आखिर क्यों बिलबिलाये हुए हैं सभी मोदी-विरोधी ?


 

Lord Shiva’s Brihadeeswarar Temple: Marvel of Ancient Indian Architecture!


Lord Shiva Brihadeeswarar temple was built between CE 1003 and 1010 in Thanjavur, Tamil Nadu by Raja Raja Chozhani. It is a fine example of ancient Indian Architecture.

 

A Bangalore Girl Questios Rahul Gandhi, “Can You Compare With Narendra Modi?”


Source Credit: Karunaada Vaani

A Bangalore girl has written an open letter questioning Rahul Gandhi, which is going viral on social media. She asks Rahul Gandhi himself to decide whether he can be compared with Narendra Modi:

1) Millions of people follow Narendra Modi as their leader, they accept him as their role model, how many people in our country consider you Mr Rahul Gandhi their role model?

2) The country which doesn’t want to recognise itself as a ‘country of dynastic followers’ and identifies itself with an elected  leader Narendra Modi; but you represent the same dynasty which was rejected by people. Apart from having a Gandhi tag what is your achievement?

3) Every year Narendra Modi on his birthday meets his mother and she gifts him with Bhagvat Gita as an indication to follow the right path. Does your mother also do the same?

4) Narendra Modi, when he entered the Parliament for the first time, touched the floor of the house and called it the Temple of Democracy. Do you also consider the same? Have you ever respected the Parliament same way?

5) When he resigned as the Chief Minister of Gujarat after becoming PM, he donated 21 Lakhs rupees of his salary amount to the Children Education Fund of government staff. Have you ever contributed anything to the country, Rahul?

6) Under PM Modi leadership, in a span of 4 years, 478 terrorists have been shot dead. How many terrorists were killed when your government was in the power Rahul ji?

7) For 70 long years more than 30% of the poor people could not get a Gas connection, but Modi in a span of 4 years has given Gas connection to over 5 crore people. Why could your government not do it?

8) Modi doesn’t entertain any family favours or nepotism, but your family has dominated the entire Congress party and considers this party as their personal property. Why? How did Robert Vadra get so much favour when your government was in power?

9) The Doklam issue did not start after PM Modi government came to power; it  had started many years back when your government was in power. But PM Modi made the Chinese withdraw their troops, are you capable of doing that?

10) In a span of 4 years, there isn’t one corruption case against PM Modi or his government, can you show the period in your government when there was no corruption?

11) Your party people mock PM Modi as chaiwala. He accepts that he sold tea. Can you tell what your mother sold to become 4th richest Politician?

12) Narendra Modi travels to different countries for the benefit of Nation, can you tell for whose benefit do you go abroad?

13) PM Modi cleared OROP for soldiers, he got bulletproof jackets and helmets for our soldiers. What did your government give them?

14) He included more than 30 crore people into Jan Dhan Yojana within 3 years. Why wasn’t it possible in your 10 years rule?

15) In order to save girl child, PM Modi started Beti Bachao, Beti Padao campaign. What have you done to save girl child in the country, Rahul?

16) Modi started MUDRA, Life insurance schemes, which are benefiting crores of people in the country. How many schemes did you bring in 10 years?

17) Modi took brave decision to conduct surgical strikes in Pakistan, Burma and Bhutan to protect our borders. What did you do to protect our borders during your government?

18) Appreciating PM Modi’s work and leadership, he was invited by US, Britain, Australia, Canada, Bhutan, Sri Lanka, Afghanistan, Nepal and Japan to address their parliaments. How many countries invited you when you were in government?

19) In just 4 years, PM Modi became the most influential person, Times Person of the world. You were in politics since 2004, but what have you achieved?

20) Narendra Modi in front of 22,000 people in Madison Square Garden declared that we are not a Nation of beggars and snake charmers but a Nation of rulers. Do you have the spine to praise our Nation like that Rahul?

21) PM Modi works for 18 hours a day, he sleeps on flight to save time and money. How many hours do you work for the country, Rahul?

22) PM Modi has no strong political background, with his mere hard work and commitment and dedication he became the Prime Minister of the country. Are you capable of relinquishing the Gandhi tag and then achieving something with your potential?

23) At the age of 18 years, Modi left his home and joined RSS to serve the country. What were you doing at the age of 18 years, Rahul Gandhi?

24) Every citizen of this country would dream to achieve something like PM Modi, how many would want to follow you and become like you?

Rahul ji, it is not just the Gandhi tag what is required to this country but a person who can show the will and commitment to take the country forward.

धर्म-परिवर्तन पर उतारू ईसाई फादर की बोलती बंद हुई !


हिमांशु शुक्ला

क्रिसमस सायंकाल की घटना है. अपने शहर में एक मित्र के साथ संध्या भ्रमण पर निकला तो देखा कि शहर के एक चर्च में और उसके बाहर मेले जैसा माहौल है और भयंकर भीड़ उमड़ी पड़ी है.

चर्च के अंदर झाँका दो वहां छीना-झपटी चल रही थी. माजरा क्या है पता लगाने जब अंदर गया तो वहां देखा कि वहां फादर बाइबिल बाँट रहे थे और लोग समझ रहे थे कि नए साल की डायरी मुफ्त में बंट रही है। यह सरासर धोखाधड़ी थी।

कोलाहल की वजह मालूम हो गई पर फादर के लिए यह माहौल अपने मजहब को बेचने का बेहतरीन मौका था सो अपने तमाम बाईबिल की प्रतियों के साथ मंच पर चढ़ गए और हाथ में बाईबिल लेकर कहने लगे, “भाइयों, बहनों और प्यारे बच्चों. यह कोई डायरी नहीं है बल्कि प्रभु यीशु मसीह का पवित्र सन्देश है जिसे प्रभु ने सारी मानवजाति को सुनाने के लिए भेजा है. प्रभु यीशु आप सबको जिस गंदगी में जी रहे हैं उससे निकालने के लिए आया था, आप छोड़ दो पाखंडी अवतारों और झूठे ईश्वर मूर्तियों को पूजा और सारी मानवजाति के लिए उद्धारक बनाकर भेजे गए मसीहा की गोद में आ जाओ”.

जिस धर्म के प्रचार के लिए धोखाधड़ी का सहारा लिया जाये , यह बात उस धर्म के लिए बड़ी शर्म की बात होनी चाहिए। अच्छे या उत्तम धर्म के प्रचार के लिए , अच्छी या उत्तम नैतिकता भी होनी चाहिए। लेकिन बेशर्मी पर उतारू उन लोगों का क्या किया जाय जो किसी भी कीमत पर अपने धर्म को फ़ैलाने में लगे हों ? यह हाल है ईसाई धर्म प्रचारकों का जो भारत में अपने धर्म प्रचार के लिए सभी तरह के हथकंडे अपना रहे हैं।

मैंने फादर से पूछा , फादर मेरा एक सवाल है.

फादर- क्या ? पूछिए…

मैंने कहा आपने कहा कि ईसा को सारी मानवजाति के लिए उद्धारक बन कर भेजा गया था, ये बात बाईबिल में कहाँ लिखी है?

फादर- है बेटे, लिखी है.

मैंने कहा, फादर ! आपने शायद मेरा सवाल ठीक से नहीं सुना, मैंने पूछा कि बाईबिल में ये कहाँ लिखा है कि ईसा हम सब लोगों के लिए भेजे गए थे?

फादर मंच से नीचे उतर गए और मुझे न्यू टेस्टामेंट की एक प्रति थमाते हुए कहा, आप ये पवित्र किताब घर ले जाओ, इसके अंदर सबकुछ लिखा है.

मैंने कहा, मुझे मालूम है कि आप नहीं बताने वाले इसलिए यहाँ उपस्थित लोगों के भले के लिए मैं ही बता देता हूँ.

मैंने कहा, ईसा जब अपने बारह शिष्यों को धर्मप्रचार के लिए भेज रहे होते हैं तो उनसे कहते हैं जो बाईबिल में गोस्पेल ऑफ़ मैथ्यू (10:6) में लिखा है, “तुम गैर यहूदियों में मत जाना और न ही सामरियों के किसी नगर में जाना इसकी अपेक्षा केवल इजरायल के घराने की खोई हुई भेड़ों के पास जाना”।

मैंने फादर से कहा, आपकी बाईबिल के अनुसार तो ईसा ने अपने शिष्यों को केवल यहूदियों के पास जाने को कहा था और आप उनके शिष्य होकर हम गैर-यहूदियों के पास आ गए यानि आपने खुद ही अपने प्रभु की आज्ञा का उल्लंघन कर दिया ?

(फादर के चेहरे पर शिकन आ गई और तब तक भीड़ भी हमारे गिर्द इकठ्ठा हो चुकी थी और खामोशी से ये वार्तालाप सुन रही थी)

फादर ने कहा, नहीं बेटे ! वो तो प्रभु ने अपने शिष्यों को कही थी पर वो स्वयं सारी इंसानियत के उद्दारक बनाकर भेजे गए थे.

मैंने कहा, फादर ! फिर तो मुझे लगता है शायद आपने अपनी बाईबिल ठीक से पढ़ी नहीं क्यूंकि गोस्पेल ऑफ़ मैथ्यू (15:24) में खुद ईसा कहतें हैं, “मैं केवल इजरायल के घराने की खोई हुई भेड़ों के लिए भेजा गया हूँ”.

अब आप मुझे बताये कि झूठ ईसा बोल रहे हैं या आप ?

फिर मैंने भीड़ की तरफ मुखातिब होते हुए कहा कि इनके प्रभु को केवल यहूदियों के लिए भेजा गया था और ये लोग अपने प्रभु की ही आज्ञा का उल्लंघन कर हमारे पास आ गए अपना किताब बांटने और धर्म बेचने.

फादर के चेहरे पर हवाइयां उड़ रही थी और लोगों की अब दिलचस्पी बढ़ने लगी थी, ये देख मैंने भीड़ से पूछा, आपको पता है कि हमारे आपके जैसे एक गैर-यहूदी की हैसियत ईसा के नज़रों में क्या थी?

भीड़ से आवाज़ आई. बताइए.

मैंने फादर से पूछा, श्रीमान् ! ये बात आप इन्हें बताएँगे कि मैं इन्हें बता दूं?

फादर खामोश थे सो मैंने बोलना शुरू कर दिया. मैंने कहा, इनके बाईबिल के अनुसार गोस्पेल ऑफ़ मैथ्यू (15:21-26) में आता है कि ईसा जब सूर और सैदा क्षेत्र में धर्म प्रचार कर रहे थे तो उनके पास एक गैर-यहूदी महिला आई जिसकी बेटी को प्रेतात्मा लग गया था. वो ईसा से अनुरोध करने लगी कि मेरी बेटी से प्रेतात्मा निकाल दो. जब ईसा को ये पता चला कि ये महिला गैर-यहूदी है तो उन्होंने कहा, “कुत्तों के पिल्लों के आगे रोटी डालना ठीक नहीं”.

मैंने भीड़ से कहा, इनके बाईबिल के अनुसार इनके ईसा के नजर में हमारी हैसियत कुत्ते के पिल्लों की तरह है. ये सब सुनने आप सब यहाँ आयें हैं ?

भीड़ में कसमसाहट बढ़ने लगी और कुछ लोग आगे निकल से फादर से सवाल पूछने लगे.

फादर के पास एक नन भी आकर खड़ी थी, मैंने उनसे पूछा, आपने कभी ये कुत्ते वाली लाइन अपने बाईबिल में देखी कि नहीं? नन सर झुकाए हुए खामोश खड़ी थी.

मैंने फादर से पूछा, Who was the founder of Christianity?

फादर से पहले ही एक दूसरी नन तुरंत बोल उठी – जीसस

मैंने कहा, बाईबिल में कहीं भी नहीं लिखा है कि Jesus was founder of Christianity. बल्कि बाईबिल से तो ये मालूम होता है कि ईसा एक यहूदी पैदा हुए और एक यहूदी ही मरे और तो और उनको यहूदी धर्म में सुधार के मकसद से भेजा गया था न कि ईसाइयत के रूप में कोई नया मजहब शुरू करने.

अब फादर बोल उठे- आप जो भी कहोगे क्या हम मान लेंगे ? आप बताइए कि अगर ईसा ईसाइयत के जनक नहीं थे तो और कौन थे ?

मैंने कहा, ईसाई धर्म संत पॉल का आरंभ किया हुआ था न कि ईसा का और इस बात का प्रमाण खुद आपके बाईबिल में मौजूद है, आप न्यू टेस्टामेंट से गोस्पेल ऑफ़ मैथ्यू, 5:17 पढ़िए, वहां जीसस कहतें हैं, “तुम ये न समझो कि मैं व्यवस्था या नबियों को नष्ट करने आया हूँ. मैंने उन्हें नष्ट करने नहीं अपितु पूरा करने आया हूँ”.

(चर्च के ननों और अधिकारियों में खामोशी थी)

मैंने तुरंत अगला सवाल दागा- फादर ! आप मानते हैं कि बाईबिल ईश्वरीय ग्रन्थ है?

फादर ने कहा, हमें इस पर कोई शंका नहीं है कि यह ईश्वरीय किताब है.

मैंने कहा, वैरी गुड. मैं बस एक उदाहरण दूंगा जो साबित कर देगा कि आपकी ये किताब ईश्वरीय किताब नहीं है.

(भीड़ से आवाज़ आई, बताइए भाई..बताइए)

मैंने चर्च वालों से कहा, आप न्यू टेस्टामेंट के सबसे आख़िरी अध्याय पर जाइए और वहां जाकर 22 वें अध्याय की 18वीं तथा 19वीं वर्स को पढ़िए.

चर्च से तो नहीं पर भीड़ से एक उत्साही युवक ने पढ़ा. वहां लिखा था: “मैं प्रत्येक को जो इस पुस्तक की नबूबत के वचनों को सुनता है गवाही देता हूँ, यदि कोई इनमें कुछ बढ़ाएगा तो परमेश्वर इस पुस्तक में लिखी विपत्तियों को उस पर बढ़ाएगा और यदि कोई इस नबूबत की पुस्तक के वचनों को घटाएगा तो परमेश्वर इस पुस्तक में लिखित जीवन के वृक्ष और पवित्र नगरी से उसका भाग छीन लेगा”.

फादर से मैंने पूछा, फादर ! इस भाई ने आपकी बाईबिल से जो पढ़ा वो सही है ?

फादर- हाँ सही है पर आप कहना क्या चाहते हैं ?

मैंने कहा, आप सबको पता है कि ईसाई दुनिया आज मुख्यतया दो भागों में विभक्त है, रोमन कैथोलिक और प्रोटोस्टेंट?

कुछ ने कहा, हाँ…

मैंने फादर की ओर मुड़कर कहा कि रोमन कैथोलिकों के अनुसार बाईबिल में कुल 73 किताबें हैं, 46 ओल्ड टेस्टामेंट में और 27 न्यू टेस्टामेंट में तथा प्रोटेस्टेंट के अनुसार बाईबिल में केवल 66 किताबें ही हैं, 39 ओल्ड टेस्टामेंट में और 27 न्यू टेस्टामेंट में. यानि न्यू टेस्टामेंट की किताबों की कुल संख्या को लेकर दोनों में मतभेद नहीं है पर ओल्ड टेस्टामेंट की किताबों को लेकर दोनों सेक्ट्स में जबर्दस्त मतभिन्नता है. इसलिए कैथोलिक प्रकाशन के बाईबिल में ओल्ड टेस्टामेंट में 46 किताबें होती है और प्रोटेस्टेंट के द्वारा प्रकाशित बाईबिल के ओल्ड टेस्टामेंट में सिर्फ 39 किताबें.

मैंने फादर से कहा, फादर ! अब दोनों ही दावे तो सही नहीं हो सकते, इनमें से कोई एक ही तो सही होगा न? यानि अगर रोमन कैथोलिक सही हैं कि बाईबिल में कुल 46 किताबें ही है तो फिर प्रोटोस्टेंट गलत हैं क्यूंकि उन्होंने इसमें से 7 किताबें निकाल के बाहर फेंक दी और अगर प्रोटोस्टेंट सही हैं कि बाईबिल में केवल 39 किताबें ही है तो इसका अर्थ है कि रोमन कैथोलिक गलत हैं क्यूंकि उन्होंने इसमें 7 किताबें जोड़ दी?

अब आइये आपके बाईबिल के उस वर्स की ओर जिसे इस भाई ने अभी पढ़ा जिसमें लिखा है कि “अगर कोई इस ईश्वरीय किताब में कुछ जोड़ दे या इसमें से कुछ हटा दे तो प्रभु उस पर तमाम विपत्ति तो ढाएगा ही साथ ही स्वर्गिक राज्य से भी उसे वंचित कर देगा”

तो फादर स्थिति ये बन रही है कि ईसाईयत के इन दोनों बड़े समुदायों में कोई एक तो है जिसने इस किताब के निर्देश के खिलाफ गुस्ताखी की है इस लिए जरूर ही इनमें से किसी को ईश्वर ने इस किताब में वर्णित प्लेग, गंधक और आग की बारिश जैसे अज़ाबों से नवाज़ा होगा?

अब आप बताएं कि कब कैथोलिकों के ऊपर या प्रोटेस्टेंटो के ऊपर गंधक और आग की बारिश हुई थी या उन सबको इकट्ठे प्लेग हुआ था ?

फादर के पास कोई जबाब नहीं था तो मैंने कहा, आपके बाईबिल के इस एक वर्स ने आपके ईश्वरीय किताब के दावे की हवा निकाल दी.

फादर से मैंने कहा, चलिए इस बात को छोड़िये इतिहास में क्या जाना. खैर आप मुझे ये बताइए कि क्या आप ईसा के मानने वाले सच्चे विश्वासी हैं ?

फादर ने कहा, ये क्या बेहूदा सवाल है…मैं बिना विश्वासी हुए ही फादर हो गया ?

मैंने कहा, देखिये आप नाराज़ न हो…आपके बाईबिल के गोस्पेल ऑफ़ मार्क्स के अंतिम अध्याय के 17 से लेकर 18 वर्स में सच्चे विश्वासियों को पहचानने के लिए कुछ चिन्ह दिए गए हैं।

मैंने बाईबिल खोल के पढ़ते हुए कहा, इसमें लिखा है: “और विश्वास करने वालों में ये चिन्ह दिखाई देंगे; मेरे नाम से वो दुष्टात्माओं को निकालेंगे तथा नई-नई भाषाएं बोलेंगे, वो साँपों को उठा लेंगे और यदि वो प्राणघातक विष भी पी जाएँ तो इससे उनकी हानि न होगी, वे बीमारों पर हाथ रखेंगे और वो चंगे हो जायेंगे”

फादर, आप सच्चे विश्वासी हैं इसकी पुष्टि करने के लिए मेरे पास अभी सांप नहीं है जो मैं आपको उठाने के लिए दे सकूं और न ही विष है जो आपको खाने के लिए दूंगा. मेरे पास आपके बाईबिल का दिखाया हुआ दो रास्ता बचता है जिसके आधार पर मैं आपके सच्चे विश्वासी होने के पुष्टि कर सकता हूँ. एक तो ये है कि मैं बांग्ला भाषा बोल सकता हूँ तो आप पांच मिनट मुझसे बांग्ला में बात करके दिखा दें और अपने सच्चे विश्वासी होने का प्रमाण दे दें क्योंकि आपके बाईबिल के अनुसार एक सच्चा विश्वासी तो नई-नई भाषाएँ आसानी से बोल सकेगा या फिर दूसरा प्रमाण ये हो सकता है कि मेरे इस मित्र की माताजी लंबे समय से बीमार चल रही हैं, आप हमारे साथ चलिए और इनकी माता जी पर हाथ रखकर उन्हें चंगा कर दीजिये और अपने सच्चे विश्वासी होने का सबूत दे दीजिये.

निरुत्तर फादर के पास एक ही रास्ता बचा था जो हर लाचार आदमी चुनता है.

फादर ने मुझसे कहा, बेटे ! आप तर्क मत करो बस विश्वास करो तभी कुछ हासिल करोगे वरना भटक जाओगे.

अंग्रेजी या संस्कृत: कौन अधिक विकसित भाषा है?


कमांडर वी के जैटली

अंग्रेजी में ‘A QUICK BROWN FOX JUMPS OVER THE LAZY DOG’ एक प्रसिद्ध वाक्य है। अंग्रेजी वर्णमाला के सभी अक्षर उसमें समाहित हैं। किन्तु कुछ कमियाँ भी हैं :-

1) अंग्रेजी अक्षर 26 हैं और यहां जबरन 33 अक्षरों का उपयोग करना पड़ा है। चार O हैं और A,E,U तथा R दो-दो हैं।

2) अक्षरों का ABCD… यह स्थापित क्रम नहीं दिख रहा। सब अस्तव्यस्त है।

इसके विपरीत अब संस्कृत में चमत्कार देखिए !

क:खगीघाङ्चिच्छौजाझाञ्ज्ञोSटौठीडढण:।
तथोदधीन पफर्बाभीर्मयोSरिल्वाशिषां सह।।

(अर्थात्)- पक्षियों का प्रेम, शुद्ध बुद्धि का , दूसरे का बल अपहरण करने में पारंगत, शत्रु-संहारकों में अग्रणी, मन से निश्चल तथा निडर और महासागर का सर्जन करनार कौन? राजा मय कि जिसको शत्रुओं के भी आशीर्वाद मिले हैं।

आप देख सकते हैं कि संस्कृत वर्णमाला के सभी 33 व्यंजन इस पद्य में आ जाते हैं। इतना ही नहीं, उनका क्रम भी यथायोग्य है।

यह है एक ही अक्षरों का अद्भूत अर्थ विस्तार !

माघ कवि ने शिशुपालवधम् महाकाव्य में केवल “भ” और “र ” दो ही अक्षरों से एक श्लोक बनाया है। देखिये –

भूरिभिर्भारिभिर्भीभीराभूभारैरभिरेभिरे।
भेरीरेभिभिरभ्राभैरूभीरूभिरिभैरिभा:।।
(अर्थात्) धरा को भी वजन लगे ऐसे वजनदार, वाद्य यंत्र जैसी आवाज निकालने वाले और मेघ जैसे काले निडर हाथी ने अपने दुश्मन हाथी पर हमला किया।

किरातार्जुनीयम् काव्य संग्रह में केवल “न” व्यंजन से अद्भुत श्लोक बनाया है और गजब का कौशल्य प्रयोग करके भारवि नामक महाकवि ने थोडे में बहुत कहा है:-

न नोननुन्नो नुन्नोनो नाना नाना नना ननु।
नुन्नोSनुन्नो ननुन्नेनो नानेना नन्नुनन्नुनुत्।।

(अर्थात्) जो मनुष्य युद्ध में अपने से दुर्बल मनुष्य के हाथों घायल हुआ है वह सच्चा मनुष्य नहीं है। ऐसे ही अपने से दुर्बल को घायल करता है वो भी मनुष्य नहीं है। घायल मनुष्य का स्वामी यदि घायल न हुआ हो तो ऐसे मनुष्य को घायल नहीं कहते और घायल मनुष्य को घायल करें वो भी मनुष्य नहीं है। वंदेसंस्कृतम् !!

कितने आश्चर्य की बात है…. भारत के 29 राज्यों के नाम.. श्री. संत तुलसीदास के इक दोहे में समाई हुई है।

राम नाम जपते अत्रि मत गुसिआउ।
पंक में उगोहमि अहि के छबि झाउ।।
रा – राजस्थान ! पं- पंजाब
म – महाराष्ट्र ! क- कर्नाटक
ना – नागालैंड ! मे- मेघालय
म – मणिपुर ! उ- उत्तराखंड
ज – जम्मू कश्मीर ! गो- गोवा
प – पश्चिम बंगाल ! ह- हरियाणा
ते – तेलंगाना ! मि- मिजोरम
अ – असम ! अ- अरुणाचल प्रदेश
त्रि – त्रिपुरा ! हि- हिमाचल प्रदेश
म – मध्य प्रदेश ! के- केरल
त – तमिलनाडु ! छ- छत्तीसगढ़
गु – गुजरात ! बि- बिहार
सि – सिक्किम ! झा- झारखंड
आ- आंध्र प्रदेश ! उ- उड़ीसा
उ – उत्तर प्रदेश

एक कहानी – प्रजातंत्र में एक आदमी की


१ / २:

राम तिवारी

बचपन में एक कहानी सुनी थी, जो आज भी बहुत प्रचलित है। बाद में जब दुनिया की सारी भाषाओँ की लोक कथाएं पढ़ने की कोशिश की तो आश्चर्य हुआ कि यही कहानी रुसी भाषा में मिली,अरबी में मिली,करीब-करीब-दुनिया की सभी भाषाओँ में मिली,बस कुछ पात्र बदले हुए मिले।

एक तोता और एक मैना का जोड़ा था। एक बार भयानक सूखा पड़ा। लोग अनाज के दाने-दाने को तड़पने लगे। तोता-मैना उड़ते-उड़ते जा पहुँचे किसी दूर देश में जहाँ उन्हें एक चने का दाना मिला! उस चने के दाने को उन्होंने अपनी चोंचों से एक खूँटे से रगड़कर दो भागों में तोड़ने की कोशिश की। दाना टूट तो गया, लेकिन दो दालों में से एक दाल उसी खूँटे में फँस गई। मैना चालाक थी और बची हुई दाल को लेकर उड़ गयी। अब तोते के हिस्से की दाल बची और वह भी खूँटे के अन्दर। तोता बढ़ई के पास गया और बोला-
“बढ़ई-बढ़ई खूँटा चीरो,
खूँटे में दाल बा,
का खाई का पीई, का ले परदेस जाई?”

बढ़ई ने मना कर दिया, “हट तोता, मेरे पास इतना समय नहीं कि खूँटा चीरूँ तुम्हारे छोटे से काम के लिए।” तोता राजा के पास गया और बोला-
“राजा-राजा बढ़ई मारो,
बढ़ई न खूँटा चीरे,
खूँटे में ………………”

राजा ने भी मना कर दिया। तोता रानी के पास गया और बोला-
“रानी-रानी राजा छोड़ो,
राजा न बढ़ई मारे,
बढ़ई ………………..”

रानी ने भी मना कर दिया। तोता साँप के पास गया-
“साँप-साँप रानी डँसो,
रानी न राजा छोड़े,
राजा न बढ़ई मारे,
बढ़ई ……………….”

साँप ने भी मना कर दिया। तोता लाठी के पास गया।
“लाठी-लाठी साँप मारो,
साँप न रानी डँसे ……………..”

लाठी ने भी मना कर दिया। तोता आग के पास गया-
“आग-आग लाठी जारो, ………………………….”

आग ने भी मना कर दिया। तोता नदी के पास गया। (यहाँ नदी के स्थान पर कहीं-कहीं समुद्र का जिक्र मिलता है।)
“नदी-नदी आग बुझाओ, ………………………”

नदी ने भी मना कर दिया। तोता हाथी के पास गया-
“हाथी-हाथी नदी सोखो,  ……………………….”

हाथी ने भी मना कर दिया। तोता रोते हुए जा रहा था। उसका विलाप एक चींटी ने सुना। उसने कहा कि चलो मैं तुम्हारी समस्या का समाधान करने की कोशिश करती हूँ। वह सीधे हाथी की सूँड़ के अन्दर घुस गयी और काटने लगी।

हाथी परेशान हो गया और बोला-
“हमें काटो-वाटो मत कोई, हम नदी सोखब लोई”

और वह नदी सोखने नदी के पास जा पहुँचा। नदी बोली-
“हमें सोखो-वोखो मत कोई, हम तो आग बुझाइब लोई”

और इस तरह धीरे-धीरे क्रम आगे बढ़ई तक पहुँच जाता है। बढ़ई राजा से कहता है-
“हमें मारो-वारो मत कोई, हम खूँटा चीरब लोई”

और आखिर में कहानी के दो रूप मिलते हैं-

एक में खूँटा कहता है- “हमें चीरो-ऊरो मत कोई, हम दाल देब लोई।”

और दूसरे में बढ़ई खूँटा हल्का सा चीर देता है और तोते को दाल मिल जाती है।

बचपन में सुनी इस कहानी को उस समय सुनने में मज़ा तो बहुत आया, किन्तु इसके शाब्दिक अर्थ से अलग हटकर अिधक समझ में कुछ नहीं आया। लेकिन आज जितना ही सोचता हूँ, इस कहानी को सामाजिक दर्शन के एक शक्तिशाली आयाम को निरूपित करता हुआ पाता हूँ। कभी-कभी तो लगता है कि पूरी सामाजिक और प्रशासनिक प्रक्रिया को जैसे यह कहानी निचोड़ कर हमारे सामने लाकर रख देती है। इन सघन क्रियाओं का जितना सहज निरूपण यह कहानी कर देती है वह शायद कहीं और देखने को नहीं मिलता है।

सबसे अहम भूमिका इस कहानी में चींटी की है। चींटी की विचार-प्रक्रियाओं पर जरा हम विचार करें। आत्म बलिदान तक हो जाने, आत्मोत्सर्ग तक की शक्ति ज़रूर उस चींटी में थी। यदि हाथी ने चींटी को मसल दिया होता तो? यह ख्‍़ातरा तो चींटी ने उठाया ही था और ऐसी ही चींटियाँ, व्यवस्था की सोच की धारा को बदल सकती हैं।

फिर यह चींटी है कौन? यदि हम समाज के परिप्रेक्ष्य में देखें तो वह और कोई नहीं समाज का एक आम आदमी है और हाथी है व्यवस्था। एक अदना सा आम आदमी भी बहुत हद तक बदल सकता है व्यवस्था को। वही बस उठ जाये तो सारी व्यवस्था की सोच में परिवर्तन हो जाता है। लेकिन वह उठेगा हाथी के पास जाने के लिए, हाथी की सोच में परिवर्तन लाने के लिए, तो दब जाने की आशंका तो बनी ही रहेगी और उस आशंका से उठकर जब वह हिम्मत करेगा, तभी वह हाथी की सूँड़ में जाकर हाथी की सोच की दिशा बदल देने की स्थिति में आ पायेगा।

खूँटा, बढ़ई, राजा, रानी, आग, लाठी, नदी और हाथी; ये सभी व्यवस्था के विविध आयाम हैं। विविध फलक हैं। इन सबकी सोच में परिवर्तन हो सकता है, एक छोटी-सी चींटी की उमंग से कि चलो मैं एक सही काम के लिए, व्यवस्था से जूझने के लिए तैयार हूँ, आत्मोत्सर्ग के लिए तैयार हूँ।

यहाँ पर दो बातें और महत्त्वपूर्ण हैं। बढ़ई को केवल खूँटे को जरा सा चीर कर दाना निकाल देना था। राजा को भी बढ़ई को केवल डाँटकर काम करा देना था। किसी को जान का खतरा नहीं था। लेकिन किसी को तोते के प्रति जरा भी संवेदना नहीं हुई। लेकिन चींटी को इतनी संवेदना हुई कि वह जान की बाजी लगाकर हाथी के पास पहुँची। तो व्यवस्था परिवर्तन की इच्छा के लिए तीव्र संवेदना का होना आवश्यक है।

दूसरी बात यह कि चाहे बढ़ई हो, राजा हो, लाठी हो या साँप हो, हर एक के पास तोता गिड़गिड़ाते हुए गया लेकिन किसी ने उसकी बात पर ध्यान नहीं दिया। चींटी ने स्वयं ही तोते का दुःख देख उसके रोने का कारण, दुःखी होने का कारण पूछा। यह होती है सच्ची संवेदना। यदि कोई किसी से अपनी ज़रूरत बताये और गिडगिड़ाये और तब वह निराकरण की चेष्टा करे तो वह सच्ची संवेदना नहीं कही जा सकती। सच्ची संवेदना तो यह है कि जब कोई अपनी तरफ़ से दूसरों के दुःख को जानने की कोशिश करे और उसके निराकरण में जुट जाये जैसा कि चींटी ने किया।

यहाँ एक प्रश्न और भी उठता है। यह तो सच है कि बढ़ई संवेदनहीन था। लेकिन क्या राजा, रानी, साँप, नदी, लाठी, आग भी केवल संवेदनहीन थे? या उन सबमें निहित स्वार्थवश एक गठजोड़ भी था, जिसकी वजह से न तो वे एक-दूसरे की शिकायत सुनने को तैयार थे और न ही सज़ा देने को। इसकी प्रबल सम्भावना है कि निहित स्वार्थवश उनमें एक गठजोड़ रहा हो और वह केवल भयवश ही अंत में टूट सका।

वैसे इस कहानी में व्यवस्था का एक अच्छा फलक भी देखने को मिलता है। तोते को अपनी बात बेबाक़ कहने के लिए, बढ़ई, राजा, रानी, साँप, लाठी, आग, नदी, हाथी तक पहुँचने को तो मिल गया। वह बेरोक-टोक उनके पास पहुँच तो सका। आज का माहौल शायद और बिगड़ गया है। आज एक छोटा आदमी व्यवस्था के उच्च शिखरों तक पहुँच ही नहीं सकता, इसलिए और भी यह कहानी प्रासंगिक हो जाती है। अब तोते की सारी आशाएँ मात्र चींटी से ही रह जाती हैं।

अब आते हैं इस कहानी के सबसे महत्त्वपूर्ण पहलू पर।

तोते के चींटी से मिलने और चींटी के पास जाने तक जो व्यवस्था थी वह अक्रियाशील थी, असंवेदनशील थी। जब चींटी उठी तो पूरी व्यवस्था क्रियाशील हो उठी। सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि व्यवस्था में जो अंग हैं, वे वही हैं। वही बढ़ई है, वही राजा है, वही नदी है, वही लाठी है, वहीं साँप है, वही हाथी है। सब कोई अक्रियाशील थे और थोड़े ही अन्तराल में सब कोई क्रियाशील हो गये, एक चींटी के कमर कस लेने से। किसी को कोई अत्यिधक भागदौड़ भी नहीं करनी पड़ी। बस थोड़ा-सा भय और थोड़ा-सा अपने कर्तव्य का आभास और एहसास हो गया तो पूरी कार्यपद्धति में क्रियाशीलता आ गयी।

तो यही व्यवस्था और इसी व्यवस्था के लोग अच्छा काम कर सकते हैं। यही राजनीतिज्ञ, अिधकारी, नौकरशाह, प्रबन्धक, अध्यापक, व्यापारी, वकील, डॉक्टर सभी ठीक से काम कर सकते हैं। बस आम आदमी को चींटी बनना होगा।

चींटी भी एक सांकेतिक बिम्ब है। चींटी निरूपित करती है सीढ़ी में जो सबसे नीचे और छोटा-सा बिन्दु है उसे।

यदि व्यक्ति भौतिक और सामाजिक रूप से चींटी का स्वरूप नहीं ले सकता तो कम से कम अपने ‘इगो’ को, अहंकार को तो चींटी स्वरूप बना ही सकता है। तब भी वह बहुत कुछ कर सकने में सक्षम हो जायेगा। चींटी के बराबर हमारा अस्तित्व हो, या कम से कम चींटी के बराबर हमारा अहंकार हो और हममें हौसला हो तथा त्यागमय कर्म हो तो हम हाथी को भी सकारात्मक और सम्यक् रूप से क्रियाशील कर सकते हैं। पूरी व्यवस्था को बाध्य कर सकते हैं कि वह अपनी सोच की दिशा में समुचित परिवर्तन करे। व्यवस्था को संवेदनशील भी बना सकते हैं और क्रियाशील भी।

इस कहानी में ग़ौर करिए सबसे शक्तिशाली कौन है? उत्तर चींटी मिलता है। और चींटी सबसे शक्तिशाली है संवेदना के गुण के कारण ! धनबल , बाहुबल , संसाधन बल या ज्ञान बल में राजा रानी साँप आग पानी हाथी चींटी से कहीं आगे थे लेकिन संवेदना का बल न होने के कारण किसी ने कुछ नहीं किया । संवेदना ही मुख्य आंतरिक ताक़त है जो कार्य करने को विवश करती है । इसलिए शिक्षा और ट्रेनिंग के दौरान संवेदना का विकास सबसे ज़रूरी है ।

भारतीय संविधान संवेदना का एक महत्वपूर्ण श्रोत है,उसे जानने से चींटियों को , आम जनता को अपनी ताक़त का अहसास भी होने लगता है और देश के लोगों और प्रकृति से जुड़ाव व संवेदना पैदा होने लगती है ।

दो बातें और , अब हम सबको अपनी बाक़ी सारी प्रतबद्धताओं से ऊपर उठकर देश और मानवता के आधार पर सोचना होगा । दूसरे , इस अवधारणा को मन से निकालना होगा कि समय , ज़माना या युग ख़राब है ।

मेरी एक पुरानी कविता है –
‘वह भी ज़माने को बुरा कहने लगा है
लगता है
वह भी बुरे माहौल में रहने लगा है ‘

अगर आप अच्छे हैं, हम अच्छे हैं और ईश्वर वही है तो ज़माना बुरा कैसे हो सकता है ?

समग्रता में देखने पर तो सभी समय ईश्वरीय ही लगेगा । हमारा संविधान हममें यह विश्वास भरता है कि वर्तमान और भविष्य समय बहुत अच्छा है ।

यदि कहीं कोई कमी दिखती है उसे तो दूर करने की कोशिश भी हम सब को ही करनी है उसी चींटी की तरह ।
और अंत में:

कितना दर्द सहा होगा आजादी के मतवालों ने ;
जिन्होंने भारत मां की खातिर होम दिया अपने जीवन को , लेकिन फिर भी मरते मरते लब पर वंदे मातरम आता था।

ऐसे मां के वीर सपूत भगत सिंह राजगुरु सुखदेव चंद्र शेखर आज़ाद सुभाष चंद्र बोसे मास्टर सूर्य सेन और हज़ारों क्रन्तिकारी भारत माँ के सपूतों को नमन कोटि कोटि प्रणाम करते हुए – आओ हम यह व्रत लें कि हम भारत के निवासियों की तरक्की सुख और उज्वल भविष्य के लिए हम जो हम से बन पड़े वो करें। आज जब भारत उठ रहा है और आगे बढ़ रहा है हम अपनी मेहनत , संवेदना और कार्य से देश को उनके सपनों को पूरा करें !

२ / २:

अच्छे दिन कब आयेगें?

दिवार पर पेशाब करता व्यक्ति पूछता है , अच्छे दिन कब आयेंगे ?

बिजली चोरी करता व्यक्ति पूछता है, अच्छे दिन कब आयेंगे?

यहाँ-वहाँ कचरा फैंकता व्यक्ति पूछता है, अच्छे दिन कब आयेंगे?

कामचोर सरकारी कर्मचारी पूछता है, अच्छे दिन कब आयेंगे?

टेक्स चोरी करता व्यक्ति पूछता है, अच्छे दिन कब आयेंगे?

देश से गद्दारी करता व्यक्ति पूछता है, अच्छे दिन कब आयेंगे?

नोकरी पर देरी से व जल्दी घर दौड़ता कर्मचारी पूछता है, अच्छे दिन कब आयेंगे?

​लड़कियों से छेड़खानी करता व्यक्ति पूछता है, अच्छे दिन कब आयेंगे​

राष्ट्रगान के समय बातें करते स्कूलों के कुछ लोग पूछते है, अच्छे दिन कब आयेंगे?

स्कूल में बच्चों को न भेजने वाले लोग पूछते हैं, अच्छे दिन कब आयेंगे?

कसाई जैसे कमीशनखोर डाक्टर पूछता है अच्छे दिन कब आयेंगे?

सड़क पर रेड सिगनल तोड़ते लोग पूछते, अच्छे दिन कब आयेंगे?

किताबों से दूर भागते विद्यार्थी पूछते हैं, अच्छे दिन कब आयेंगे?

कारखानों में हराम खोरी करते लोग पूछते हैं, अच्छे दिन कब आयेंगे?

यदि खुद नहीं बदल सकते तो अच्छे दिनों की आस छोड़ दो।
क्योंकि देश आपके उपदेश से नहीं, आचरण से बदलेगा, तब आएंगे अच्छे दिन !

कांग्रेस देश पर 55 लाख 87 हजार 149 करोड़ का कर्ज छोड़ के गई है !
जिसका 1 वर्ष का ब्याज भरना पड़ रहा है = 4 लाख 27 हजार करोड़ !

यानि 1 महीने का = 35 हजार 584 करोड़ !
यानि 1 दिन का = 1 हज़ार 186 करोड़ !
यानि 1 घंटे का = 49 करोड़ !
यानि 1 मिनट का 81 लाख !
यानि 1 सेकेंड का 1,35,000!

जरा सोचिए ! जब देश लूटेरी कांग्रेस की मेहरबानी से
प्रति सेकेंड 1 लाख 35 हजार रूपये का तो सिर्फ पुराने कर्जे का ब्याज भर रहा है तो देश के अच्छे दिन आसानी से कैसे आएंगे..???

अत: जितना सम्भव हो भारतीय प्रोडक्ट ही ख़रीदे, देश को लूटने से बचाये, अर्थव्यस्था की मजबूती में अपना अमूल्य योगदान देकर भारतवर्ष को फिर से समृद्ध बनाये…!

यदि भारत के 121 करोड़ लोगों में से सिर्फ 10% लोग प्रतिदिन 10 रुपये का रस पियें तो महीने भर में होता है लगभग ” 3600 करोड़ “…!!!!

अगर आप…कोका कोला या पेप्सी पीते हैं तो ये ” 3600 करोड़ ” रुपये देश के बाहर चले जायेँगे…। कोका कोला, पेप्सी जैसी कंपनियाँ प्रतिदिन ” 7000 करोड़ ” से ज्यादा लूट लेती हैं..।

आपसे अनुरोध है क आप… गन्ने का जूस/ नारियल पानी/ आम/ फलों के रस आदि को अपनायें और देश का ” 7000 करोड़ ” रूपये बचाकर हमारे किसानों को दें…। ” किसान आत्महत्या नहीं करेंगे..”

फलों के रस के धंधे से  ” 1 करोड़ ” लोगो को रोजगार मिलेगा और 10 रूपये के रस का गिलास 5 रूपये में ही मिलेगा…।

स्वदेशी अपनाओ,  राष्ट्र को शक्तिशाली बनाओ..। स्वदेशी अपनाए देश बचाएे अगर सभी भारतीय 90
दिन तक कोई भी विदेशी सामान नहीं ख़रीदे… तो भारत दुनिया का दूसरा सबसे अमीर देश बन सकता है.. सिर्फ 90 दिन में ही भारत के 2 रुपये 1 डॉलर के बराबर हो जायेंगे.. हम सबको मिल कर ये कोशिश आजमानी चाहिए क्युकी ये देश है हमारा..!!!!

आज याद करो भगत सिहं व साथियों को ! श्रद्धांजली – आजाद भारत मे भ्रटाचारी सत्ता मे न आने पायें !!


1 of 3:          श्रीपाल सिंह

भगत सिंह और उनके साथी एक संगठन के सदस्य थे जिसका नाम था : हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन।  उसी संगठन के कमांडर इन चीफ थे चंद्र शेखर आज़ाद।  उस संगठन के रण बाँकुरों में कोई किसी से कम नहीं था। यह सही है कि उन सब में सबसे अधिक प्रसिद्धि भगत सिंह को मिली।  और यह भी सही है कि ‘सोशलिस्ट’ शब्द भगत सिंह के कहने पर ही जोड़ा गया था।  लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि १९२७ से १९३१ का दौर कम्युनिज्म , सोवियत संघ , लेनिन (जो १९२३ में दिवंगत हो गए थे), स्टालिन आदि के चरम उत्कर्ष का दौर था।  हर कोई पढ़ा लिखा आदमी उस विचार धारा से प्रभावित था।  इसी बात का फायदा उठा कर आज बहुत से लोग – तथाकथित क्रांतिकारी – भगत सिंह से १९३१ के विचारों का हवाला देतें हैं और उस विचारधारा की अच्छाई साबित करना चाहते हैं।  यह बात तर्कसंगत नहीं है।  उस समय – १९३१ में – भी बहुत से क्रांतिकारी ईश्वर में विश्वास रखते थे , चंद्र शेखर आज़ाद भी उनमे से एक थे।  अंग्रेज़ों ने इन क्रांतिकारियों पर मुकदमा चलाने के लिए एक कमीशन बनाया था जिसका नाम था : दिल्ली कांस्पीरेसी कमीशन।  उस कमीशन की प्रोसीडिंग्स  पढ़ने पर पता चलता है की आम तौर पर सभी क्रांतिकारी ईश्वर में निष्ठा रखने वाले लोग थे।  आज जब सोवियत संघ दुनिया के नक़्शे से मिट गया , जब कम्युनिस्ट चीन खुद एक राष्ट्र वादी देश है जो पूंजीवादी रास्ते पर चल रहा है , तो आज एक नई सोच की जरुरत है जो पूंजीवाद के लूट खसोट वाले रूप का भी मुकाबला कर सके और दुनिया को सही रास्ता भी दिखा सके।  आज भगत सिंह के १९३१ के विचारों की दुहाई दे कर पुरानी  और फेल विचारधारा को सही नहीं ठहराया जा सकता।  भारत ने एक अति विकसित और वैज्ञानिक आध्यात्मिक विचारधारा दुनिया को दी है , उसने बुद्ध दुनिया के सामने पेश किया है। हाँ , यह अलग बात है कि कोई आदमी न तो कम्युनिज्म मार्क्स लेनिन स्टालिन माओ को पढ़े और समझे और नाही आध्यत्मिक साहित्य व विचारों को पढ़े समझे और भगत सिंह का नाम लेकर  क्रान्तिकारी लफ़ाज़ी करे। जिन लोगों ने मार्क्स दिया (जर्मनी) और जिन लोगों ने लेनिन दिया (रूस ) वे लोग आज  आगे बढ़ कर श्री अरविन्द और विवेकानंद को महान विचारक और ऋषि मानते हैं, जो दुनिया की वर्तमान समस्याओं का बेहतर हल दे सकते हैं। श्री अरविन्द और विवेकानन्द पूँजीवाद का समर्थन नहीं करते , बल्कि एक नई और महान क्रान्ति – मानव के विचारों और उसके पशु तुल्य रचना में एक अप्रत्याशित आध्यात्मिक क्रान्ति – का आवाहन करते हैं और उस क्रान्ति की तैयारी का कार्यक्रम पेश करते हैं। देर सबेर मानवजाति उस क्रान्ति को अंजाम देकर रहेगी। इस क्रान्ति के आगाज के साथ ही पूँजीवाद हमेशा के लिए खाक में मिल जाएगा और मानवजाति इस से मुक्ति पा जाएगी।

2 of 3: किरन मोहित

अब सब क़ैदी चुप हो चले थे. उनकी निगाहें उनकी कोठरी से गुज़रने वाले रास्ते पर लगी हुई थी.
भगतसिंह और उनके साथी फाँसी पर लटकाए जाने के लिए उसी रास्ते से गुज़रने वाले थे.

एक बार पहले जब भगतसिंह उसी रास्ते से ले जाए जा रहे थे तो पंजाब कांग्रेस के नेता भीमसेन सच्चर ने आवाज़ ऊँची कर उनसे पूछा था, “आप और आपके साथियों ने लाहौर कॉन्सपिरेसी केस में अपना बचाव क्यों नहीं किया.” भगतसिंह का जवाब था, “इन्क़लाबियों को मरना ही होता है, क्योंकि उनके मरने से ही उनका अभियान मज़बूत होता है, अदालत में अपील से नहीं.”

वॉर्डेन चरतसिंह भगतसिंह के ख़ैरख़्वाह थे और अपनी तरफ़ से जो कुछ बन पड़ता था, उनके लिए करते थे. उनकी वज़ह से ही लाहौर की द्वारकादास लाइब्रेरी से भगतसिंह के लिए किताबें निकल कर जेल के अन्दर आ पाती थीं.

भगतसिंह को किताबें पढ़ने का इतना शौक़ था कि एक बार उन्होंने अपने स्कूल के साथी जयदेव कपूर को लिखा था कि वो उनके लिए कार्ल लीबनेख़ की ‘मिलिट्रिज़म’, लेनिन की ‘लेफ़्ट-विंग कम्युनिज़्म’ और अपटन सिनक्लेयर का उपन्यास ‘द स्पाई’ कुलबीर के ज़रिये भिजवा दें.

भगतसिंह जेल की कठिन ज़िन्दगी के आदी हो चले थे. उनकी कोठरी नंबर 14 का फ़र्श पक्का नहीं था. उस पर घास उगी हुई थी. कोठरी में बस इतनी ही जगह थी कि उनका पाँच फिट, दस इंच का शरीर बमुश्क़िल उसमें लेट पाये.

भगतसिंह को फांसी दिए जाने से दो घंटे पहले उनके वकील प्राणनाथ मेहता उनसे मिलने पहुंचे. मेहता ने बाद में लिखा कि भगतसिंह अपनी छोटी-सी कोठरी में पिंजड़े में बन्द शेर की तरह चक्कर लगा रहे थे. उन्होंने मुस्करा कर मेहता को स्वागत किया, और पूछा कि आप मेरी किताब ‘रिवॉल्युशनरी लेनिन’ लाये या नहीं? जब मेहता ने उन्हें किताब दी तो वो उसे उसी समय पढ़ने लगे मानो उनके पास अब ज़्यादा समय न बचा हो. मेहता ने उनसे पूछा कि क्या आप देश को कोई सन्देश देना चाहेंगे? भगतसिंह ने किताब से अपना मुँह हटाये बग़ैर कहा, “सिर्फ़ दो संदेश… साम्राज्यवाद मुर्दाबाद और ‘इन्क़लाब ज़िन्दाबाद!”

इसके बाद भगतसिंह ने मेहता से कहा कि वो पंडित नेहरु और सुभाष बोस को मेरा धन्यवाद पहुंचा दें, जिन्होंने मेरे केस में गहरी रुचि ली थी.

भगतसिंह से मिलने के बाद प्राणनाथ मेहता राजगुरु से मिलने उनकी कोठरी पहुँचे. राजगुरु के अन्तिम शब्द थे, “हम लोग जल्द मिलेंगे.” सुखदेव ने मेहता को याद दिलाया कि वो उनकी मौत के बाद जेलर से वो कैरम बोर्ड ले लें जो उन्होंने उन्हें कुछ महीने पहले दिया था.

जेल अधिकारियों ने तीनों क्रान्तिकारियों को बता दिया कि उनको वक़्त से 12 घंटे पहले ही फांसी दी जा रही है. अगले दिन सुबह छह बजे की बज़ाय उन्हें उसी शाम सात बजे फांसी पर चढ़ा दिया जायेगा. भगतसिंह मेहता द्वारा दी गयी किताब के कुछ पन्ने ही पढ़ पाये थे. उनके मुँह से निकला, “क्या आप मुझे इस किताब का एक अध्याय भी ख़त्म नहीं करने देंगे?!”

भगतसिंह ने जेल के मुस्लिम सफ़ाई कर्मचारी बेबे से अनुरोध किया था कि वो उनके लिए उनको फांसी दिये जाने से एक दिन पहले शाम को अपने घर से खाना लाएँ.
लेकिन बेबे भगतसिंह की ये इच्छा पूरी नहीं कर सके, क्योंकि भगतसिंह को बारह घंटे पहले फांसी देने का फ़ैसला ले लिया गया और बेबे जेल के गेट के अन्दर ही नहीं घुस पाया.

थोड़ी देर बाद तीनों क्रान्तिकारियों को फांसी की तैयारी के लिए उनकी कोठरियों से बाहर निकाला गया. भगतसिंह, राजगुरु और सुखदेव ने अपने हाथ जोड़े और अपना प्रिय आज़ादी गीत गाने लगे-
कभी वो दिन भी आयेगा
कि जब आज़ाद हम होंगें
ये अपनी ही ज़मीं होगी
ये अपना आसमाँ होगा!

फिर इन तीनों का एक-एक करके वज़न लिया गया. सब के वज़न बढ़ गये थे. इन सबसे कहा गया कि अपना आख़िरी स्नान करें. फिर उनको काले कपड़े पहनाये गए. लेकिन उनके चेहरे खुले रहने दिये गए. चरतसिंह ने भगतसिंह के कान में फुसफुसा कर कहा कि वाहे गुरु को याद करो. भगतसिंह बोले, “पूरी ज़िन्दगी मैंने ईश्वर को याद नहीं किया. असल में मैंने कई बार ग़रीबों के क्लेश के लिए ईश्वर को कोसा भी है. अगर मैं अब उनसे माफ़ी माँगूँ तो वो कहेंगे कि इससे बड़ा डरपोक कोई नहीं है. इसका अन्त नज़दीक आ रहा है. इसलिए ये माफ़ी माँगने आया है!”

जैसे ही जेल की घड़ी ने 6 बजाये, क़ैदियों ने दूर से आती कुछ पदचापें सुनीं. उनके साथ भारी बूटों के ज़मीन पर पड़ने की आवाज़ें भी आ रही थीं. साथ में एक गाने का भी दबा स्वर सुनायी दे रहा था, “सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है…!” सभी को अचानक ज़ोर-ज़ोर से ‘इन्क़लाब ज़िन्दाबाद’ और ‘हिन्दुस्तान आज़ाद हो’ के नारे सुनायी देने लगे.

फांसी का तख़्ता पुराना था लेकिन फांसी देनेवाला काफ़ी तन्दुरुस्त. फांसी देने के लिए मसीह जल्लाद को लाहौर के पास शाहदरा से बुलवाया गया था.

भगतसिंह इन तीनों के बीच में खड़े थे. भगतसिंह अपनी माँ को दिया गया वो वचन पूरा करना चाहते थे कि वो फाँसी के तख़्ते से ‘इन्क़लाब ज़िन्दाबाद’ का नारा लगायेंगे.
लाहौर ज़िला कांग्रेस के सचिव पिंडीदास सोंधी का घर लाहौर सेन्ट्रल जेल से बिल्कुल लगा हुआ था. भगतसिंह ने इतनी ज़ोर से ‘इन्कलाब ज़िन्दाबाद’ का नारा लगाया कि उनकी आवाज़ सोंधी के घर तक सुनायी दी.

भगतसिंह की आवाज़ सुनते ही जेल के दूसरे क़ैदी भी नारे लगाने लगे.

भगतसिंह, राजगुरु, सुखदेव – तीनों युवा क्रांतिकारियों के गले में फांसी की रस्सी डाल दी गयी. उनके हाथ और पैर बाँध दिये गए. तभी जल्लाद ने पूछा, सबसे पहले कौन जायगा? सुखदेव ने सबसे पहले फांसी पर लटकने की हामी भरी. जल्लाद ने एक-एक कर रस्सी खींची, और उनके पैरों के नीचे लगे तख़्तों को पैर मार कर हटा दिया.
काफी देर तक शव तख़्तों से लटकते रहे.

अंत में शवों को नीचे उतारा गया, और वहाँ मौज़ूद डॉक्टरों – लेफ़्टिनेंट-कर्नल जेजे नेल्सन और लेफ़्टिनेंट-कर्नल एनएस सोधी – ने उन्हें – तीनों क्रान्तिकारियों को – मृत घोषित किया.

एक जेल अधिकारी पर इस फांसी का इतना असर हुआ कि जब उससे कहा गया कि वो मृतकों की पहचान करें तो उसने ऐसा करने से इनक़ार कर दिया. भावुकता दिखानेवाले – और नाफ़र्मानी करनेवाले – उन अधिकारी के साथ रिआयत नहीं बरती गयी, और उसी जगह पर उनको निलंबित कर दिया गया.

एक जूनियर अफ़सर ने फिर ये काम अंजाम दिया.

पहले योजना थी कि इन सबका अन्तिम संस्कार जेल के अन्दर ही किया जायेगा, लेकिन फिर ये विचार त्यागना पड़ा जब अधिकारियों को आभास हुआ कि जेल से धुआँ उठते देख बाहर खड़ी भीड़ जेल पर हमला कर सकती है.
आनन-फानन में जेल की पिछली दीवार तोड़ी गई.
उसी रास्ते से एक ट्रक जेल के अन्दर लाया गया. बहुत अपमानजनक तरीक़े से क्रान्तिकारियों के शवों को एक सामान की तरह ट्रक में डाल दिया गया.

पहले तय हुआ था कि उनका अन्तिम संस्कार रावी के तट पर किया जायेगा, लेकिन रावी में पानी बहुत ही कम था, इसलिए सतलुज के किनारे शवों को जलाने का फ़ैसला लिया गया. शहीदों के पार्थिव शरीर को फ़ीरोज़पुर के पास सतलुज के किनारे लाया गया. तब तक रात के 10 बज चुके थे. इस बीच उप पुलिस अधीक्षक कसूर सुदर्शनसिंह कसूर गाँव से एक पुजारी जगदीश अचरज को बुला लाये.

अभी शवों में आग लगायी ही गई थी कि लोगों को इसके बारे में पता चल गया. जैसे ही ब्रितानी सैनिकों ने लोगों को अपनी तरफ़ आते देखा, वो शवों को वहीं छोड़ कर अपने वाहनों की तरफ़ भागे. सारी रात गाँव के लोगों ने शवों के चारों ओर पहरा दिया.

अगले दिन दोपहर के आसपास ज़िला मजिस्ट्रेट के दस्तख़त के साथ लाहौर के कई इलाक़ों में नोटिस चिपकाये गए जिसमें बताया गया कि भगतसिंह, सुखदेव और राजगुरु का सतलुज के किनारे हिन्दू और सिख रीति से अन्तिम संस्कार कर दिया गया.

इस ख़बर पर लोगों की कड़ी प्रतिक्रिया आई और लोगों ने कहा कि इनका अन्तिम संस्कार करना तो दूर, उन्हें पूरी तरह जलाया भी नहीं गया. ज़िला मैजिस्ट्रेट ने इसका खंडन किया लेकिन किसी ने उस पर विश्वास नहीं किया.

भगतसिंह और उनके दोनों साथियों के सम्मान में लोग जुलूस में चलने लगे। शोक जुलूस नीला गुंबद से शुरु हुआ. देखते-देखते वह तीन मील लम्बा हो गया था।
पुरुषों ने विरोधस्वरूप अपनी बाहों पर काली पट्टियाँ बांध रखी थीं। महिलाओं ने काली साड़ियाँ पहन रखी थीं. लगभग सब लोगों के हाथ में काले झंडे थे. लाहौर के मॉल से गुज़रता हुआ जुलूस अनारकली बाज़ार के बीचोबीच रुका.

अचानक पूरी भीड़ में उस समय सन्नाटा छा गया जब घोषणा की गयी कि भगतसिंह का परिवार तीनों शहीदों के बचे हुए अवशेषों के साथ फ़ीरोज़पुर से वहाँ पहुँच गया है.
जैसे ही तीन फूलों से ढ़के ताबूतों में उनके शव वहाँ पहुंचे, भीड़ भावुक हो गयी. लोग अपने आँसू नहीं रोक पाये.
वहीं पर एक मशहूर अख़बार के सम्पादक मौलाना ज़फ़र अली ने एक नज़्म पढ़ी जिसका लब्बोलुआब था, ‘किस तरह इन शहीदों के अधजले शवों को ख़ुले आसमान के नीचे ज़मीन पर छोड़ दिया गया.’

उधर, जेल वॉर्डेन चरतसिंह सुस्त क़दमों से अपने कमरे में पहुँचे और फूट-फूट कर रोने लगे. अपने 30 साल के कॅरियर में उन्होंने सैंकड़ों फांसियाँ देखी थीं। उनकी याद में किसी ने मौत को इतनी बहादुरी से गले नहीं लगाया था जितना भगतसिंह और उनके दो कॉमरेडों ने.

किसी को इस बात का अंदाज़ा नहीं था कि 16 साल बाद उनकी शहादत भारत में ब्रिटिश साम्राज्य के अन्त का एक कारण साबित होगी और भारत की ज़मीन से सभी ब्रिटिश सैनिक हमेशा के लिए चले जायेंगे.

इंक़लाब के हौसलो को दुःखों तकलीफों दर्दो से तपाने वालें शहीद ए आज़म ने घर के माहौल से ही वतनपरस्ती इंसानियत अपनो के लिए अपनेपन का एहसास किया था।
शहीद ए आज़म के जन्म के बाद दोनों क्रांतिकारी चाचा सरदार स्वर्ण सिंह संधू तो घर आ गए इनको टीवी की बीमारी के कारण छोड़ा गया था जो घर मे आने के बाद कम उम्र में चल बसे ,सरदार अजीत सिंह संधू जिनके किस्से सुनकर शहीद ए आज़म खुद को गौरवान्वित महसूस करते थे वो रंगून(म्यामांर)जेल से ईरान,तुर्की होते हुए जर्मनी चले गए थे,वो जर्मन रेडियो से ब्रिटेन के विरुद्ध प्रचार करते थे,जो 45 वर्ष देश से दूर रहे ।

घर पर शहीद ए आज़म ने निःसन्तान चाची हुकुमकौर की सिसकियां सुनी पूरे बचपन,जो सरदार स्वर्ण सिंह की विधवा थी ,चाची हरनाम कौर रोज सरदार अजीत सिंह की खबर के लिए उनके घर वापसी के लिए तरसती थी,उनके दुःखों में नन्हा भगत उनकी गोद मे बैठकर उनको संभालने का प्रयास करता था।

नन्हा भगत अपनी चाचियों के आंसू पूछता ओर कहता आप रोना बन्द करके मेरे बड़ा होंने की दुआ करो,में बदला लूंगा अपनी चाचियों के दुखों का, भगत की बात सुनकर उसकी चाची उसको गले लगाकर आंसुओ से आंखे भर लेती थी।

बचपन से ही भगत ने अंग्रेजो के खिलाफ अपने दिल को इतना ठोस कर लिया था कि इनके आगे नही झुकना है इनको झुकाना है,भगत की जिंदगी से जुड़े तमाम किस्से बताते है कि कैसे उसकी बेखौफ शहीदी की इबारत उसके हर पल के इंक़लाब से बनी थी ।

शहीद ए आज़म के आदर्श रहे सरदार करतार सिंह सराभा (ग्रेवाल) जो ग़दर पार्टी के अध्यक्ष थे जिन्हें 1915 में अंग्रेजो ने लाहौर षड्यंत्र केस में गिरफ्तार किया और 1916 में उनको 19 वर्ष कुछ माह की उम्र में फांसी लगा दी , शहीद ए आज़म सराभा की एक फोटो हमेशा अपने साथ रखते थे,

1919 में रॉलेक्ट एक्ट के विरुद्ध जलियांवाला बाग में बैशाखी वालें दिन भारतीयों के जत्थे इकट्ठा थे जिन निहत्थों पर जनरल ओ डायर ने बारूदों गोलियों से कत्लेआम कर दिया, बताते है बाग से खून से सनी मिट्टी उठाकर न जाने पंजाब की धरती के कितने सूरमे बागी बने।

शहीद ए आज़म कभी भी अंग्रेजो के विरुद्ध हिंसात्मक होने के बाद उन्हें एहसास हुआ कि गोली से आज़ादी नही भारतीय परिवारों की बर्बादी होगी ,उन्होंने वैचारिक क्रांति के बारे में खुद को मजबूत किया,असेम्बली में खाली जगह बम विस्फोट करके खुद को पकड़वाया ओर अपनी आवाज विदेशो तक पहुचाई, जिस से भारत के लिए विदेशो में एक दयनीय भावना उत्पन्न हुई,ओर उन्होंने ब्रिटिश सरकार पर दबाब देना शुरू किया ।

शहीद ए आज़म ने जेल में रहकर वैचारिक लेख लिखे लोगो को जागरूक करने के लिए ईश्वर ,धर्म,साम्राज्यवाद के विरुद्ध समझाने का प्रयास किया। 1931 मे रूस का सोवियत सघं और सटालिन अपने चरम उतकषॆ पर थे। कमयुनिजम,  Marx, Lenin, Stalin भगत सिहं आदि के साम्राजवाद के खिलाफ लडाई मे आदषॆ थे। यह तो सोवियत सघं के पतन के बाद ही पता चला कि उनकी विचारधारा से बेहतर तो बुद्ध आदि की आधयातमिक विचारधारा ही है।

अंतिम समय मे शहीदी से एक दिन पहले माँ विद्यावती से मुलाकात के वक़्त शहीद ए आज़म के भावुक अल्फाजो ने माँ ओर नजदीक खड़े दरबानों की आंखों में आँसू झलका दिये ।

“माँ कल मेरी मिट्टी लेने तू मत आना कुलवीर को भेज देना तू रो देगी,तो सब कहेंगे भगत की माँ रो रही है ,”

सुखदेव ,राजगुरु कभी भी अंग्रेजो की प्रताड़ना से न खुद कमजोर पड़े ,न भगत के हौसलो को मुरझाने दिया,देश की फिजाओं में शहीद ए आज़म,सुखदेव,राजगुरु सांस की तरह घुल गए थे,हर आती जाती सांसों के साथ इनका जिक्र होता था।

3 of 3: अछे दिन कब आयेगें?

ये मेसेज 2019 तक संभलकर रखना और पूरा पढ़ना फिर विचार करना

दिवार पर पेशाब करता व्यक्ति पूछता है ,अच्छे दिन कब आयेंगे !

बिजली चोरी करता व्यक्ति पूछता है, अच्छे दिन कब आयेंगे

यहाँ-वहाँ कचरा फैंकता व्यक्ति पूछता है, अच्छे दिन कब आयेंगे

कामचोर सरकारी कर्मचारी पूछता है, अच्छे दिन कब आयेंगे

टेक्स चोरी करता व्यक्ति पूछता है, अच्छे दिन कब आयेंगे

देश से गद्दारी करता व्यक्ति पूछता है, अच्छे दिन कब आयेंगे

नोकरी पर देरी से व जल्दी घर दौड़ता कर्मचारी पूछता है, अच्छे_ दिन कब आयेंगे

​लड़कियों से छेड़खानी करता व्यक्ति पूछता है, अच्छे दिन कब आयेंगे​

राष्ट्रगान के समय बातें करते स्कूलों के कुछ लोग पूछते है, अच्छे दिन कब आयेंगे

स्कूल में बच्चों को न भेजने वाले लोग पूछते हैं, अच्छे दिन कब आयेंगे

कसाई जैसे कमीशनखोर डाक्टर पूछता है अच्छे दिन कब आयेंगे

सड़क पर रेड सिगनल तोड़ते लोग पूछते, अच्छे दिन कब आयेंगे

किताबों से दूर भागते विद्यार्थी पूछते हैं, अच्छे दिन कब आयेंगे

कारखानों में हराम खोरी करते लोग पूछते हैं, अच्छे दिन कब आयेंगे

यदि खुद नहीं बदल सकते
तो अच्छे दिनों की आस छोड़ दो।
क्योंकि देश आपके उपदेश से नहीं,
आचरण से बदलेगा,
तब आएंगे अच्छे दिन !
कांग्रेस देश पर 55 लाख 87 हजार 149 करोड़ का
कर्ज छोड़ के गई है !
जिसका 1 वर्ष का ब्याज भरना पड़ रहा है = 4 लाख
27 हजार करोड़ !
यानि 1 महीने का = 35 हजार 584 करोड़ !
यानि 1 दिन का = 1 हज़ार 186 करोड़ !
यानि 1 घंटे का = 49 करोड़ !
यानि 1 मिनट का 81 लाख !
यानि 1 सेकेंड का 1,35,000!
जरा सोचिए ! जब देश लूटेरी कांग्रेस की मेहरबानी से
प्रति सेकेंड 1 लाख 35 हजार रूपये का तो सिर्फ पुराने
कर्जे का ब्याज भर रहा है तो देश के अच्छे दिन
आसानी से कैसे आएंगे..???

अत: जितना सम्भव हो भारतीय प्रोडक्ट ही ख़रीदे,
देश को लूटने से बचाये, अर्थव्यस्था की मजबूती में
अपना अमूल्य योगदान देकर भारतवर्ष को फिर से
समृद्ध बनाये…!

यदि भारत के 121 करोड़ लोगों में से सिर्फ 10% लोग प्रतिदिन 10 रुपये का रस पियें तो महीने भर में होता है लगभग ” 3600 करोड़ “…!!!!

अगर आप…कोका कोला या पेप्सी पीते हैं तो ये ” 3600 करोड़ ” रुपये देश के बाहर चले जायेँगे…।

कोका कोला, पेप्सी जैसी कंपनियाँ प्रतिदिन ” 7000 करोड़ ” से ज्यादा लूट लेती हैं..।

आपसे अनुरोध है क आप… गन्ने का जूस/ नारियल पानी/ आम/ फलों के रस आदि को अपनायें और देश का ” 7000 करोड़ ” रूपये बचाकर हमारे किसानों को दें…। ” किसान आत्महत्या नहीं करेंगे..”

फलों के रस के धंधे से  ” 1 करोड़ ” लोगो को रोजगार मिलेगा और 10 रूपये के रस का गिलास 5 रूपये में ही मिलेगा…।

स्वदेशी अपनाओ,  राष्ट्र को शक्तिशाली बनाओ..।
.
स्वदेशी अपनाए देश बचाएे अगर सभी भारतीय 90
दिन तक कोई भी विदेशी सामान नहीं ख़रीदे…

तो भारत दुनिया का दूसरा सबसे अमीर देश बन सकता है.. सिर्फ 90 दिन में ही भारत के 2 रुपये 1 डॉलर के बराबर हो जायेंगे.. हम सबको मिल कर ये कोशिश आजमानी चाहिए क्युकी ये देश है हमारा..!!!!

Delhi Fateh Diwas: March 21


Sanjay Vaidya

It was the year 1783 when Sikh leader Baba Baghel Singh conquered Delhi back from the Mughal king Shah Alam. On 11th March 1783, the Sikh army marched bravely to Delhi on horses and elephants and unfurled a Nishan Sahib at Red Fort.

Thousands of Sikhs celebrate the day as Fateh Diwas, while the date as per the Gregorian calendar differs every year.

Born in the 1730s in village Jhabal Kalan, Amritsar, into a Dhillon Jatt family, his forefathers had converted to Sikhism during the time of Guru Arjan Sahib in the 1580s.

Baghel Singh first invaded Delhi on January 8, 1774, and captured the area up to Shahdara. The second invasion was on July 17, 1775, when the Sikhs captured the area around the present-day Pahar Ganj and Jai Singhpura. Majority of the fighting took place where present-day New Delhi is located. Shortage of supplies forced Sikhs to temporarily halt their conquering spree, but Red Fort was the final aim.

On 11th March 1783, the Sikhs entered the Red Fort in Delhi and occupied the Diwan-E-Aam where Mughal emperor Shah Alam II held his public audiance.

Emperor Shah Alam II reconciled with the Sikhs and offered treaty and accepted their terms, including construction of Gurudwaras on Sikh historical sites.

Gurudwara Sis Ganj Sahib, where Guru Tegh Bahadur had been executed on the orders of Mughal king Aurangzeb and Gurudwara Rakab Ganj Sahib, where the Guru’s remains were cremated were established by him.

He has also been credited with the establishment of Gurudwara Bangla Sahib, Gurudwara Bala Sahib, Gurudwara Majnu Ka Tilla, Gurudwara Moti Bagh, Gurudwara Mata Sundri and Gurudwara Baba Banda Singh Bahadur.

Not many know but even today Delhi stands witness to the brave act of Baba Baghel Singh.

The place where Baba Baghel Singh stopped with his troop of 30,000 men in Delhi, is now known as Tees Hazaari. When the Mughal emperor got to know that the Sikhs are planning to attack Delhi, he ordered all the gates of the Red Fort be closed, especially the ones with access to the rations so that the Sikhs run out of food and go back.

Some of the Sikhs, though, accidentally came across a mason who informed them about a part of the wall of the fort which had caved in, but the exterior was intact. The Sikhs reached the spot with the help of the mason and rammed logs of wood through the wall and entered. This place is now known as Mori Gate, where the Inter-State Bus Terminus (ISBT) now stands. After winning the Red Fort, the Sikhs distributed sweets. The place is now known as Mithai Pul.

This year, Delhi Fateh Diwas is being celebrated on 21st March.

When we talk about Indian history, especially pre-British era, why do we leave out the glorious history of the Sikhs? Let us pledge to read and talk a bit more about our heroes, lest it is forgotten.

Why India Needs Modi? And a Blueprint of Opposition to Unseat him in 2019!


1 of 4: By: Commodore V. K. Jaitly

Do I think Modi is perfect? NO! Do I believe Modi doesn’t make any mistake? NO! Do I believe Modi government has fulfilled all that we want? NO! Do I feel he will make India like Europe or USA in his lifetime? NO!

But I stand by his side like a rock. Why? Here are my reasons:

➤ Because I do believe he is doing whatever he can in a very honest, dedicated and committed way.

➤ Because I do believe he is giving his best to improve the country in all areas.

➤ Because I have seen that massive corruption at cabinet ministerial level has disappeared.

➤ Because I have seen that India has not witnessed any terror attack on civilians in last 4 years under his rule.

➤ Because I have seen him taking unpopular steps just to make sure subsidies and taxes reach to the poor people and not middlemen.

➤ Because I have seen him working hard to make sure India becomes a member of MTCR, Waassenar group, Australia group and achieving diplomatic successes which we couldn’t think of in last many decades.

➤ Because he has pushed forward many reforms which are not going down well with people today, but will unleash a new India when the results of those reforms – structural, economic, infrastructural will be visible in next 8-10 years.

➤ Because I know even if he is not perfect, he is much better than Lalu Yadav. He is much better than Akhilesh Yadav. He is much better than Mayawati. He is much better than Mamata Banerjee. He is much better than Rahul Gandhi.
.
➤ He is a hard-working person. He has no family or anyone after him. He has his shortcomings. Which man doesn’t ? Anyone of you who keep abusing him, are you even a fraction of him in dedication, focus, integrity, hard work and getting things done !!
He is cleaner than all the names I took above. He is not corrupt. He is visionary. He has solutions to many problems (if not all).
.
➤ He may not make India like Europe or US in his lifetime however hard he tries. But at least he is governing much better than previous regimes. Check macro and micro-economic parameters. Compare infrastructure growth. Compare core areas. Compare GDP growth. Compare wholesale and consumer inflation. Every single parameter is much healthier than before.
.
Yes there are problems. Governing a country as heterogeneous and vast as India which has been reeling under problems since centuries is never a joke.

Now ask yourself – who can and who has the capability to solve your problems ?

Hardik ? Alpesh ? Jignesh ? Tejaswi ? Akhilesh ? Mayawati ? Mamata ? Lalu ? Yechury ? Kanhaiya ?
.
They all are baying for Modi’s blood (not in literal sense), they grill him now and then. Have they ever suggested any single solution to the problem ? Have they ever suggested what steps will they take to solve the problems ? What is their vision ? What is their method ?

Negative politics bordering the line of activism is good. But it is never right for country when the alternative is absent.

2 of 4: By: Kumar K Krishnan

Set aside your preconceived notion about Modi. Keep your hands on heart and think, isn’t he doing something which no one dared to do in history of modern India?

He has created so much enemies within and outside India because he has dared to set everything which was bad about India from bottoms up and Top down.

The experienced and seasoned leader Narendra Modi is, it would be foolish on anyone’s part to think that he was not well aware of the outlash he will face from the business community for a disruptive step such as GST which will force the trading community to pay taxes on goods, something they have been evading since forever. GST and taking disruptive steps have been the need of the hour to increase the transparency and bring more indirect taxes into the net.

Last year, he took on a community which no one in the history of India had ever dared to ruffle – the Jewellers. He imposed a cess on jewellery traders bringing their sales in the tax net. Didn’t Modi know that it will lead to outlash from the jewellers ?

Wasn’t Modi aware of the implicit but strong outlash he will face from Central government employees for introducing Biometric attendance ?? Those who were used to come at 11 am, play Golf in the lunch hours and leave by 3 pm have to stay for the entire duration of office.

Those who used to earn hundreds of crores by bribes in appointment of government class-3 and class-4 officers during interviews have nowhere to go as interviews have been abolished and appointment is based on online results. Didn’t Modi know that he is taking on the strongest lobby of middlemen – those who act as brokers in central govt recruiting ?

Another biggest disruption has been DBT (Direct Benefit Transfer). The corruption in distribution of LPG, Kerosene, Scholarship, MNREGA wages, PDS etc by fake accounts due to subsidy leakage have been stopped to an extent that government is saving 60,000 crore annually. Wasn’t Modi aware that this disruption will anger all the middlemen, traders and dealers engaged in this activity since decades?

Modi is very well aware of what he is doing! He doesn’t need to be on backfoot. Winning elections must never be the sole aim of any leader who is determined to clean the country of its corruption. Had he just wanted to win elections, there was no need for so many disruptive policies one by one. He could have literally let these black practices going on and not touched this powerful lobby of middlemen and traders.

These decisions have NOT been taken for winning elections; they have been taken for the COUNTRY’S HEALTH in the LONG RUN !!

Yes, GST being very new and the country being huge, there are some technical issues and timely reviews are needed, which the government has assured right since the beginning. But the overall outrage against GST in entirety is just a display of frustration from traders who now have to pay taxes.

If Modi fails in his fight againt corruption and black money, no PM of India will have the courage to take this issue again on his agenda for next 100 years and corrupt politicians, beaurocrates, police, criminals and businessman will keep looting this country as their birth right. So it is the duty of every resposible citizen to stand in support of PM Modi and fail the evil design of corrupt people to incite violence and create anarchy.

If we fail to do our duty today, our children and grandchildren will never forgive us, will hold us responsible for not giving them a clean India.

3 of 4: By A. Pandey

A closed door meeting of the high-ranking party officials of the Akhilesh Yadav’s  Samajwadi Party (SP), Mayawati’s Bahujan Samaj Party (BSP) and Lalu Yadav’s Janata Dal (JD) has been held two days ago (post Gorakhpur, Phoolpur and a Bihar Parliamentary seats bye election resulting in the defeat of BJP). In this meeting it has been agreed upon by all the three parties that Modi must be unseated in 2019 Parliamentary elections, whatever price they may have to pay. A formula for the power sharing post 2019 supposed victory has been agreed upon by these parties. This formula is like this:

Mayawati will be the Prime Minister of India. Akhilesh Yadav will be the Chief Minister of U. P. Tejashwi Yadav will be the Chief Minister of Bihar. All forces associated with their respective parties – whether disgruntled elements or not – shall be made to agree to this formula and rally around their coalition. All the remaining political forces in India shall not be given any prominent space in this arrangement and they shall have to adjust themselves to this formula.

4 of 4: By: Dr G Pradhan

I had forewarned quite some time ago that the year 2018 will be a bloody year for  the country’s politics and one would witness political events beyond one’s imagination! What would those events be like and how will they be achieved?

ONE:

Engineer REVOLT against Modi! What the ex-head of Congress party had earned in 10 years of UPA rule, she will invest that amount for her son Rahul Gandhi in the next one year. The amount is approximately 5 to 8% of the NDA government’s GDP. The orchestrated revolt against Modi has not been planned after the Budget session of Parliament but a few months back, approximately 4 to 5 months back. In fact, Ahmad Patel of Congress is working on it since summer of 2017. One would do well to remember Mamata Banarjee visiting Uddhave Thakre of Shiv Sena a few months back! Yes, the planning with the external partners started from this point. Mamata Banarjee is the bridge for Sonia Gandhi. You would have witnessed Uddhav walking out!

TWO:

After Uddhav, Mamata Banarjee bridged with chandrababu Naidu. In the next few days or may be week(s), you will see him revolting against Modi. Next would be Akali Dal followed by Nitish and later by Paswan. They all will ask for the bigger pie in the seat share and ministries as the precursor to 2019 elections. A big force will be standing against Modi, including the club of 160 members, BJP sitting MP, Non performing MPs and a lady BJP minister in NDA. Almost 50 BJP sitting MPs are in touch with Ahmad Patel. These MPs failed to solve people’s problems and will not get tickets in 2019. Huge money offered by the Ahmad Patel camp along with the ticket for the 2019 election will do the trick. Ahmad Patel gets JDU on board. He called upon a minister who is head of an Ambedkarite party.
Ahmad Patel’s camp will offer 50K to 15 Cr to the people in the BJP’s IT Cell and top handles to support this revolt against Modi. Hindu hardliners who tweeted for Samajwadi Party (SP) in UP Election are on the radar.

THREE:

Starting Bihar election, Prashant Kishore created 5000+ fake Hindu handles. The number is now approximately 7000. These handles will be widely used to provoke people against Modi.

FOUR:

All money is not in the monetary form; major part is distributed in Latin American shell companies.

FIVE:

A meeting was held outside India with these revolting parties’ top represented. The plan has only one objective: NO Modi in 2019.

SIX:

Sonia-Ahmad Patel plan is simple: Revolt; create doubt against Modi via social media; through paid HRW. People will vote NOTA and that’s the Congress’ win. They had tried this trick during Gujarat election and it was almost a success! Ahmad Patel to tell his men to get some trouble in Maharastra, India’s financial capital.

SEVEN:

Rahul Gandhi is keeping mum. Why? Because his mother told him that he should stop speaking much and that the rest she will manage.

Her calculation is that the ‘Inside Revolt’ will shake the confidence of many people – “inside @BJP4India”. Plus many Advani Era and former Vajpayee govt ministers feeling neglected would want to throw Modi & Shah out, especially some senior ministers who are murmuring that it is better to remain in the opposition than to tirelessly work under Modi. These leeches were expecting large favours once the NDA is back in power but Modi has kept a tight eye on them. You ask any babu in Delhi: all want Modi to go! So that ‘Pehle Ki tareh’ (as before) they can have power & money.

Vedas Have Already Reached Europe!


By: Commander V. K. Jaitly

Let me share with you the highlights of a rare Hindu religious event which happened in Croatia last week. The event was conducted by Veda Union native European group who serves with a motive of “Uniting Europe through the Vedas”.

(http://www.vedaunion.org/).

The event celebrates the 10 year anniversary of Sound of Veda Fellowship in Croatia

11th chanting location of the Veda Union Rudram 11 project, which is a goal to organize 11 times continuous chanting of Sri Rudram Camakam hymns at 11 different locations in Europe

(http://www.vedaunion.org/events/rudram11/zagreb/)

Event was attended by about 400 Europeans from about 15 countries who chant Vedas in open throat as group with highest discipline. Out of which 70% were ladies from age of 22 to 65 years. Traditionally dressed.

Water from 19 rivers were brought for Rudra Abhishekam. Milk abhishekam to Lord Shiva was conducted by everyone

Sahasralinga pooja was conducted by priests (Indian origin) who travelled from US. They explained via powepoint presentation the inner significance of the pooja and mantras while conducting.

The next big devotional project they are aiming to conduct this year is the Athi Rudra Maha Yajna, 11 day auspicious festival which is highest form of worship of Lord Shiva.

The founder of the Veda Union is a young gentlemen from Slovenia with a great vision. He learnt his first Vedas from Chennai. He now also has an Institute for Vedic culture called “Gopuram” in Slovenia to teach Vedas and Carnatic music.

(http://www.gopuram.org/sl/institut/ustanovitelja/vojkokercan/)

The post is written by an Indian Chennai boy who attended this event recently. He was born in a Vedic parambara Hindu Brahmin Iyer family and his forefathers were all Vedic scholars. He now plans to learn modern Vedas and Carnatic music in Europe, after successfully completing his traditional Brahmachari life, that is, school studies in English; engineering college; masters abroad; getting corporate work experience.

He writes: “I was getting delayed to the connecting flight and was worried. A German lady next to me says – Chant Gayathri, all will be fine”

Veda learning is important. Vedas are not just for priests, it is a gift given by God to the entire world. After claiming one’s right as Hindu or Brahmin, one should also try to live towards it to understand the real meaning of Life and be a good human being.

Rapes, Killings and Partition of India: Who Was Responsible?


By: K.I.P.

I had travelled to Toronto on work a couple of years ago. I flagged down a taxi on the curbside of the airport. The driver was an elderly Sikh in his late seventies. His name was Avtar Singh.

I unhesitatingly switch over to Hindi whenever I see people of Indian descent. We conversed while he drove me to the Renaissance Hotel Downtown.

“Uncle, why’re you still driving a taxi instead of retiring and enjoying life?” I asked.

He replied, “I am enjoying this beta. I get bored at home. My wife died five years ago. My children and grandchildren have moved out. What will I do at home?

This is not my native Punjab where extended families live together. Retired life would be lively there. Not here. I cannot converse with the walls!”

I nodded in agreement. He then hesitatingly asked, “You speak Hindi with an accent…”

I laughingly replied, “I am a Madrasi.”

He curiously asked, “Whom do you find more beautiful? Madrasi or Punjabi women?”

I replied, “Uncle, if you grew up in South India until you turn 20 and come to the north for the first time then you would find the Punjaban very attractive. Likewise, if you grew up in Punjab until you turn 20 and come to Madras for the first time then you would find the Madrasan very attractive. Novelty has something to do with whom we find attractive.”

He liked my answer.

I invited him to join me for dinner at the hotel. He agreed. We had an engrossing conversation about his childhood days in what would eventually become Pakistan.

Avtar Singh was born in a small village near Rawalpindi around 1940. There were 300 Sikh families in that village. There were 50 Hindu families as well. Every evening, those families assembled around a few tandoors for communal meal. It takes a lot of effort and energy to light up a tandoor. Once the tandoor is lit, it takes very little energy to bake tandoori roti or chicken or any dish one could bake.

So, villagers assembled around those tandoors to bake their naans, rotis, and chicken. Some would eat it right there. Others would take the cooked food home. The men and elders would indulge in some locally-brewed liquor. Punjabis have a very healthy attitude toward life. They celebrate it. Families would retire to their respective homes after communal interactions around the tandoor.

The 1940s were tense. The Partition was imminent. The future was uncertain. Everyone feared attacks by the Muslims.

Local Sikh youth had accumulated katta, country-made guns. Some of them had military background and guided the villagers in self-defense. The Arya Samaj and the RSS had a limited presence but they were often the conduit for providing gun powder. Sardar Patel had started organizing the supply of gun powder. It was prone to absorbing moisture and clumping together. So, after the families retired, the Sikh youth would put out the tandoor and then dry up the gunpowder in the simmering heat.

Sikhs were better prepared than Hindus in self-defense. However, neither had much of a defense against local Muslims, who passed on information about the prettiest Sikh and Hindu girls to the outside mobs.

Everyone knew that it was only a matter of time before the Muslim mobs would descend on the Sikhs and Hindus. Protecting their womenfolk from predation was the biggest concern of every villager.

Some villagers tried to sell their homes and agricultural fields and leave. It wasn’t easy though. The sale price was depressed. Besides, where would they settle down on what would eventually become the Indian side?

Relocation, especially in turbulent times, isn’t easy to a farmer. There was also an unwritten code of conduct: You cannot abandon other villagers and quit. Almost everyone stayed back.

All bets were off with the announcement of the Partition in 1947. The British Indian Army was either disbanded or confined to the barracks because the British didn’t want to spend money on riot-control.

It was an open call for the Muslim mobs to descend upon the Sikhs and Hindus.

They were armed with precise information about the prettiest young women in every village. The mobs descended on the villages with the intent of killing Sikh and Hindu men and raping and abducting their women.

The Sikh and Hindu men valiantly fought until they ran out of gun powder. They would then see the writing on the wall. They would then herd their prettiest daughters and wives in the halls of the gurdwara.

Their fathers and brothers hugged them and cried. The young women didn’t cry. The luckier ones who still had the gunpowder shot their daughters and wives dead.

They knew what awaited the survivors: rape and the ignominy of being sold into a brothel house.

The less lucky ones, who had run out of gunpowder, had to end the lives of their beloved womenfolk with the kirpan.

Avtar Singh had three sisters, one younger and two elder to him. They were 5, 8, and 12. His father had run out of gunpowder but couldn’t bring himself to stab his three beautiful daughters and wife to death.

He attempted to flee with them to India. However, India was far away. It would take days to reach India. He needn’t have bothered though.

The family barely made it out of the village when they were intercepted by a Muslim mob.

Avtar Singh ran and hid behind a pump set. His father fought bravely but one man with a kirpan doesn’t stand much of a chance against a well-armed mob.

Avtar remembers seeing his father collapse while fighting. His white pagdi turned red as he collapsed to the ground.

Something landed next to the pump set with a thud. Avtar Singh recognized it. It was the body of his five-year-old sister Amandeep Kaur.

He didn’t understand much about life and death then but she didn’t move. Had someone just flung her violently? Avtar Singh pulled her, or it, closer, and hugged very tight. She felt cold.

He heard his mom scream. He just didn’t comprehend what he witnessed next. She had been disrobed and flailed her limbs. One man after another …

A tractor arrived on the scene. They loaded all the women on to it. Avtar Singh’s naked mother was one of those.

Avtar wanted to run to her. But what about Amandeep? He just sat there and silently cried. Everything fell silent very soon. A lot of bodies lay around. Stray dogs fought with one another. Avtar Singh either fell asleep or fainted.

He woke up in the arms of Kusum Kaur. She was the elderly village midwife. She gave him some water to drink. She lifted Amandeep and tossed her body into the well.

Avtar Singh asked her about his mother. Kusum Kaur replied, “Forget her. They would’ve sold her into the brothel in some city.” Avtar Singh didn’t understand what a brothel was.

Kusum Kaur told him that there was nothing left in the village. They should run and join a caravan of refugees. He just followed her.

They joined a caravan of Sikh and Hindu refugees a day later. They just walked. Occasionally, he was fed. It took them 10 days to reach Amritsar. He was then put on a train to a refugee camp in Ambala.

Avtar Singh would stay in a tent in the Baldev Nagar Camp in Ambala for the next 1.5 years. He rarely spoke. Everyday, he walked to the langar thrice to get some food to eat. He then returned to the tent and sat there silently.

He often thought about his mother. She was very nice. Why would they sell her into a brothel? What was a brothel?

He wondered whether Kusum Kaur tossed Amandeep into the well because she had died. He knew nothing about the other two sisters. Did they escape? Are they in a camp?

One day, he followed the routine of lining up at the langar to get his meal. He rarely looked up. The lady who was serving said, “Look up child and hold your plate and bowl straight. Otherwise, the dal would spill to the ground.” Her voice sounded soothing and familiar.

Avtar Singh looked up. It was his mother. She had just then moved in from another refugee camp.

Where was she all these days? It didn’t matter. He dropped the plate and the bowl. They both cried and hugged.

I realized that Avtar Singh was no longer narrating the story to me. He had merely traveled back into his past. I didn’t belong there.

Wow! Huge Amount of Properties of P. Chidambaram and Family!!


P. Chidambaram and his family owns the huge amount of properties and wealth. A list of these properties has come in the public domain now.

P. Chidambaram is the most prominent leader of Congress party – Indian National Congress and Karthi Chidambaram is his son.  He has been a minister, including the finance minister, in the Congress government for a very long time.

The question arises: How did he come to purchase all these properties, in India and in foreign countries? The violation of Indian law in purchasing these properties, comes only second. He did not declare, as an M. P. or Minister is legally bound to declare, all these properties and certainly there is violation of law on his part.

But the real issue is: How did he purchase so huge an amount of properties? It is a serious matter. It may even impinge on the national security of India.

Here is the list of all these properties:

● There are 12 houses in Chennai, 40 malls, 16 cinema theaters, 3 offices.

● 300 acres of land in Tamil Nadu.

● 500 Vasan Eye Hospitals across the country.

● 2000 ambulances in Rajasthan.

● 88 acres in the UK.

● 3 vineyards + horses in Africa.

● 3 resorts in Sri Lanka The famous tourist attraction in Sri Lanka.

● Karthi Chidambaram’s company has acquired most of the shares of ‘Lanka Bardson Residences’.

● Assets in Singapore, Malaysia & Thailand.

● Tennis Academy with 11 tennis courts in 4 acres in Barcelona (Spain).

● Similarly, Karthi Chidambaram’s Singaporean franchise has been involved with a Philippines-based company. Also bought a team that participates in the International Premier Tennis League.

● In Dubai and France, the lucrative investments of several lakh crore rupees

He has invested money in a total of 14 million rupees in London, Dubai, South Africa, the Philippines, Thailand, Singapore, Malaysia, Sri Lanka, British Virgin Island, France, USA, Switzerland, Greece and Spain.

All of these investments took place after 2006, held in Aircel-Maxis.

In 2011, a million pound worth property in the UK … Karthi Chidambaram’s Singaporean company has been acquired.

Similarly, the head of the Tush is headed by ‘Desert Tunes Limited’, ‘Fale Dubai FX. LLCs’ companies.

Karthi Chidambaram’s investment in Singapore company. Karthi Chidambaram’s Singaporean company is in partnership with another real estate company.

Investing in the company in Malaysia.

Buying 16 lands in Thailand.

The enforcement department has come to know from the sources: Karthi Chidambaram’s ‘Advantage Structural Consulting’ – The money transaction of Aircel-Maxis has been revealed.

P. Chidambaram served as Union Minister Between 2006 and 2014 – during the period Karthi Chidambaram has acquired assets abroad.

Perhaps he seems to believe that if he wears white Dhoti and cotton shirt – a traditional attire of noble and great people – and looks as humble as Kamraj – a revered and great political leader in the past hailing from the State of P. Chidambaram – he can fool Indian people! There he is wrong. Truth cannot be hidden forever and one has to pay for one’s crime – sooner or later!

All the details of these properties have  also been published here:

https://www.pgurus.com/chidambara-rahasya-details-of-huge-secret-assets-foreign-bank-accounts-of-chidambaram-family/

जुमला, जुमलेबाजी और जुमलेबाज!


लेखक: नामालूम

आज मोदी और उसकी कुल जमा चार साला सरकार के लिए एक शब्द प्रचलन में है या यूं कहिए जबरदस्ती प्रचलित किया जा रहा है “जुमला सरकार, मोदी जुमले-बाज”।

इसी के प्रकाश में आज हम थोड़ा बताना चाहेगें कि जुमलेबाजी क्या होती है और किस हद तक होती है । आखिर जुमलेबाजी की सीमा क्या होती है? यानि कोई नारा या आश्वासन या संकल्प आखिर कितने समय बाद जुमला कहलाता है ।

हमारे देश में एक प्रधानमंत्री हुए थे श्रीमान् जवाहरलाल नेहरू, स्वतंत्र भारत के पहले प्रधान मंत्री । उन्होंने एक नारा दिया था ‘गरीबी हटाओ’ । समय यही कोई 1950 के आस पास। महोदय ने 14 साल शासन किया (1950 के बाद)। हां, शासन किया। मरते दम तक उसके होठों पर यही नारा था ‘गरीबी हटाओ’ ।

इसी बीच गरीब घर के लाल बहादुर शास्त्री जी प्रधानमंत्री बने। उनको पर्याप्त समय नहीं मिला कि इस नारे की पड़ताल करते, बदलाव करते।

नेहरू अपना ‘ गरीबी हटाओ’ का नारा पुत्री इंदिरा को वसियत के रूप में सौंप कर गये। इंदिरा ने बड़ी शिद्दत के साथ इसे संभाल कर रखा, सींचा, सर्दी गर्मी और बारिश से बचा कर रखा क्या मजाल की नारे को जरा भी खरौंच आ जाये, हर लोकसभा चुनाव, हर विधान सभा चुनाव, हर जिला परिषद्, पंचायत, नगरपालिका चुनाव में गरीबी हटाओ का नारा उनके साथ रहा, झण्डों के रूप में, बैनरों के रूप में, बुकलेट के रूप में गरीबों की भीड़ के रूप में 1984 तक, नारा सोते उठते, गाते- खाते, पीते हर समय याद रहा, गरीबों को भूल गये । जाते जाते वही गरीबी हटाओ का नारा सुपुत्र राजीव गांधी को दे कर गई । या यूं कहो मां की जायदाद थी पुत्र ने ग्रहण कर ली ।

पांच साल तक राजीव ने गरीबी हटाओ का नारा पूरी जोशो खरोश से लगाया। पूरी ताकत इस नारे के पीछे झौंक दी ( सनद रहे गरीबी हटाने के पीछे नहीं, ताकत नारे के पीछे झौंकी)। एक से एक चमकदार पोस्टर छापे, सुन्दर चमकीले बड़े बड़े अक्षरों में दीवारों पर लिखा गया। इस नारे का जितना आदर सत्कार, पालन- पोषण हुआ उतना आदर सत्कार तो हमारे देश में राष्ट्रपतियों का भी नहीं हुआ ।

क्या गरीबी दूर हुई ?

इसके लिए किसी विपक्ष की, किसी बुद्धिजीवी की , किन्ही आंकड़ों की, किन्हीं अर्थशास्त्रियों की राय लेने की आवश्यकता नहीं । इसका जीता जागता सबूत खुद कांग्रेस की ही सरकार ने दिया जब खुद के साठ साल शासन के बावजूद उसको भोजन की गारण्टी कानून लाना पड़ा । यानी ६० साल के असीमित शासन के बावजूद आप इतना नहीं कर पाये की नागरिक अपने भोजन लायक खुद कमा सकें ।

स्वतंत्र भारत के इतिहास में इससे बड़ा जुमला नहीं हो सकता कोई । क्या गरीबी वो वास्तव में हटाना चाहते थे?

नहीं ये वो झूनझूना था जो रोते बच्चे के सामने बजाने से वो एक बारगी चुप हो जाता है । अगर नेहरू के समय गरीबी हट जाती तो इंदिरा किस पर शासन करती और यदि थोड़ा देर से ही सही इंदिरा के समय गरीबी हट जाती तो राजीव किस का राजा होता? गरीबों पर शासन के लिए गरीब चाहिए तो ।

ये वो जुमला था जिसके बल पर नेहरू की तीन तीन पीढ़ियों ने अपना पेट ही नहीं खजाना भरा ।

दूसरा जुमला- नेहरू का पंचशील सिद्धान्त, शांतिपूर्ण सह अस्तित्व का नारा था । रंगमहल से शांतिपूर्ण सहअस्तित्व का नारा देने वाले नेहरू के समय भारत ने तीन तीन युद्ध झेले. कमोबेश हर बार मात खायी । लेह और लद्दाख खोया, आधा कश्मीर खोया । भारत की साख खोयी, बफर स्टैट तिब्बत खोया । नेहरू किसके साथ शांति का राग अलापता था । देश दोनों और से हिंसक दुश्मनो से घिरा था । उसके पंचशील के जुमले का दंश भारत आज तक झेल रहा है ।

तीसरा जुमला था – गुट निरपेक्षता । किस से निरपेक्षता !! गुटनिरपेक्षता के नाम पर कभी बांडुंग,कभी काहिरा तो कभी बेलग्रेड में सुसज्जित मंचों से भाषण देने वाला और खुद के गले में गुट निरपेक्षता का हार डलवाने वाला नेहरु जब तक जीया सोवियतगुट का पिट्ठू रहा । सोवियत की पूंछ पकड़ कर चलने वाला नेहरू जीवन भर गुटनिरपेक्षता के गीत गाता रहा और भारत को धोबी का कुत्ता बना कर रखा ।

चौथा जुमला था- धर्मनिरपेक्षा । इस शब्द को इंदिरा ने अपनी सत्ता के मद में संविधान की प्रस्तावना में डलवाया । बहुत लोकतंत्र , संविधान की आज बात करने वाली इस पार्टी की, सत्ता मद में चूर उस शासिका ने उस समय लगभग आधे संविधान को ही बदल डाला था। और प्रस्तावना में जोड़ा धर्म निरपेक्षता शब्द । कैसी धर्मनिरपेक्षता, क्या धर्म निरपेक्षता के ये मायने हैं कि सत्ता केवल , मानव सभ्यता के पनपने से ले कर वर्तमान तक इस धरती पर पले बढ़े, फूले फले, बहुसंख्यक लोगों के विश्वास, श्रद्घा, मान्यताओं को तोड़ कर, कुचलकर उनके धर्मग्रंथों का मखौल उड़ा कर, उनके श्रद्धास्थलों को अपमानित कर, केवल एक विश्वास के लोगों को लेकर आगे बढ़े, केवल उन्हीं का दु:ख सरकार को दु:ख लगे , केवल उनकी गरीबी सरकार को गरीबी लगे , केवल उनकी श्रद्धा सरकार को श्रध्दा लगे शेष सब मिथ्या, मिथक, ढोंग लगे ?

इन जुमलों की गंभीरता देखिये। इनको पकने में वर्षों लगे और अंत तक जुमले ही रहे। गरीबी आज भी वहीं की वहीं है, शांतिपूर्ण सहअस्तित्व आज भी खतरे में है, गुट निरपेक्षता कब की धूल धुसरित हो गयी । आज भी लोग मनरेगा में गड्ढे खोद कर पेट भरते हैं । बहुत लम्बा , मतलब बहुत ही लम्बा समय मिला इन नारों को जमीन पर उतार कर सच्चाई में बदल कर नीतियां बनाने और लागू करने के लिए।

लेकिन नहीं किया क्योंकि वो इसके इच्छुक नहीं थे!

और आज जो इच्छुक है या दिल से ये करना चाहता है, जिसके पीछे कोई नहीं जिसको वो सत्ता सौंप कर जाये या जिसके लिए सत्ता के लालच में वो झूठे वादे करे, उसके वादे आपको जुमले लगते हैं । वो भी केवल चार साल में ! मात्र चार साल में !! नेहरू के 17 साल, इंदिरा के भी इतने ही साल और राजीव के पांच साल, सोनिया के दस साल, कुल ४९ साल एक ही परिवार एक ही नारा की ऐवज में आपको चार साल लम्बे लगने लगे !!

Saffron March of India in its North-East Corner!


By: Kalavai Venkat

I think the performance of the BJP in Nagaland is even more impressive than its performance in Tripura.

Bengalis constitute 65% of Tripura’s population. Although they’ve inexplicably voted left all along, there was always a glimmer of hope of turn around given that they’re Hindus.

Not an easy thing given that Bengalis often vote against self-interest but then always doable given that the state once produced Swami Vivekananda, Bankim Chandra, Sri Aurobindo, and Sri Ramakrishna.

Every Bengali I’ve personally known is intelligent so one could always bet that such people would eventually vote for the BJP.

Nagaland is very different. It is 90% Christian. A brief history is pertinent.

Christianity first invaded Nagaland in the 1870s. It was the Baptist or Evangelical variety. It was primarily driven by the Americans and supported by the British.

The resultant conversion of the Nagas was rapid. In the 1960s, the Christian missionaries launched what they called the Great Awakening. It had two goals. The first was to brainwash every Christian to have “personal encounters with Jesus.” This usually manifested in faith-healing and such acts of charlatanism.

It is also the most potent form of memetic virus because now the believer is not merely a Bible-thumper but also one who is convinced that his belief is true because he has personally experienced Jesus! The second was an outreach to convert the non-Christians and marginal Christians to this most virulent form of Christianity.

It was very successful because it was highly decentralized and was led by self-motivated and fanatical born-again Christians.

As a result, in just a century, Nagaland had become over 90% Christian. Over 96% of the Nagas were Christian and at least 75% of them Baptists. Remember this happened in an era when there was not much of communication technology. It was also an era when American hegemony hadn’t begun yet and hence the Americans didn’t throw their institutional might behind conversions.

Today, Christianity has acquired these additional capabilities. This is precisely why I point out that if Christianity is not checked today, India would be a Christian-majority nation by 2050.

Coming back to Nagaland, the control the pastors and congregations exercise on every believer is complete. Shepherds nominated by the church monitor every activity of the believer. This is the feature of many Christian communities in NE states. Every aspect of life from school admission to burial rites has to happen under the watchful eyes of the church.

The assault on native Naga traditions has been extensive. Some of you would be familiar with the control exercised by the churches on the converted fishermen of coastal Tamilnadu. If those are repressive then what one would witness in Nagaland is orders of magnitude worse.

Children are brainwashed from early childhood into believing the Christian faith claims and their worldviews are warped. Movements such as Nagaland for Christ didn’t arise in a void. Those are the inevitable consequences of a systematic, century-long brainwashing of a defenseless people.

The most discernible feature of the mind of a convert is that it is impervious to reason. It is tuned to accept what the church authorities say. Much of it is explained by a biological phenomenon knows as imprinting. The church authorities exploit it to the fullest not only to reinforce the Christian faith claims but also by issuing diktats during elections. The congregations usually conform.

This is precisely why the church was able to order and mobilize the congregations to blockade the Kudankulum Nuclear Plant for several months in Tamilnadu in a belligerent display of treason.

This is what makes the BJP’s performance in Nagaland even more spectacular.

A skeptic would attribute it to its alignment with tribal parties. However, that is not a sufficient explanation. The church wouldn’t have taken kindly to the alignment of any tribal party with Hindutva. It would’ve mobilized the congregations to shun that tribal party. Yet, the BJP appears to have achieved the impossible.

I do not yet have an explanation as to how they achieved it. However, this is something I would keenly study because this offers insights into how the Hindus could defeat Christianity in Tamilnadu, Andhra, and Kerala. If you could buck the Evangelicals in Nagaland then you could buck every other Christian denomination elsewhere in India.

Hats off Saffron warriors! You have inspired me. This has been the most colorful Holi splashed with every shade of saffron!

Sri Sri Jayendra Saraswathi’s Service to India: An Obituary


By: Shriraj Nair

An era has just ended in the hoary history of the Kanch Kamakoti Math, with the Maha Samadhi of Sri Sri Jayendra Saraswathi, the 69th Peetadhipathi of the Kamakoti Peetam. There is an overwhelming sense of loss and despair amongst the devotees of the math and the Acharya.

It is even more significant if one dispassionately considers the deep impact that Sri Sri Jayendra Saraswathi Swamigal had left on every aspect of the math functioning. He was chosen as the successor to the Paramcharya (as his predecessor Sri Sri Chandrasekarendhra Saraswathi was known to all) at the young age of 20 and for almost four decades lived under shadow of the towering Paramacharya.

It is a very difficult thing in any human activity to be the second in command, while the number one is in absolute control and is a larger than life kind of personality, which the Paramacharya was, very deservingly of course. He was a very disciplined deputy and was known for his total devotion to the Paramacharya, a fact that those closely linked to the Math can vouch for.

The four decades that he was with his senior, were very difficult times for the sanadhana dharma (Hinduism if one were to use a contemporary terminology), as this state had often had elected governments, where the ruling party was inimical to the faith in general and to the math and its followers in particular. Caste based politics and the resultant bitterness was far too obvious to escape the notice of even a casual traveler to the state.

The math had to break out of its traditional moorings and reach out to the people at large, as missionaries of the Abrahamic faiths were creating havoc in the coastal and southern districts of the state of TN, causing great level of anxiety to the people and the government. Unfortunately, the successive state governments did precious little to stem the rot and were almost mute spectators to the gross misuse of religious freedom enshrined in the constitution.

It was in these circumstances that Sri Sri Jayendra Saraswathi decides to break the perceived shackles of sanyas and enter the social world to put a brake on the large scale conversions that were taking place resulting in levels of social unrest hitherto unseen and unheard of.

This decision necessitated even his ignoring instructions to the contrary perhaps even from the Paramacharya himself. He realized at the very beginning that the only way we can stop this was to shed the faith of the caste based discriminations and erase the dividing line between the math and the Hindus of so called lower castes.

This strategy, expectedly, met with stiff resistance and derisive comments not only from within the math but also from Hindus outside, especially the upper caste Hindus (more importantly a section of the Brahmin community). What was not observed correctly and appreciated by most commentators was that in braking the caste based discrimination and uniting the Hindus under one identity, he had inevitably invited the wrath of the minority missionaries and the so called secular brigade.

Unmindful of all this, Sri Sri Jaydendra went about his tasks of uniting the Hindus through service, through such organizations like Jan Kalyan, Jan Jagran etc. He was given unconditional support by the RSS, Hindu Munnani and Viswa Hindu Parishad etc., making it even more uncomfortable for the minority outfits. Given the source of limitless funds and other resources, the minority institutions could play havoc with the hapless math and the Acharya, which they did with aplomb.

Meanwhile, Sri Sri Jayendra initiated multivarious activities like revival of old dilapidated temples, revision of wages for poojaris/archakas of small village temples, educational institutions for the economically weaker sections, health care through numerous hospitals etc.

The last two were going to earn him bigger enemies who were raking in crores through their own private institutions in these fields. Here again the minority community question was inevitably linked, especially the Christian lobby.

That’s what finally landed him in the mess that was Sankara Raman murder case. He touched those areas that were invariably linked to the minority-politician nexus which has an unimaginably huge muscle power in our country, especially in states like TN, where anti-Hindu parties have been in power for long.

What am I talking about? Yes, a Hindu seer dared to stand up to this nexus and refused to budge and paid with his reputation, dignity, health and the overall image of the Math and himself.

Here comes the irony.

In this hour of despair he didn’t have anyone of substance backing him unconditionally, something unthinkable in other faiths. Those avowed devotees of the Math were more than ready of believe the media’s concocted stories. The political class was seeing what was politically convenient and taking such a stance. BJP and RSS with the other Hindu outfits were the only ones which were even prepared to consider getting to the truth.

The Hindu community in TN should have risen as one and resisted the media’s preplanned character assassination of the seer and forced the powers that be to behave. They failed him collectively.

More blatant was the Brahmin community’s response!

A whole lot of them were ready to believe the media than see the opposite side’s version. That some of the worst detractors of the Math and Sri Sri Jayendra, at that time, were people from the community itself, is the most bitted fact. This attitude comes from their appointing themselves judges of how the Acharyas should conduct themselves and how the Math should be administered.

This is from a community wherein not even 10% of the people observe their daily chores as stipulated in the shastras (nithyakarma anushtaanam), a good percentage take alcoholic beverages regularly, consume non-vegetarian food, a vast majority skip offerings to their ancestors via tharpanam, shrardham etc.

The worse is most of them compare Sri Sri Jayendra with his predecessor the Paramacharya and make derisive comments against the former. First, the comparison itself is completely unfair to both and is completely lacking in common sense as they both were working on different planes and at different times and very, very different set of circumstances.

The efforts of Sri Sri Jayendra in getting all Hindus (a majority of them, if not all) to identify with the Math as a representative of the Hindu faith, are incomparable. His contribution in getting rid of the Math’s Brahmin Tag, was singularly responsible for people of all communities identifying with the Math.

And, this is what India and Hindus need the most today to achieve their unity, in the face of an assault on Hinduism in the name of the politics of Dalits’ welfare, their conversion to Christianity and breaking India as a cohesive nation along its caste faultlines!

It is the result of his efforts that brought a vast cross section of the Hindu society to oppose the activities of DK, DMK and other Anti-Hindu activists, whenever the latter crossed the boundaries of decent politics and were bordering on selective outrage.

Their animosity towards him multiplied when political leaders and religious scholars from across the nation consulted him on the Ayodya issue which he offered to help resolve.

While many Muslim organization from UP as well as TN welcomed his efforts and offered to accept his recommendations, the Anti-Hindu political outfits in TN were systematically instigating an opposition to his effort, with clearly a vote bank mindset.

In a nutshell, one can see clearly, how the forces opposed to national interest could use the media and the powers that be to malign an important religious head of the majority community of this country and thereby weaken the faith’s popular support, and thereby aiding in conversion.

It is an irony that the so called forward castes failed to see this and instead put him on the accused stand and made him stand the trial by media.

Despite my great hesitation, I have to give a piece of my mind to my Brahmin friends, many of whom had declared him guilty even before the case was in court, just going by the media outrage.

Many disgruntled elements within this community, who had either disagreement with the Math in general or with the seer in particular, exploited this opportunity and poured venom in the guise of writing commentary. And of late, there are many who go around claiming to be great devotes of the Paramacharya (the numbers have grown exponentially after his Maha Samadhi), which is good if they restrict to expressing their devotion to him.

The unkindest cut of all that Sri Sri Jayendra had to stomach was that good percentage of these so called devotees of the Paramacharya were great critics of Sri Sri Jayendra and were almost dismissive of him.

To them, I ask, “Who are you to judge him? What is your qualification to do so? Do you know the kind of positive transformation he had brought about in the way the Math was perceived by the common Hindu outside the so called devotee crowd that you make up? How many of you live the way the shastras recommend? Have you ever cared to go to the institutions run by the Math and learnt how they are administered and how the funds are made available? Have you ever gone to any of those hospitals run by the Math and found out for yourselves as to how patient care is offered there and how the beneficiaries perceive these?

Many of you may not have any answers to these questions, because, you go by what the media vomits as news and sit in your living room and pass judgements against a man who dared to challenge those very forces and showed he could succeed.

It is the quirk of fate or irony of justice in this country that he had to go through the worst for daring to oppose those forces and his greatest failing was that he thought he had us behind him. For sure, we were behind him, but not to support, but to push him down!

We are ungrateful people who never deserved a Jayendra Saraswathi. We did not respect his sincere efforts at bringing in the changes that were desperately needed. We did not have the guts to stand by him when forces inimical to our national interest were hounding him out.

We now shed crocodile tears at his passing away. Shame on us for our hypocrisy.

He must be giving his famous disarming smile looking down at us from wherever he is now. At least from now on, let us carry on the good work started by him and compensate for all the dishonor and insults that we have heaped on him. I would dare say that, no single Acharya from the Sankara lineage could have contributed so extensively in critical social areas as His Holiness Sri Sri Jayendra had done in the last three decades (or longer).

More than ever before, we needed him now as the forces inimical to the nation and Hindu religion are gathering great strength and momentum to give one last shot at denying this nation its Hindu identity.

We have to defeat this at all costs and for that we need a few more Jayendras!

‘AMU Protest’ against Indian President, Sir Syed Ahmad and a Page from History


By: Jithesh Valiyat

Why Aligarh Muslim University (AMU)’s ‘peacefuls’ are protesting against President of India? Let us know.

In 2010 Ranganath Mishra a SC judge recommended 15 percent Reservations to Muslims. At that time Ramnath Kovind was BJP Spokesperson and he said Islam and Christianity are ‘Alien to Notion’ of caste and hence can’t be given reservation. But ‘Presstitutes’ twisted it and made it as if he said Islam and Christianity are ALIEN TO INDIA!!

Now based on that fake news peddled by media, some rogues in Aligarh Muslim University are asking apology from  the President of India and boycotting his Program in the AMU. It is not that we expect some thing better from a University that was founded by a British Stooge and India hater Syed Ahmad khan who was father of Indian Partition!

To analyse the mentality of this protest, one has to look at the history of AMU. Here is a page from history.

Do we need a University which was started by a man who called Freedom fighters as ‘Haramzaadgi (=an act of villainy)’ and who laid the foundation for the partition of India?

Aligarh Muslim university had started as ‘Mohammedan Anglo Oriental College’ in 1875 by ‘Sir’ Syed Ahmad Khan. And the most unfortunate thing was that this swamp of a place, which laid the foundation for the partition of India over millions of dead bodies, was started with the funds from Hindu Rajas – Maharaja of Patiala and Vizianagaram’s Maharaja.

Syed Ahmad Khan was a favorite of the British empire. He was knighted as ‘Sir’ for his support to the British during 1857 War of Independence. He called the act of Muslims fighting against the British as “HaramZaadgi (=an act of villainy)”. Seeing his talent in ‘Gaddari (=treachery)’ against his own people, he was called to London and officially pampered by Lords as part of their Divide and Rule Policy. He was given permission and funds to start madrasas and colleges to create British favoring Muslim clerks in India. So he started ‘Mohammedan Anglo College’ which later become Aligarh Muslim university.

Syed Khan claimed himself as the descendant of Mughals and actively worked to promote loyalty to the British Empire among Indian Muslims. He hated Hindi as he considered it as a Hindu language and actively promoted Urdu as official language of the United Provinces (U.P.) after Persian language. British again helped him in this work.

He lobbied with the British to make Muslim civil servants so that they can control the imperial administration in India. He became a part of Indian National Congress and in that organization he opposed the party’s demand for Democratic self governance of the people of India. He didn’t want independence of India as he feared the independence will give power to Hindu majority population. And hence he preferred the ‘British Raj’ with special preference to Muslims.

He told Muslims to prefer the ‘People of Book’  – the British – rather than Hindus. He wrote,

“At this time our nation is in a bad state in regards to education and wealth, but God has given us the light of religion and the Quran is present for our guidance, which has ordained them (British) and us to be friends. Now God has made them rulers over us. Therefore we should cultivate friendship with them, and should adopt that method by which their rule may remain permanent and firm in India, and may not pass into the hands of the Bengalis… If we join the political movement of the Bengalis our nation will reap a loss, for we do not want to become subjects of the Hindus instead of the subjects of the “people of the Book…”

Later in his life he said,

“Suppose that the English community and the army were to leave India, taking with them all their cannons and their splendid weapons and all else, who then would be the rulers of India?…. Is it possible that under these circumstances two nations – the Mohammedans and the Hindus – could sit on the same throne and remain equal in power? Most certainly not. It is necessary that one of them should conquer the other. To hope that both could remain equal is to desire the impossible and the inconceivable. But until one nation has conquered the other and made it obedient, peace cannot reign in the land”

He founded the ‘Aligarh Movement’ and brought all the Muslim elite under one political banner, which led to the formation of ‘All India Muslim League’.

It is this Muslim League which instigated Muslims to fight for Pakistan. This lead to the savage act nicknamed ‘Direct Action’ and ultimately resulted in the ‘Partition of India’, which was achieved over the millions of dead bodies of Hindus and Muslims and causing later genocide of Hindus in East Bengal.

Now, the rogue nation of Pakistan, which supplies terrorists to the world, is a baby of these ideas of Syed Ahmad Khan. He never accepted Hindus and actively sowed the seeds for the division of India on religious lines.

Now answer this:

Who should apologize to India – the democratically elected President of India (based on the fake news of Presstitutes) or the followers of Syed Ahmad Khan in AMU who was responsible for the partition of India and genocide of millions? Who should apologize?

Truth cannot be hidden in a closet any longer now in this age of information technology. India must know the truth.

The question also arises: Why should Govt of India fund such an institution? Why do we celebrate Syed Ahmad Khan as a reformer? Why should he be not exposed for his treachery and religious narrow-mindedness and fanaticism? Why his followers in AMU who are spearheading such protest – who are but a few in number – be not exposed of their anti-national ideas, identified by names and isolated for their proper treatment?

If India is to survive as a free and democratic nation, it cannot afford any longer in this volatile world to continue with its old attitude,’sab chalta hai (=let such things go on as usual)! India must not remain lethargic!!

दलित बने ब्राहमण – भारत मे युग परिवतॆन की शुरुआत


कमांडर वी के जैटली

दलित बने ब्राह्मण, तिरुपति मंदिर के बने पुजारी, सबने अपने वर्ण को स्वयं चुना, अब से ये ब्राह्मण !

हिन्दुओ में जातिवाद सिर्फ मुगलो, ईसाईयों, वामपंथियों और सेकुलरों द्वारा फैलाई गयी है। असल में हिन्दुओ में जातिवाद की कोई व्यवस्था थी ही नहीं, जाति जन्म के आधार पर नहीं बल्कि आदमी क्या करता है उसके आधार पर होती थी।

पर इस व्यवस्था में भ्रष्टाचार डाल दिया गया और जाति पाती का भेद हो गया।

तिरुमला तिरुपति बोर्ड ने आज अपने 500 मंदिरों के लिए नए पुजारियों के पहले जत्थे को नियुक्त किया। ये सभी “हिन्दू” हैं और पुजारी बनने के विभिन्न संस्कारों के परीक्षाओं को पास करके पुजारी बने हैं।

ये सभी अब तिरुपति मंदिर में विभिन्न पूजा कर्म कराएँगे और ये सभी अब ब्राह्मण वर्ण में है ! हाँ संविधान के हिसाब से ये सभी SC, ST हैं, मायावती के हिसाब से ये सभी “दलित” हैं और अम्बेडकरवादीओ के हिसाब से ये सभी “शुद्र” हैं।

पर मनुस्मृति के अनुसार अब ये सब के सब “ब्राह्मण” बन चुके हैं क्योंकि इन्होंने ये वर्ण स्वयं चुना है, वर्ण कर्म के आधार पर होता है, चूँकि ये सभी अब पुजारी का कर्म करेंगे, और वर्ण व्यवस्था के हिसाब से ये कर्म करने वाले ब्राह्मण होते है, इसलिए ये सभी पुजारी अब से ब्राह्मण है।

आपने कई बार सुना होगा की दलित को मंदिर में नहीं जाने दिया, इत्यादि – ये सभी खेल ईसाईयों, मुगलों, वामियों और सेकुलरों द्वारा 16वी सदी के बाद शुरू किया गया क्यूंकि हिन्दू एकजुट होने लगे तो मुगलों ने हिन्दुओ में जातिवाद डालने की कोशिश की। फिर अंग्रेज आ गए उन्होंने ये काम किया और तब से वामपंथी और सेक्युलर ये काम कर रहे है। इन लोगो ने समाज के मन में जातिवाद इस कदर भर दिया है की आज भी जातिवाद की घटनाये सामने आती है, जबकि सनातन हिन्दू धर्म में ऐसी कोई रोकटोक नहीं है !

ये सिर्फ सनातन धर्म में वामियों, सेकुलरों, अंग्रेजो और उस से पहले के मुगलों द्वारा पैदा किये गए जातिगत भ्रष्टाचार के कारण आज भी होता है, जबकि आप देख सकते है जहाँ पर सनातन धर्म का पालन होता है जैसे की तिरुपति मंदिर, वहां पर शूद्र भी पुजारी बनते है और उसके बाद उनका वर्ण भी बदल जाता है और वो ब्राह्मण बन जाते है।

यह एक शुरुआत है भारत मे एक युगांतरकारी परिवतॆन की! यही है मनुसमित्री का असली या सही अथॆ!! यानि वणॆ – जाति नही वणॆ – कमॆ से निधारित होता है, न कि जनम से।

यह दलित राजनीति करने वालो को भारत का जवाब है! यह भारत को तोडने और टुकडों मे बाटने वालों को भारत का जवाब है। यह भारत मे हिदुंऔ को ईसाई बनाने वालो और मुसलिम-दलित गठजोड की राजनीति करने वालो को भारत का जवाब है।

आधयातमिक भारत का लक्ष भारत मे सभी को ब्राहमण बनाना है, सभी को उचच कोटि के इंसान बनाना है। वणॆ का क्रम आदमी के काम के अनुसार नीचे से ऊपर की ओर है – शुद्र से होते हुए ब्राहमण तक – और सभी को ऊपर उठना है और ब्राहमण बनना है।

भारत को दुनिया का आधातमिक गुरु बनने के लिये भारत मे हर एक आदमी को ब्राहमण बनना है – कमॆ से एक भी शुद्र नही, बलकि सभी ब्राहमण! जनम से कोई भी ब्राहमण नही, कोई भी शुद्र नही।

Really, “Let at least 10% Indians know these facts!”


Somebody has posted a message (allegedly inspired by the input from one Sudarsan PK) on social media to this effect: “Even If only 10% of Indians had been as curious about (how the below mentioned things happened – words added by us to make the meaning of the author clear) – India would have been a different place! – (sentence found at the end of this message).

It is very important to answer these insinuations, expose the malicious intention of the author of this message to defame the Modi government and emphasize that, yes, really it is necessary that at least 10% of Indians should know these facts!

And, let us add, if at lest 10% of Indians knew these facts, India would have been a different place!

In that case, in which way India would have been a different place?

In that case, this government – the Modi government – would have been more effective than now; made India a developed country faster then now; controlled the rampant corruption in India faster than now; sent the culprits to jail more in number faster in time than now; made the judiciary in its formation and workings more transparent than now; made the Upper House – Sajya Sabha – of Indian Parliament less obstructionist than now!

India is a free country – a democratic country – and anybody can say anything, right or wrong; even absurd or rubbish! And this statement about the absolute freedom to say whatever one likes includes all –  all means including the author who has penned the said message and the author answering him here.

Then, how to judge what is being said is correct or not correct? There is a test.

The test is: “India First”! The test is that the supreme interest is the interest of India – to the interest of this India, all other interests are subordinate: even the interests of the Indian political parties or of the bureaucracy or of the judiciary are subordinate to the interest of India! India and her interest come first!! Every other interests are only secondary and subservient to the supreme interest of India.

“India First” means only this much and this is the touchstone on the anvil of which the usefulness or correctness of what the author of the said message and the answer to the questions raised in the message has to be tested.

We intend to take ONE issue in ONE post here. Let us go:

(1) “Even If only 10% of Indians had been as curious about ‘How Judge Loya Died’, India would have been a different place!”

Answer: The author is very clever in putting this issue at No. 1 and in utilizing the weight of the prestige of judiciary in his favor by so putting it at No. 1. This issue directly related to Sohrabuddin and Ishrat Jahan and must be answered after those issues are answered. Therefore, we take up those issues at No. 4 and 5 after this:

(4) Even If only 10% of Indians had been as curious about “How Sohrabuddin was killed and how Kausar Bi just disappeared from the face of earth, India would have been a different place!”

Answer: Who was Sohrabuddin? Who was Kausar Bi? Before knowing how Sohrabuddin and Kausar Bi were killed, it is necessary to know who they were. They were terrorists! Who are terrorists? They challenge the India State. They have their own dream. This dream is to subdue all – all States, all governments, all countries, all humans who are undesirables – called Kafirs by them – in their view. Suppose for a moment, they succeed in India; then, there remains no State; no government; no courts of law; no Constitution of India! They have not succeeded yet, but they are trying their best to succeed. It is these people when one talks of Sohrabuddin, Kausar Bi, Ishrat Jahan and their tribe of terrorists. Then, how should they be dealt with by the Indian State, India, Indian government? Is this question worth being asked? It is a question of the survival of India – a Constitutional democratic India – as we know it. What is to be done by India to thwart such challenge to its survival?

It is what the USA did to Bin Laden. He was killed. He was pursued in a foreign country and killed there. Those who killed him were rewarded by the USA. Now, a counter question is posed to the author of the said message: Why should Sohrabuddin, Kausar Bi, Ishrat Jahan be not killed by the might of the Indian State? Why should those who killed them – even those who ordered to kill them – be not rewarded? Why should a judge or a court not take the judicial note of the fact that they were terrorists and that they needed to be killed by the State? It was reported in the press – at that time – that a court had even observed that the court was not interested to know whether Sohrabuddin or Ishrat Jahan was or was not a terrorist but was interested only to know whether these terrorists were or were not killed (in fake encounter)!

Suppose, these terrorists were killed intentionally (in fake encounter), should the organs of Indian State – including courts in India – not take note that all these State organs – including the courts of law – have the capacity to function with a Constitutional mandate of ‘Rule of Law’ only till these organs are not decimated by terrorists? Please have a look at what Syria, Iraq, Yezidis had to undergo at the hands of terrorists! Or, you think India is invincible forever? Everybody has a duty to learn from the history and give a helping hand to those who are aware of this history and trying their best to safeguard India and her future as a free country. Nobody can take liberty to remain ignorant of history, in the volatile world of today!

Here comes the issue of rewarding those who – might have – ordered to kill these terrorists; the issue of Judge Loya and his supposed intention to punish those were found to have ordered the killing of these terrorists; the issue of changing the law dealing with terrorists or changing and / or appointing the appropriate judges; the issue of those politicians who obstruct in Rajya Sabha of Parliament making of needed laws to achieve the desired result in dealing with such abysmal condition of Indian polity.

Let at least 10% Indians know these facts’!

(5) How, Ishrat Jahan died,

Answer: It is answered at No. 4 above.

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