्घाटित सत्यों – को स्वीकार करे और उन सत्यों को अपनी संस्कृती में स्थान दे, वे सत्य उसकी रोजमर्रा की जिंदगी के हिस्सा बनें।

यह सब कुछ एक तरह से मानव के गहनतम और अंतस्थल के मनोवैज्ञानिक मर्मों और रहस्यों को उजागर करने और उनके अनुसार सांस्कृतिक मूल्यों को गढ़ने की प्रक्रिया होगी। इसमें मनोवैज्ञानिक और परा – मनोवैज्ञानिक खोजों और सत्य का बहुत बड़ा योगदान होगा; आज जहाँ तक विज्ञान नए मनोवैज्ञानिक और परा – मनोवैज्ञानिक सत्यों को खोज रहा है, वहां से सभी तरह के अध्यात्मवाद की मात्र शुरुआत भर होती है, किसके आगे बहुत कुछ बाक़ी है।  सौभाग्य से इस क्षेत्र में अति प्राचीन समय से भारत का लगभग एकाधिकार रहा है। नयी सभ्यता की बुनियाद उन्ही मूल्यों और मानदंडों से निर्मित होना निश्चित है।

भारत अपनी अत्यन्त प्राचीन काल से चली आ रही जिन्दा सभ्यता के अपने लम्बे अनुभव के बल पर उस नई सभ्य्ता को निर्मित करने मे दुनिया की बहुत मदद करेगा।

लेकिन भारत को पहले अपना पिछड़ापन दूर करना होगा।

इतिहास बताता है कि कमजोर की अच्छी बात भी कोइ नही मानता और ताकत वर के द्वारा कही गयी बाते दुनिया के लिये आदर्श बन जाती है।

हम जानते है कि १९३० और १९४० के दशक मे जब सोविएत संघ जब अपने चरम उत्कर्ष पर था तो सारी दुनिया में समाजवाद, मजदूर किसान का हक़, सबके लिए रोटी कपड़ा और मकान आदि सारी दुनिया के लिए आदर्श बन गए थे, इस बात की परवाह किये बिना कि वहां पर सोचने विचारने की आज़ादी, इंसानों की बराबरी, मानव अधिकार आदि को कुचल दिया गया है. इसी तरह आज पश्चिमी देश और यूनाइटेड स्टेट ऑफ़ अमेरिका अपने चरम उत्कर्ष पर है तो आज भोग वाद, भौतिक सम्पन्नता, प्रतिस्पर्धा, बोलने विचरने की आज़ादी, समानता, मानव अधीकार आदि दुनिया के आदर्श बने हुए हैं, बिना इस बात की परवाह किये कि यहाँ मजदूर किसान का शोषण होता है, सबको रोटी कपड़ा मकान नहीं मिलता, यहाँ केवल पैसे वालो की आज़ादी है, रोबोट आ जाने पर बेरोजगारी व्यापक इंसानी बीमारी बन ने के करीब है।

आज उस सभ्यता को जन्म लेना और विश्व स्तर पर स्थापित होना है जो इन सब समश्याओं को बेहतर तरीके से सुलझा सके।

ऐसी सभ्यता जन्म लेने की तैयारी में है और भारत का उसमे बहुत बड़ा योगदान होगा।

लेकिन अभी रात्री का अन्धेरा है। सवेरा होने में अभी कुछ देर है।

मानव मन की गहराईयों में आधुनिक सभ्यता के प्रति एक अस्वीकृति का भाव है ; उसके मनोवैज्ञानिक अस्तित्व के अंतस्थल में एक छटपटाहट और बैचेनी है।

ये भाव ही नयी सभ्यता के जन्म लेने की तैयारी के संकेत हैं।

नयी सभ्यता के जन्म को संभव बनाने के लिए आधुनिक विज्ञान उर्वर भूमि तैयार करने में लगा है।

आधुनिक सभ्यता के इस संकट काल में – दो सभ्यताओं के इस संधिकाल में – विज्ञान और उसके द्वारा उद्घाटित सत्य ही अस्थिर मानव-मन के लिए सहारा और आशा की किरण हैं।

भारत अभी भी अपने ७० वर्षों के हर क्षेत्र में पिछड़ेपन के बोझ को ढो रहा है।  बिना इस पिछड़ेपन को दूर किये भारत एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकता।

दुनिया में कई देशों में इस तरह के पिछड़ेपन को दूर करने के लिए “कम्युनिस्ट झंडे ” के तले बंदूकों का उपयोग किया था और वे विश्व शक्ति बन गए।  आज चीन उनमे से एक है।

भारत को अपना पिछड़ापन दूर करना है और विश्व शक्ति बनने का उसका बिल्क़ुल ही दूसरा लक्ष्य है, जो मानव जाति के सुख-शांति और कल्याण के लिए है, तथा उसे यह काम शांतिपूर्ण और लोकतान्त्रिक तरीके के करना है।

भारत के प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी आज इसी काम में जुटे हैं।  यह एक कठिन काम है. भारत एक कठिन दौर से गुजर रहा है. आओ हम भी इसमें सहयोग करें।

इस युग परिवर्तन की बेला में, आओ , हम भारतवासी जागृत हों, संगठित हों और पहल करें राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मानव जाति के भविष्य को गढ़ने में, नयी बेहतर और स्वर्णिम सभ्यता के स्थापन में !

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1 Comment (+add yours?)

  1. Santanu Dey
    Dec 18, 2016 @ 18:17:01

    A great article indeed! Is India on the verge of donning the mantle of Jagatguru again? I can clearly see Narendra Modi as a World Leader in great demand (not that he already is not) from all the other tall leaders of the world for fulfillment of their goal for their nations. Already many of today’s powerful world leaders look up to him in their time of need, though they don’t admit it verbally but soon they will announce him as the leader of leaders in the World Polity and we in India will bask in his glory.

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