प्रतिध्वनि – एक नाटक

श्रीपाल सिंह

(नोट :- “प्रतिध्वनि” एक नाटक है जो अगस्त १९६६ में लेखक ने १६ वर्ष की आयु में लिखा था।  यह नाटक ‘राजनैतिक मार्क्सवाद’ से इतर ‘सांस्कृतिक मार्क्सवाद’ पर आधारित है।  सन १९६६ में यह कल्पना भी नहीं की जा सकती थी कि ‘राजनैतिक मार्क्सवाद’ का एक विचारधारा के रूप में कभी अंत भी हो जाएगा। ५० वर्ष बाद आज २०१७ में हम जानते हैं कि ‘राजनैतिक मार्क्सवाद’ पूरी दुनिया से अब समाप्त हो चुका है। इक्के दुक्के चीन और उत्तरी कोरिया जैसे देशों में भी – जहाँ मार्क्सवाद के नाम पर सरकारें चल रहीं हैं – वहां भी यह कार्ल मार्क्स की दार्शनिक अवधारणा पर आधारित उसका राजनैतिक स्वरुप न होकर एक तरह  से पूँजीवाद और तानाशाही की खिचड़ी मात्र है। लेकिन उस मरे हुए ‘राजनैतिक मार्क्सवाद’ की एक तरह से गूँज के रूप में ‘सांस्कृतिक मार्क्सवाद ‘ आज भी हमारी दुनिया में अपनी श्रेष्ठता  को स्थापित करने के लिए हाथ पांव मार रहा है।  हालाँकि ऐसी किसी भी कोशिश का कोई भी ‘सैद्धांतिक या दार्शनिक’ आधार नहीं रह गया है फिर भी दुनिया में अभी भी बहुत से ऐसे लोग हैं जो बिना मार्क्स का सहारा या नाम लिए मार्क्स की भाषा में बात करते हैं और समाज में प्रतिष्ठित बने हुए है – उदाहरण के लिए अमेरिकी चिंतक नओम चोमस्की ऐसे ही व्यक्ति हैं, भारत में रामचंद्र गुहा, कोठारी आदि ऐसे ही बहुत से लोग हैं।  इन लोगों के पास अपनी बात कहने का हालाँकि कोई सैद्धांतिक आधार नहीं बचा है, फिर भी ये लोग कोई नयी चीज खोजने के बजाय एक तरह से पुराने घिसे पिटे सिद्धांत की लाश को ढो रहे हैं।  एक तरह से  हम यह कह सकते हैं कि सन १९६६ में लिखा गया यह नाटक आने वाले समय की एक पूर्व द्रष्टि जैसी थी , जो समय के साथ सही साबित हुई। प्रस्तुत है नाटक ‘प्रतिध्वनि ‘)

प्रतिध्वनि 

मंच सज्जा :

स्थान : पृथ्वी

समय : २१वी शताब्दी

अवस्था: पृथ्वी पर सर्व मान्य मानव अधिकार

पात्र :

तूफ़ान —- भौतिकवाद

सेनापति —— तूफ़ान का शिष्य  उत्तराधिकारी

सेना ——— फुरिये , ओवेन , काँट , हेगेल , फायरबाक, बाबयेफ, एंगेल्स  और मार्क्स

तूफ़ान का प्रहरी ——- यूरोप

इमारत —- राष्ट्र

दीवार —– प्रदेश और जिले आदि

शांति —– आम नागरिकों का आध्यात्मिक आरोहण की ओर झुकाव

शांत कोना —– शांति का शिष्य और उत्तराधिकारी

शांत कोने का प्रहरी —- भारत

पवित्र दूध —- संस्कृति

मक्खन —- आध्यात्मिक संस्कृति का सार

गूँज —- तूफ़ान के अंध विश्वासी भक्त

प्रथम अंक 

(चारों ओर भयंकर तूफ़ान का शोर है, ऊँची ऊँची इमारतें टूट फुट कर धराशायी हुई जा रही हैं।  हवा की गूँज से सारा वातावरण काँप रहा है।  इमारतों के टूटे टुकड़े , वृक्षों के बड़े बड़े डण्ठल और सूखे घास फूंस हवा में उड़ कर तूफ़ान को और भी तेज कर रहे हैं।)

तूफ़ान – देखता हूँ ! मेरी गति को कौन धीमी कर सकता है।  कहाँ है वह शांति, जो प्रेम , धर्म और चहुंमुखी नीरवता से वातावरण अपवित्र कर रही है।  यदि कहीं हो तो सामने आवे, मैं देखता हूँ ! मिथ्या डींग हांकने वाली , कुलकलंकिनी !

(तूफ़ान कुछ और तीव्र हो जाता है )

तूफ़ान – प्रहरी !

प्रहरी – हाँ, महाराजाधिराज, आज्ञा हो।

तूफ़ान – सेनापति को भेजो !

प्रहरी – जो आज्ञा महाराज

(प्रहरी सेनापति को लेकर वापस आता है )

सेनापति – उपस्थित हूँ , आज्ञा दो , महाराज !

तूफ़ान – सेनापति , जानते हो , तुम मेरे विश्व विजयी वीर हो।  पहली बार मैंने तुम्हें भेजा, तुमने अपने प्रतिद्वंदी को अपनी इन कठोर भुजाओं से एक ही प्रहार में धराशायी कर दिया था।  याद है ! उस बार मैंने तुम्हे थोड़े ही शस्त्र दिए थे, सिर्फ काँट , हेगेल और फायर बाक ही , शेष फुरिये , ओवेन , बाबयेफ आदि की टुकड़ियां थी।  और तुमने एक भी शस्त्र या सैनिक खोये बिना दुश्मन को मार गिराया था।

सेनापति – याद है महाराज !

तूफ़ान – इस बार मै तुम्हें फिर आज्ञा देता हूँ , तुरंत जाओ और उस शांति को , उस कुलकलंकिनी , अतिमानसिक मिथ्यात्व की डींग हांकने वाली शांति को, कुचल दो।  उसे पृथ्वी लोक से सदैव के लिए निष्काषित कर दो !

सेनापति – महाराज की जय हो , आज्ञा पूर्ण होगी।  पर महाराज ज़रा सी दया आती है , वह बेचारी पृथ्वी लोक से निकाल दिए जाने पर कहाँ जाएगी! उसका पृथ्वी के अतिरिक्त अभी तक कोई और ठिकाना नहीं है।  वह अनंत काल तक नभ मंडल मेँ यूँ ही विचरण करती फिरेगी और यह व्यवहार पृथ्वी की आदिम निवासिनी को शोभा नहीं देता।  इसमें पृथ्वी वासियों की और आपकी भी निंदा है, महाराज!

तूफ़ान – तो उसे समाप्त कर दिया जाय।  जाओ , तुरंत !

सेनापति – महाराज ऐसा नहीं हो सकता !

तूफ़ान – ओह ! ये हिम्मत ! इतने दिनों से मेरे पास रह रहे हो क्या मुझे अभी तक नहीं जाना तुमने !

(तूफ़ान भयंकरता से गरज उठता है , पृथ्वी पर भूकंप आता है।  समुद्र में नाव डूबने लगाती है , यात्रियों का करुण चीत्कार और पृथ्वी पर करुण क्रंदन महाव्योम तक व्याप्त हो जाता है।  )

सेनापति – (काँप कर ) महाराज ! ढ्रष्टता के लिए क्षमा हो ! निर्दोषों की कष्ट से मुक्ति हो।  मैं आपके बल को अच्छी तरह जानता हूँ।

(तूफ़ान कुछ शांत हो जाता है )

सेनापति – महाराज मैं एक निवेदन करना चाहता हूँ।

तूफ़ान – कह !

सेनापति – महाराज आपने अपने ‘ द्रव्य की अविनाशिता ‘ के मन्त्र में कहा है कि ‘जो एक बार उत्पन्न हो चुका है उसे कभी नष्ट नहीं किया जा सकता ‘ .

तूफ़ान – हाँ , सत्य कहा है और यह भी कहा है कि ‘ जो वर्तमान में है वह कभी भी उत्पन्न नहीं हुआ ‘ .

सेनापति – पर महाराज , मेरा मतलब यहाँ शांति से है।

तूफ़ान – उस कुलकलंकिनी से !!!

सेनापति – हाँ महाराज ! वह एक बार उत्पन्न हो चुकी है , इस आपके मंत्रानुसार वह अब कैसे मर सकती है?

तूफ़ान – ठीक याद दिलाया ! एक समस्या।  है।  पर वह पृथ्वी से तो जानी ही चाहिए।  हाँ , वह अभी कुछ दिन के लिए पृथ्वी  अतिरिक्त अन्य किसी ग्रह मंगल आदि में रह सकती है।  फिर बाद में हम उसे वहां से बाहर निकाल देंगे , प्रकृति अनंत है।  और कुछ। … !

सेनापति –  नहीं महाराज।

तूफ़ान – सेनापति ! मैं तुम्हे पहले से उत्तम दो और अस्त्र दे रहा हूँ।  लो , यह रहा ‘डार्विन का विकासवाद ‘ ! यह अकेला ही इस कार्य के लिए पर्याप्त होगा।  यह लो दूसरा है ‘मार्क्सवाद ‘ ! इसे गुरुमंत्र समझो।  यह विज्ञान का ताज़ा उपहार है।  इसमें भूतकालिक शस्त्रों से श्रेष्ठ गुण हैं।  इसलिए मैं इसे ब्रह्माश्त्र ककता हूँ।   विश्वास है कि इसके सामने सब कुछ चकनाचूर हो जाएगा।  अब शीघ्र जाओ !

सेनापति – जो आज्ञा महाराज ! मुझे आपकी विजय में किंचित भी संदेह नहीं है।  जाता हूँ।

द्वितीय अंक  

(चारों ओर छाये भयंकर तूफ़ान के बीच पृथ्वी का एक कोना निश्छल नीरव है।  कोने के आस पास मकान डगमगा रहे हैं , दीवारें झूल झूल कर धरती से स्पर्श कर रही हैं पर कोने में निश्चल निश्तब्धता छाई हुई है।  सेनापति वहां पहुँच कर उसके इर्द गिर्द मंडराने लगता है। )

सेनापति – क्या चुप्पी साध रखी है ! अंधविश्वास , निकल बाहर , दूर हो यहाँ से ! यहाँ गुरु का साम्राज्य स्थापित होगा! देख , तेरे सब साथी भाग गए रूस के पादरी भाग गए , जर्मनी के पादरी भाग गए , चीन के बौद्ध भाग गए , तिब्बत के लामा भाग गए, उज़्बेकिस्तान  … ताजिकिस्तान  … के मुल्ला मौलवी भाग गए  … चेकोस्लोवाकिआ  …. पोलैंड  … किस किस को गिनाऊँ ! जल्दी कर  … देर हो रही है ! भगोड़ों के सरदार , वेद , ऋषि मुनि , योगी , भगवान् , बुद्ध , महावीर , रामकृष्ण परमहंस, विवेकानंद , श्री अरविन्द , धर्म कर्म , साधू सन्यासी  … तेरी भी बारी आ चुकी है  …. जल्दी कर !

(सेनापति की तूफानी गूँज शांत कोने से टकराती है और प्रतिध्वनि उत्पन्न हो कर सेनापति के गुरु तूफ़ान के कानों तक वापिस पहुँचती है )

क्या चुप्पी है    ….. जल्दी कर   …. (प्रतिध्वनि की आवाज )

सेनापति – हूँ ! स्वयं चुप है, मेरी बात ही मुझे सूना रहा है ! ढोंगी , अंधविश्वासी , मिथ्या , आडम्बर , हजारों साल से जमा बैठा है  इस लिए हठ कर रहा है ! जिददी , अपने साथियों को देख और उनका अनुशरण कर।  अब तेरा समय भी समाप्त हो चुका है !

(सेनापति की आवाज की फिर प्रतिध्वनि  उत्पन्न होती है और तूफ़ान तक जा पहुँचती है )

….. हूँ  ….. समय समाप्त हो चुका है … (प्रतिध्वनि की आवाज )

सेनापति –  यह क्या तरीका है प्रतिद्वंदी के साथ व्यवहार करने का , यदि प्रति उत्तर के लिए शस्त्र नहीं हैं तो चुपचाप पराजय स्वीकार कर ले ! स्वयं कोई उत्तर नहीं  …. मेरे ही शब्द मुझे लौटा दिए।  और वह भी प्रथम और अंतिम,   मध्य के शब्द नदारद  …..

….. क्या चुप्पी है   …. जल्दी कर  ….. हूँ   …… समय समाप्त हो गया है  ….

(पुकार कर कहता है ) – मैं कहता हूँ : तेरा समय समाप्त हो गया है !

…… तेरा समय समाप्त हो गया है। … (प्रतिध्वनि फिर तूफ़ान तक पहुँचती है )

सेनापति – पाजी ! नहीं मानता , तो ले अब मैं अपना पहला अस्त्र  फेंकता हूँ , ले ! डार्विन का विकासवाद …

(विकासवाद शांत कोने की निश्तब्धता को भांग किये बिना उसमे आ कर एक ओर स्थिर हो जाता है, साथ ही  अस्त्र की नवीन सिरे से मरम्मत प्रारम्भ हो जाती है और वह पहले से अधिक चमक दार दिखाई देने लगता है )

सेनापति – अच्छा , तो यह धौका , भ्रम हुआ , बच गया ! तो अबके कहाँ जाएगा , हिम्मत हो तो बच ! ले संभाल मार्क्सवाद !

(लगातार प्रहारों के प्रति उत्तर में भयानक विस्फोट होता है और दूसरा अस्त्र  भी पहले के समकक्ष जा कर स्थिर हो जाता है।  इसके बाद नीरवता और भी गहरी हो जाती है )

सेनापति – ओह ! कितनी मनहूस नीरवता छाई हुई है और में शस्त्र हीन , अकेला और निरालम्ब रह गया हूँ।  ओह !! डर लग रहा है, भाग चलूँ , जन्मदाता गुरु महाराज ही इस भय से त्राण देंगे।

(अस्त्र हीन होकर गुरु तूफ़ान तक जाता है )

सेनापति – महाराज ! रक्षा करो , रक्षा करो !

तूफ़ान – मै अशुभ सूचक संकेत पहले ही सुन चुका हूँ फिर भी मै देखता हूँ उसे , मुझे सब मालूम है , मै स्वयं चलता हूँ !

तृतिया अंक  

(तूफ़ान और सेनापति उस शांत कोने पर एकाएक बाज़ की भांति झपट पड़ते हैं।  पर वह कोना फिर भी शांत बना रहता है और वे इसमें एक ओर गिर पड़ते हैं )

तूफ़ान – सेनापति ! मै यह क्या देखता हूँ ! ये मेरे दोनों ही शस्त्र यहाँ ! ऐ ! ये अधिक चमकदार कैसे हो गए।  सेनापति ! उठा लो इन्हें यहाँ से !

(सेनापति खिसकना चाहता है पर एकाएक चारो ओर भयानक शीतल , श्वेत बर्फ छा जाती है और सेनापति शिथिल पद जाता है )

सेनापति – महाराज !

(तभी एकदम श्वेत कपूर सा शीतल प्रकाश फ़ैल जाता है और उसमे सुनहेरी धुप सी दिव्य रूपरेखा प्रकट होती है )

सेनापति – मै मर रहा हूँ , मेरा रूपांतर हो रहा है, महाराज !

तूफ़ान – मुझमे ध्यान रख कर जीवित रह !

(तभी उस आध्यात्मिक दिव्य सी रूपरेखा से क्षुद्र हजारों घंटियों से कानाफूसी जैसी ध्वनि आती है)

ध्वनि – आध्यात्मिक पुनर्जागरण ! मेरे पुत्रों , आध्यात्मिक पुनर्जागरण !

रे , अपने भूतपूर्व विजित साम्राज्य के अधिपति तूफ़ान को संतुष्ट तो कर।  केवल जीवित रख , रूपांतर मत कर , रूपांतर होने दे !

(इसके साथ ही सुन्हेरी धुप सी चारों ओर फैलने लगती है , वातावरण को प्रेम और गंभीरता से भरने लगती है और मृतप्राय डार्विन और मार्क्स अंतिम सांसें गिनते से बुदबुदाते लगते हैं )

डार्विन – रे , तूफ़ान क्या चाहता है तू !

तूफ़ान – मैं चक्रवर्ती हूं और चाहता हूँ कि तुम्हारे इस नवीन गुरु धुमैले सी रंगी रोशनी को पृथ्वी से निकाल बाहर करूँ और तेरे इस नए और मिथ्या रूप को धो कर तुझे पहले की भांति अपने पास रखूं।

डार्विन – पर अब तो तेरे जीवन का ही प्रश्न है !

तूफ़ान – अरे , नमकहराम ! तू मेरा हो कर क्या मुझे ही धौका देगा ? कल तक पालपोस कर तुझे इतना बड़ा किया और आज , जबकि सब उत्तराधिकार तुझे सौंपना भर बाकी रह गया था , तू विद्रोहियों से आ मिला ! शर्म नहीं आई तुझे , अपने स्वामी को धौका देते हुए ! या  तू वह पहले वाला डार्विन नहीं है।  लगता है तू डार्विन नहीं है , तुझे तो डार्विन के रंग में रंग दिया गया है।

डार्विन – क्रोध और अविवेक त्याग , देख और विश्वास कर ! सुन मई वही पहले वाला डार्विन हूँ।  मुझे किसी डार्विन के रंग में नहीं रंगा गया है।  मै पहले भी यही डार्विन था अब भी वही डार्विन हूँ।  पर मै यहाँ भाग कर नहीं आया. अपने स्वामी को धौका देकर भी नहीं आया।  मुझे यहाँ अनिवार्य रूप से आना था , यदि मै यहाँ न आता तो तुम्हारे पास भी मैं कभी न पहुंचा होता।  तुम्हारे लिए , मुझे यहाँ आने से रोकना , अपने पास से भगाना है।  क्योंकि मैं विकास का प्रतिनिधि हूँ और यदि विकास में रुकने का गुण होता तो वह तुम्हारे पास तक कभी न आया होता।  कान खोल कर सुन और मनन कर! मैंने पहली बार ऊर्जा का साथ त्याग कर कठोर और मुर्दा पदार्थ का साथ दिया , फिर उस कठोर और मुर्दा पदार्थ का साथ छोड़ कर नवीन रूप में पहली बार उसमे प्रकट हुए जीवन के साथ जा मिला, उसके बाद उस अधकचरे जीवन के घोंघों कप रोता बिलखता छोड़ जमीन पर दौड़ने वाले पशुओं से साथ हो लिया , फिर उन जंगली जानवरों से नाता तोड़ कर मानवों के साथ उनकी गुफाओं में रहने लगा।  अब मैं आधे – अधूरे मानवों का साथ कब तक दूंगा ? यह तो मेरा स्वाभाव ही है और इसी खूबी के कारण ही तुमने मेरा दामन थामा था. अब समय देख मैंने अपनी अगली मंजिल की ओर कदम बढ़ा दिए हैं ताकि मैं अपना अगला ठिकाना ढूंढ सकूँ।  तेरी दृष्टि में तो मैंने तुझे ही नहीं , इन सब दुखियों को धौका दिया है पर क्षमा कर, मैं विवश हूँ क्योंकि यही मेरा जीवन है।

तूफ़ान – ओह ! मुझे विश्वास नहीं आता , मेरी बुद्धि भ्रस्ट हो रही है सम्भवत मुझे धोका दिया जा रहा है।  ओह ! सबसे बड़ा दुःख तो मुझे इसी बात का है कि  ….  कि मेरे अस्त्र ही मेरे विरुद्ध प्रयोग किये जा रहे हैं।

(तूफ़ान अधमरा सा हो जाता है पर बाहर फिर भी उसकी अव्वज की प्रतिध्वनि दीवारों को तोड़ती फिरती रहती है )

डार्विन – शोक न कर , और मेरी बातों का स्मरण कर ; मैंने कहा था प्रकर्ति के संघर्ष में जो शक्तिशाली और श्रेष्ठ होता है , वह ही विजय प्राप्त करता है  और जो विजय प्राप्त करता है केवल वही जीवित रहता है।  तू निर्बल है , तेरी पराजय हो चुकी है इसलिए शोक न कर और शांति से मर जा।  ओह ! ये क्या, बेहोशी !

(तूफ़ान बेहोश हो जाता है और वे दोनों उसके होश में आने की प्रतीक्षा करते हैं )

डार्विन – रे , न्याय , शांति  और विकास के पुजारी मार्क्स ! विद्रोह की अग्नि की चिंगारी ! तूने तो अन्याय के विरुद्ध खूब लड़ाई लड़ी है , बता अब क्या कहता है ?

मार्क्स – क्या कहा ! अग्नि और चिंगारी ! तू ही बता भला ऐसा कौन है जो इस शांत कोने में आकर कुछ देर भी सुलगा रह सका हो ? यहाँ जो भी आया अपनी आग बुझा कर शांत हो गया।  इस कोने में न जाने कैसी करामात है , जो आया रूपांतरित हो गया।  आर्य आये , यूनानी आये , मुस्लिम आये,  विलीन हो गए।  सिकंदर आया , चंगेज आया , दोनों ही बुझ गए।  अब हम आये , और अपना हाल देख रहे हैं. यहाँ खिली यह दिव्य सी धूप ने हमें विकास की अगली मंजिल दिखा दी है जो हम पहले नहीं देख पाए थे।

मार्क्स और  डार्विन (परस्पर संवाद में ) – हम मरे नहीं हैं , हमारा रूपांतर हो गया लगता है !

(बाहर मार्क्स और डार्विन की प्रतिध्वनि फिर भी गूंजती रहती है )

Advertisements

1 Comment (+add yours?)

  1. Trackback: साहित्यिक कोना : कवितायेँ और नाटक | Indian People's Congress

Leave your reply:

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s

%d bloggers like this: