आखिर क्यों बिलबिलाये हुए हैं सभी मोदी-विरोधी ?


Lord Shiva’s Brihadeeswarar Temple: Marvel of Ancient Indian Architecture!

Lord Shiva Brihadeeswarar temple was built between CE 1003 and 1010 in Thanjavur, Tamil Nadu by Raja Raja Chozhani. It is a fine example of ancient Indian Architecture.


A Bangalore Girl Questios Rahul Gandhi, “Can You Compare With Narendra Modi?”

Source Credit: Karunaada Vaani

A Bangalore girl has written an open letter questioning Rahul Gandhi, which is going viral on social media. She asks Rahul Gandhi himself to decide whether he can be compared with Narendra Modi:

1) Millions of people follow Narendra Modi as their leader, they accept him as their role model, how many people in our country consider you Mr Rahul Gandhi their role model?

2) The country which doesn’t want to recognise itself as a ‘country of dynastic followers’ and identifies itself with an elected  leader Narendra Modi; but you represent the same dynasty which was rejected by people. Apart from having a Gandhi tag what is your achievement?

3) Every year Narendra Modi on his birthday meets his mother and she gifts him with Bhagvat Gita as an indication to follow the right path. Does your mother also do the same?

4) Narendra Modi, when he entered the Parliament for the first time, touched the floor of the house and called it the Temple of Democracy. Do you also consider the same? Have you ever respected the Parliament same way?

5) When he resigned as the Chief Minister of Gujarat after becoming PM, he donated 21 Lakhs rupees of his salary amount to the Children Education Fund of government staff. Have you ever contributed anything to the country, Rahul?

6) Under PM Modi leadership, in a span of 4 years, 478 terrorists have been shot dead. How many terrorists were killed when your government was in the power Rahul ji?

7) For 70 long years more than 30% of the poor people could not get a Gas connection, but Modi in a span of 4 years has given Gas connection to over 5 crore people. Why could your government not do it?

8) Modi doesn’t entertain any family favours or nepotism, but your family has dominated the entire Congress party and considers this party as their personal property. Why? How did Robert Vadra get so much favour when your government was in power?

9) The Doklam issue did not start after PM Modi government came to power; it  had started many years back when your government was in power. But PM Modi made the Chinese withdraw their troops, are you capable of doing that?

10) In a span of 4 years, there isn’t one corruption case against PM Modi or his government, can you show the period in your government when there was no corruption?

11) Your party people mock PM Modi as chaiwala. He accepts that he sold tea. Can you tell what your mother sold to become 4th richest Politician?

12) Narendra Modi travels to different countries for the benefit of Nation, can you tell for whose benefit do you go abroad?

13) PM Modi cleared OROP for soldiers, he got bulletproof jackets and helmets for our soldiers. What did your government give them?

14) He included more than 30 crore people into Jan Dhan Yojana within 3 years. Why wasn’t it possible in your 10 years rule?

15) In order to save girl child, PM Modi started Beti Bachao, Beti Padao campaign. What have you done to save girl child in the country, Rahul?

16) Modi started MUDRA, Life insurance schemes, which are benefiting crores of people in the country. How many schemes did you bring in 10 years?

17) Modi took brave decision to conduct surgical strikes in Pakistan, Burma and Bhutan to protect our borders. What did you do to protect our borders during your government?

18) Appreciating PM Modi’s work and leadership, he was invited by US, Britain, Australia, Canada, Bhutan, Sri Lanka, Afghanistan, Nepal and Japan to address their parliaments. How many countries invited you when you were in government?

19) In just 4 years, PM Modi became the most influential person, Times Person of the world. You were in politics since 2004, but what have you achieved?

20) Narendra Modi in front of 22,000 people in Madison Square Garden declared that we are not a Nation of beggars and snake charmers but a Nation of rulers. Do you have the spine to praise our Nation like that Rahul?

21) PM Modi works for 18 hours a day, he sleeps on flight to save time and money. How many hours do you work for the country, Rahul?

22) PM Modi has no strong political background, with his mere hard work and commitment and dedication he became the Prime Minister of the country. Are you capable of relinquishing the Gandhi tag and then achieving something with your potential?

23) At the age of 18 years, Modi left his home and joined RSS to serve the country. What were you doing at the age of 18 years, Rahul Gandhi?

24) Every citizen of this country would dream to achieve something like PM Modi, how many would want to follow you and become like you?

Rahul ji, it is not just the Gandhi tag what is required to this country but a person who can show the will and commitment to take the country forward.

धर्म-परिवर्तन पर उतारू ईसाई फादर की बोलती बंद हुई !

हिमांशु शुक्ला

क्रिसमस सायंकाल की घटना है. अपने शहर में एक मित्र के साथ संध्या भ्रमण पर निकला तो देखा कि शहर के एक चर्च में और उसके बाहर मेले जैसा माहौल है और भयंकर भीड़ उमड़ी पड़ी है.

चर्च के अंदर झाँका दो वहां छीना-झपटी चल रही थी. माजरा क्या है पता लगाने जब अंदर गया तो वहां देखा कि वहां फादर बाइबिल बाँट रहे थे और लोग समझ रहे थे कि नए साल की डायरी मुफ्त में बंट रही है। यह सरासर धोखाधड़ी थी।

कोलाहल की वजह मालूम हो गई पर फादर के लिए यह माहौल अपने मजहब को बेचने का बेहतरीन मौका था सो अपने तमाम बाईबिल की प्रतियों के साथ मंच पर चढ़ गए और हाथ में बाईबिल लेकर कहने लगे, “भाइयों, बहनों और प्यारे बच्चों. यह कोई डायरी नहीं है बल्कि प्रभु यीशु मसीह का पवित्र सन्देश है जिसे प्रभु ने सारी मानवजाति को सुनाने के लिए भेजा है. प्रभु यीशु आप सबको जिस गंदगी में जी रहे हैं उससे निकालने के लिए आया था, आप छोड़ दो पाखंडी अवतारों और झूठे ईश्वर मूर्तियों को पूजा और सारी मानवजाति के लिए उद्धारक बनाकर भेजे गए मसीहा की गोद में आ जाओ”.

जिस धर्म के प्रचार के लिए धोखाधड़ी का सहारा लिया जाये , यह बात उस धर्म के लिए बड़ी शर्म की बात होनी चाहिए। अच्छे या उत्तम धर्म के प्रचार के लिए , अच्छी या उत्तम नैतिकता भी होनी चाहिए। लेकिन बेशर्मी पर उतारू उन लोगों का क्या किया जाय जो किसी भी कीमत पर अपने धर्म को फ़ैलाने में लगे हों ? यह हाल है ईसाई धर्म प्रचारकों का जो भारत में अपने धर्म प्रचार के लिए सभी तरह के हथकंडे अपना रहे हैं।

मैंने फादर से पूछा , फादर मेरा एक सवाल है.

फादर- क्या ? पूछिए…

मैंने कहा आपने कहा कि ईसा को सारी मानवजाति के लिए उद्धारक बन कर भेजा गया था, ये बात बाईबिल में कहाँ लिखी है?

फादर- है बेटे, लिखी है.

मैंने कहा, फादर ! आपने शायद मेरा सवाल ठीक से नहीं सुना, मैंने पूछा कि बाईबिल में ये कहाँ लिखा है कि ईसा हम सब लोगों के लिए भेजे गए थे?

फादर मंच से नीचे उतर गए और मुझे न्यू टेस्टामेंट की एक प्रति थमाते हुए कहा, आप ये पवित्र किताब घर ले जाओ, इसके अंदर सबकुछ लिखा है.

मैंने कहा, मुझे मालूम है कि आप नहीं बताने वाले इसलिए यहाँ उपस्थित लोगों के भले के लिए मैं ही बता देता हूँ.

मैंने कहा, ईसा जब अपने बारह शिष्यों को धर्मप्रचार के लिए भेज रहे होते हैं तो उनसे कहते हैं जो बाईबिल में गोस्पेल ऑफ़ मैथ्यू (10:6) में लिखा है, “तुम गैर यहूदियों में मत जाना और न ही सामरियों के किसी नगर में जाना इसकी अपेक्षा केवल इजरायल के घराने की खोई हुई भेड़ों के पास जाना”।

मैंने फादर से कहा, आपकी बाईबिल के अनुसार तो ईसा ने अपने शिष्यों को केवल यहूदियों के पास जाने को कहा था और आप उनके शिष्य होकर हम गैर-यहूदियों के पास आ गए यानि आपने खुद ही अपने प्रभु की आज्ञा का उल्लंघन कर दिया ?

(फादर के चेहरे पर शिकन आ गई और तब तक भीड़ भी हमारे गिर्द इकठ्ठा हो चुकी थी और खामोशी से ये वार्तालाप सुन रही थी)

फादर ने कहा, नहीं बेटे ! वो तो प्रभु ने अपने शिष्यों को कही थी पर वो स्वयं सारी इंसानियत के उद्दारक बनाकर भेजे गए थे.

मैंने कहा, फादर ! फिर तो मुझे लगता है शायद आपने अपनी बाईबिल ठीक से पढ़ी नहीं क्यूंकि गोस्पेल ऑफ़ मैथ्यू (15:24) में खुद ईसा कहतें हैं, “मैं केवल इजरायल के घराने की खोई हुई भेड़ों के लिए भेजा गया हूँ”.

अब आप मुझे बताये कि झूठ ईसा बोल रहे हैं या आप ?

फिर मैंने भीड़ की तरफ मुखातिब होते हुए कहा कि इनके प्रभु को केवल यहूदियों के लिए भेजा गया था और ये लोग अपने प्रभु की ही आज्ञा का उल्लंघन कर हमारे पास आ गए अपना किताब बांटने और धर्म बेचने.

फादर के चेहरे पर हवाइयां उड़ रही थी और लोगों की अब दिलचस्पी बढ़ने लगी थी, ये देख मैंने भीड़ से पूछा, आपको पता है कि हमारे आपके जैसे एक गैर-यहूदी की हैसियत ईसा के नज़रों में क्या थी?

भीड़ से आवाज़ आई. बताइए.

मैंने फादर से पूछा, श्रीमान् ! ये बात आप इन्हें बताएँगे कि मैं इन्हें बता दूं?

फादर खामोश थे सो मैंने बोलना शुरू कर दिया. मैंने कहा, इनके बाईबिल के अनुसार गोस्पेल ऑफ़ मैथ्यू (15:21-26) में आता है कि ईसा जब सूर और सैदा क्षेत्र में धर्म प्रचार कर रहे थे तो उनके पास एक गैर-यहूदी महिला आई जिसकी बेटी को प्रेतात्मा लग गया था. वो ईसा से अनुरोध करने लगी कि मेरी बेटी से प्रेतात्मा निकाल दो. जब ईसा को ये पता चला कि ये महिला गैर-यहूदी है तो उन्होंने कहा, “कुत्तों के पिल्लों के आगे रोटी डालना ठीक नहीं”.

मैंने भीड़ से कहा, इनके बाईबिल के अनुसार इनके ईसा के नजर में हमारी हैसियत कुत्ते के पिल्लों की तरह है. ये सब सुनने आप सब यहाँ आयें हैं ?

भीड़ में कसमसाहट बढ़ने लगी और कुछ लोग आगे निकल से फादर से सवाल पूछने लगे.

फादर के पास एक नन भी आकर खड़ी थी, मैंने उनसे पूछा, आपने कभी ये कुत्ते वाली लाइन अपने बाईबिल में देखी कि नहीं? नन सर झुकाए हुए खामोश खड़ी थी.

मैंने फादर से पूछा, Who was the founder of Christianity?

फादर से पहले ही एक दूसरी नन तुरंत बोल उठी – जीसस

मैंने कहा, बाईबिल में कहीं भी नहीं लिखा है कि Jesus was founder of Christianity. बल्कि बाईबिल से तो ये मालूम होता है कि ईसा एक यहूदी पैदा हुए और एक यहूदी ही मरे और तो और उनको यहूदी धर्म में सुधार के मकसद से भेजा गया था न कि ईसाइयत के रूप में कोई नया मजहब शुरू करने.

अब फादर बोल उठे- आप जो भी कहोगे क्या हम मान लेंगे ? आप बताइए कि अगर ईसा ईसाइयत के जनक नहीं थे तो और कौन थे ?

मैंने कहा, ईसाई धर्म संत पॉल का आरंभ किया हुआ था न कि ईसा का और इस बात का प्रमाण खुद आपके बाईबिल में मौजूद है, आप न्यू टेस्टामेंट से गोस्पेल ऑफ़ मैथ्यू, 5:17 पढ़िए, वहां जीसस कहतें हैं, “तुम ये न समझो कि मैं व्यवस्था या नबियों को नष्ट करने आया हूँ. मैंने उन्हें नष्ट करने नहीं अपितु पूरा करने आया हूँ”.

(चर्च के ननों और अधिकारियों में खामोशी थी)

मैंने तुरंत अगला सवाल दागा- फादर ! आप मानते हैं कि बाईबिल ईश्वरीय ग्रन्थ है?

फादर ने कहा, हमें इस पर कोई शंका नहीं है कि यह ईश्वरीय किताब है.

मैंने कहा, वैरी गुड. मैं बस एक उदाहरण दूंगा जो साबित कर देगा कि आपकी ये किताब ईश्वरीय किताब नहीं है.

(भीड़ से आवाज़ आई, बताइए भाई..बताइए)

मैंने चर्च वालों से कहा, आप न्यू टेस्टामेंट के सबसे आख़िरी अध्याय पर जाइए और वहां जाकर 22 वें अध्याय की 18वीं तथा 19वीं वर्स को पढ़िए.

चर्च से तो नहीं पर भीड़ से एक उत्साही युवक ने पढ़ा. वहां लिखा था: “मैं प्रत्येक को जो इस पुस्तक की नबूबत के वचनों को सुनता है गवाही देता हूँ, यदि कोई इनमें कुछ बढ़ाएगा तो परमेश्वर इस पुस्तक में लिखी विपत्तियों को उस पर बढ़ाएगा और यदि कोई इस नबूबत की पुस्तक के वचनों को घटाएगा तो परमेश्वर इस पुस्तक में लिखित जीवन के वृक्ष और पवित्र नगरी से उसका भाग छीन लेगा”.

फादर से मैंने पूछा, फादर ! इस भाई ने आपकी बाईबिल से जो पढ़ा वो सही है ?

फादर- हाँ सही है पर आप कहना क्या चाहते हैं ?

मैंने कहा, आप सबको पता है कि ईसाई दुनिया आज मुख्यतया दो भागों में विभक्त है, रोमन कैथोलिक और प्रोटोस्टेंट?

कुछ ने कहा, हाँ…

मैंने फादर की ओर मुड़कर कहा कि रोमन कैथोलिकों के अनुसार बाईबिल में कुल 73 किताबें हैं, 46 ओल्ड टेस्टामेंट में और 27 न्यू टेस्टामेंट में तथा प्रोटेस्टेंट के अनुसार बाईबिल में केवल 66 किताबें ही हैं, 39 ओल्ड टेस्टामेंट में और 27 न्यू टेस्टामेंट में. यानि न्यू टेस्टामेंट की किताबों की कुल संख्या को लेकर दोनों में मतभेद नहीं है पर ओल्ड टेस्टामेंट की किताबों को लेकर दोनों सेक्ट्स में जबर्दस्त मतभिन्नता है. इसलिए कैथोलिक प्रकाशन के बाईबिल में ओल्ड टेस्टामेंट में 46 किताबें होती है और प्रोटेस्टेंट के द्वारा प्रकाशित बाईबिल के ओल्ड टेस्टामेंट में सिर्फ 39 किताबें.

मैंने फादर से कहा, फादर ! अब दोनों ही दावे तो सही नहीं हो सकते, इनमें से कोई एक ही तो सही होगा न? यानि अगर रोमन कैथोलिक सही हैं कि बाईबिल में कुल 46 किताबें ही है तो फिर प्रोटोस्टेंट गलत हैं क्यूंकि उन्होंने इसमें से 7 किताबें निकाल के बाहर फेंक दी और अगर प्रोटोस्टेंट सही हैं कि बाईबिल में केवल 39 किताबें ही है तो इसका अर्थ है कि रोमन कैथोलिक गलत हैं क्यूंकि उन्होंने इसमें 7 किताबें जोड़ दी?

अब आइये आपके बाईबिल के उस वर्स की ओर जिसे इस भाई ने अभी पढ़ा जिसमें लिखा है कि “अगर कोई इस ईश्वरीय किताब में कुछ जोड़ दे या इसमें से कुछ हटा दे तो प्रभु उस पर तमाम विपत्ति तो ढाएगा ही साथ ही स्वर्गिक राज्य से भी उसे वंचित कर देगा”

तो फादर स्थिति ये बन रही है कि ईसाईयत के इन दोनों बड़े समुदायों में कोई एक तो है जिसने इस किताब के निर्देश के खिलाफ गुस्ताखी की है इस लिए जरूर ही इनमें से किसी को ईश्वर ने इस किताब में वर्णित प्लेग, गंधक और आग की बारिश जैसे अज़ाबों से नवाज़ा होगा?

अब आप बताएं कि कब कैथोलिकों के ऊपर या प्रोटेस्टेंटो के ऊपर गंधक और आग की बारिश हुई थी या उन सबको इकट्ठे प्लेग हुआ था ?

फादर के पास कोई जबाब नहीं था तो मैंने कहा, आपके बाईबिल के इस एक वर्स ने आपके ईश्वरीय किताब के दावे की हवा निकाल दी.

फादर से मैंने कहा, चलिए इस बात को छोड़िये इतिहास में क्या जाना. खैर आप मुझे ये बताइए कि क्या आप ईसा के मानने वाले सच्चे विश्वासी हैं ?

फादर ने कहा, ये क्या बेहूदा सवाल है…मैं बिना विश्वासी हुए ही फादर हो गया ?

मैंने कहा, देखिये आप नाराज़ न हो…आपके बाईबिल के गोस्पेल ऑफ़ मार्क्स के अंतिम अध्याय के 17 से लेकर 18 वर्स में सच्चे विश्वासियों को पहचानने के लिए कुछ चिन्ह दिए गए हैं।

मैंने बाईबिल खोल के पढ़ते हुए कहा, इसमें लिखा है: “और विश्वास करने वालों में ये चिन्ह दिखाई देंगे; मेरे नाम से वो दुष्टात्माओं को निकालेंगे तथा नई-नई भाषाएं बोलेंगे, वो साँपों को उठा लेंगे और यदि वो प्राणघातक विष भी पी जाएँ तो इससे उनकी हानि न होगी, वे बीमारों पर हाथ रखेंगे और वो चंगे हो जायेंगे”

फादर, आप सच्चे विश्वासी हैं इसकी पुष्टि करने के लिए मेरे पास अभी सांप नहीं है जो मैं आपको उठाने के लिए दे सकूं और न ही विष है जो आपको खाने के लिए दूंगा. मेरे पास आपके बाईबिल का दिखाया हुआ दो रास्ता बचता है जिसके आधार पर मैं आपके सच्चे विश्वासी होने के पुष्टि कर सकता हूँ. एक तो ये है कि मैं बांग्ला भाषा बोल सकता हूँ तो आप पांच मिनट मुझसे बांग्ला में बात करके दिखा दें और अपने सच्चे विश्वासी होने का प्रमाण दे दें क्योंकि आपके बाईबिल के अनुसार एक सच्चा विश्वासी तो नई-नई भाषाएँ आसानी से बोल सकेगा या फिर दूसरा प्रमाण ये हो सकता है कि मेरे इस मित्र की माताजी लंबे समय से बीमार चल रही हैं, आप हमारे साथ चलिए और इनकी माता जी पर हाथ रखकर उन्हें चंगा कर दीजिये और अपने सच्चे विश्वासी होने का सबूत दे दीजिये.

निरुत्तर फादर के पास एक ही रास्ता बचा था जो हर लाचार आदमी चुनता है.

फादर ने मुझसे कहा, बेटे ! आप तर्क मत करो बस विश्वास करो तभी कुछ हासिल करोगे वरना भटक जाओगे.

अंग्रेजी या संस्कृत: कौन अधिक विकसित भाषा है?

कमांडर वी के जैटली

अंग्रेजी में ‘A QUICK BROWN FOX JUMPS OVER THE LAZY DOG’ एक प्रसिद्ध वाक्य है। अंग्रेजी वर्णमाला के सभी अक्षर उसमें समाहित हैं। किन्तु कुछ कमियाँ भी हैं :-

1) अंग्रेजी अक्षर 26 हैं और यहां जबरन 33 अक्षरों का उपयोग करना पड़ा है। चार O हैं और A,E,U तथा R दो-दो हैं।

2) अक्षरों का ABCD… यह स्थापित क्रम नहीं दिख रहा। सब अस्तव्यस्त है।

इसके विपरीत अब संस्कृत में चमत्कार देखिए !

तथोदधीन पफर्बाभीर्मयोSरिल्वाशिषां सह।।

(अर्थात्)- पक्षियों का प्रेम, शुद्ध बुद्धि का , दूसरे का बल अपहरण करने में पारंगत, शत्रु-संहारकों में अग्रणी, मन से निश्चल तथा निडर और महासागर का सर्जन करनार कौन? राजा मय कि जिसको शत्रुओं के भी आशीर्वाद मिले हैं।

आप देख सकते हैं कि संस्कृत वर्णमाला के सभी 33 व्यंजन इस पद्य में आ जाते हैं। इतना ही नहीं, उनका क्रम भी यथायोग्य है।

यह है एक ही अक्षरों का अद्भूत अर्थ विस्तार !

माघ कवि ने शिशुपालवधम् महाकाव्य में केवल “भ” और “र ” दो ही अक्षरों से एक श्लोक बनाया है। देखिये –

(अर्थात्) धरा को भी वजन लगे ऐसे वजनदार, वाद्य यंत्र जैसी आवाज निकालने वाले और मेघ जैसे काले निडर हाथी ने अपने दुश्मन हाथी पर हमला किया।

किरातार्जुनीयम् काव्य संग्रह में केवल “न” व्यंजन से अद्भुत श्लोक बनाया है और गजब का कौशल्य प्रयोग करके भारवि नामक महाकवि ने थोडे में बहुत कहा है:-

न नोननुन्नो नुन्नोनो नाना नाना नना ननु।
नुन्नोSनुन्नो ननुन्नेनो नानेना नन्नुनन्नुनुत्।।

(अर्थात्) जो मनुष्य युद्ध में अपने से दुर्बल मनुष्य के हाथों घायल हुआ है वह सच्चा मनुष्य नहीं है। ऐसे ही अपने से दुर्बल को घायल करता है वो भी मनुष्य नहीं है। घायल मनुष्य का स्वामी यदि घायल न हुआ हो तो ऐसे मनुष्य को घायल नहीं कहते और घायल मनुष्य को घायल करें वो भी मनुष्य नहीं है। वंदेसंस्कृतम् !!

कितने आश्चर्य की बात है…. भारत के 29 राज्यों के नाम.. श्री. संत तुलसीदास के इक दोहे में समाई हुई है।

राम नाम जपते अत्रि मत गुसिआउ।
पंक में उगोहमि अहि के छबि झाउ।।
रा – राजस्थान ! पं- पंजाब
म – महाराष्ट्र ! क- कर्नाटक
ना – नागालैंड ! मे- मेघालय
म – मणिपुर ! उ- उत्तराखंड
ज – जम्मू कश्मीर ! गो- गोवा
प – पश्चिम बंगाल ! ह- हरियाणा
ते – तेलंगाना ! मि- मिजोरम
अ – असम ! अ- अरुणाचल प्रदेश
त्रि – त्रिपुरा ! हि- हिमाचल प्रदेश
म – मध्य प्रदेश ! के- केरल
त – तमिलनाडु ! छ- छत्तीसगढ़
गु – गुजरात ! बि- बिहार
सि – सिक्किम ! झा- झारखंड
आ- आंध्र प्रदेश ! उ- उड़ीसा
उ – उत्तर प्रदेश

एक कहानी – प्रजातंत्र में एक आदमी की

१ / २:

राम तिवारी

बचपन में एक कहानी सुनी थी, जो आज भी बहुत प्रचलित है। बाद में जब दुनिया की सारी भाषाओँ की लोक कथाएं पढ़ने की कोशिश की तो आश्चर्य हुआ कि यही कहानी रुसी भाषा में मिली,अरबी में मिली,करीब-करीब-दुनिया की सभी भाषाओँ में मिली,बस कुछ पात्र बदले हुए मिले।

एक तोता और एक मैना का जोड़ा था। एक बार भयानक सूखा पड़ा। लोग अनाज के दाने-दाने को तड़पने लगे। तोता-मैना उड़ते-उड़ते जा पहुँचे किसी दूर देश में जहाँ उन्हें एक चने का दाना मिला! उस चने के दाने को उन्होंने अपनी चोंचों से एक खूँटे से रगड़कर दो भागों में तोड़ने की कोशिश की। दाना टूट तो गया, लेकिन दो दालों में से एक दाल उसी खूँटे में फँस गई। मैना चालाक थी और बची हुई दाल को लेकर उड़ गयी। अब तोते के हिस्से की दाल बची और वह भी खूँटे के अन्दर। तोता बढ़ई के पास गया और बोला-
“बढ़ई-बढ़ई खूँटा चीरो,
खूँटे में दाल बा,
का खाई का पीई, का ले परदेस जाई?”

बढ़ई ने मना कर दिया, “हट तोता, मेरे पास इतना समय नहीं कि खूँटा चीरूँ तुम्हारे छोटे से काम के लिए।” तोता राजा के पास गया और बोला-
“राजा-राजा बढ़ई मारो,
बढ़ई न खूँटा चीरे,
खूँटे में ………………”

राजा ने भी मना कर दिया। तोता रानी के पास गया और बोला-
“रानी-रानी राजा छोड़ो,
राजा न बढ़ई मारे,
बढ़ई ………………..”

रानी ने भी मना कर दिया। तोता साँप के पास गया-
“साँप-साँप रानी डँसो,
रानी न राजा छोड़े,
राजा न बढ़ई मारे,
बढ़ई ……………….”

साँप ने भी मना कर दिया। तोता लाठी के पास गया।
“लाठी-लाठी साँप मारो,
साँप न रानी डँसे ……………..”

लाठी ने भी मना कर दिया। तोता आग के पास गया-
“आग-आग लाठी जारो, ………………………….”

आग ने भी मना कर दिया। तोता नदी के पास गया। (यहाँ नदी के स्थान पर कहीं-कहीं समुद्र का जिक्र मिलता है।)
“नदी-नदी आग बुझाओ, ………………………”

नदी ने भी मना कर दिया। तोता हाथी के पास गया-
“हाथी-हाथी नदी सोखो,  ……………………….”

हाथी ने भी मना कर दिया। तोता रोते हुए जा रहा था। उसका विलाप एक चींटी ने सुना। उसने कहा कि चलो मैं तुम्हारी समस्या का समाधान करने की कोशिश करती हूँ। वह सीधे हाथी की सूँड़ के अन्दर घुस गयी और काटने लगी।

हाथी परेशान हो गया और बोला-
“हमें काटो-वाटो मत कोई, हम नदी सोखब लोई”

और वह नदी सोखने नदी के पास जा पहुँचा। नदी बोली-
“हमें सोखो-वोखो मत कोई, हम तो आग बुझाइब लोई”

और इस तरह धीरे-धीरे क्रम आगे बढ़ई तक पहुँच जाता है। बढ़ई राजा से कहता है-
“हमें मारो-वारो मत कोई, हम खूँटा चीरब लोई”

और आखिर में कहानी के दो रूप मिलते हैं-

एक में खूँटा कहता है- “हमें चीरो-ऊरो मत कोई, हम दाल देब लोई।”

और दूसरे में बढ़ई खूँटा हल्का सा चीर देता है और तोते को दाल मिल जाती है।

बचपन में सुनी इस कहानी को उस समय सुनने में मज़ा तो बहुत आया, किन्तु इसके शाब्दिक अर्थ से अलग हटकर अिधक समझ में कुछ नहीं आया। लेकिन आज जितना ही सोचता हूँ, इस कहानी को सामाजिक दर्शन के एक शक्तिशाली आयाम को निरूपित करता हुआ पाता हूँ। कभी-कभी तो लगता है कि पूरी सामाजिक और प्रशासनिक प्रक्रिया को जैसे यह कहानी निचोड़ कर हमारे सामने लाकर रख देती है। इन सघन क्रियाओं का जितना सहज निरूपण यह कहानी कर देती है वह शायद कहीं और देखने को नहीं मिलता है।

सबसे अहम भूमिका इस कहानी में चींटी की है। चींटी की विचार-प्रक्रियाओं पर जरा हम विचार करें। आत्म बलिदान तक हो जाने, आत्मोत्सर्ग तक की शक्ति ज़रूर उस चींटी में थी। यदि हाथी ने चींटी को मसल दिया होता तो? यह ख्‍़ातरा तो चींटी ने उठाया ही था और ऐसी ही चींटियाँ, व्यवस्था की सोच की धारा को बदल सकती हैं।

फिर यह चींटी है कौन? यदि हम समाज के परिप्रेक्ष्य में देखें तो वह और कोई नहीं समाज का एक आम आदमी है और हाथी है व्यवस्था। एक अदना सा आम आदमी भी बहुत हद तक बदल सकता है व्यवस्था को। वही बस उठ जाये तो सारी व्यवस्था की सोच में परिवर्तन हो जाता है। लेकिन वह उठेगा हाथी के पास जाने के लिए, हाथी की सोच में परिवर्तन लाने के लिए, तो दब जाने की आशंका तो बनी ही रहेगी और उस आशंका से उठकर जब वह हिम्मत करेगा, तभी वह हाथी की सूँड़ में जाकर हाथी की सोच की दिशा बदल देने की स्थिति में आ पायेगा।

खूँटा, बढ़ई, राजा, रानी, आग, लाठी, नदी और हाथी; ये सभी व्यवस्था के विविध आयाम हैं। विविध फलक हैं। इन सबकी सोच में परिवर्तन हो सकता है, एक छोटी-सी चींटी की उमंग से कि चलो मैं एक सही काम के लिए, व्यवस्था से जूझने के लिए तैयार हूँ, आत्मोत्सर्ग के लिए तैयार हूँ।

यहाँ पर दो बातें और महत्त्वपूर्ण हैं। बढ़ई को केवल खूँटे को जरा सा चीर कर दाना निकाल देना था। राजा को भी बढ़ई को केवल डाँटकर काम करा देना था। किसी को जान का खतरा नहीं था। लेकिन किसी को तोते के प्रति जरा भी संवेदना नहीं हुई। लेकिन चींटी को इतनी संवेदना हुई कि वह जान की बाजी लगाकर हाथी के पास पहुँची। तो व्यवस्था परिवर्तन की इच्छा के लिए तीव्र संवेदना का होना आवश्यक है।

दूसरी बात यह कि चाहे बढ़ई हो, राजा हो, लाठी हो या साँप हो, हर एक के पास तोता गिड़गिड़ाते हुए गया लेकिन किसी ने उसकी बात पर ध्यान नहीं दिया। चींटी ने स्वयं ही तोते का दुःख देख उसके रोने का कारण, दुःखी होने का कारण पूछा। यह होती है सच्ची संवेदना। यदि कोई किसी से अपनी ज़रूरत बताये और गिडगिड़ाये और तब वह निराकरण की चेष्टा करे तो वह सच्ची संवेदना नहीं कही जा सकती। सच्ची संवेदना तो यह है कि जब कोई अपनी तरफ़ से दूसरों के दुःख को जानने की कोशिश करे और उसके निराकरण में जुट जाये जैसा कि चींटी ने किया।

यहाँ एक प्रश्न और भी उठता है। यह तो सच है कि बढ़ई संवेदनहीन था। लेकिन क्या राजा, रानी, साँप, नदी, लाठी, आग भी केवल संवेदनहीन थे? या उन सबमें निहित स्वार्थवश एक गठजोड़ भी था, जिसकी वजह से न तो वे एक-दूसरे की शिकायत सुनने को तैयार थे और न ही सज़ा देने को। इसकी प्रबल सम्भावना है कि निहित स्वार्थवश उनमें एक गठजोड़ रहा हो और वह केवल भयवश ही अंत में टूट सका।

वैसे इस कहानी में व्यवस्था का एक अच्छा फलक भी देखने को मिलता है। तोते को अपनी बात बेबाक़ कहने के लिए, बढ़ई, राजा, रानी, साँप, लाठी, आग, नदी, हाथी तक पहुँचने को तो मिल गया। वह बेरोक-टोक उनके पास पहुँच तो सका। आज का माहौल शायद और बिगड़ गया है। आज एक छोटा आदमी व्यवस्था के उच्च शिखरों तक पहुँच ही नहीं सकता, इसलिए और भी यह कहानी प्रासंगिक हो जाती है। अब तोते की सारी आशाएँ मात्र चींटी से ही रह जाती हैं।

अब आते हैं इस कहानी के सबसे महत्त्वपूर्ण पहलू पर।

तोते के चींटी से मिलने और चींटी के पास जाने तक जो व्यवस्था थी वह अक्रियाशील थी, असंवेदनशील थी। जब चींटी उठी तो पूरी व्यवस्था क्रियाशील हो उठी। सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि व्यवस्था में जो अंग हैं, वे वही हैं। वही बढ़ई है, वही राजा है, वही नदी है, वही लाठी है, वहीं साँप है, वही हाथी है। सब कोई अक्रियाशील थे और थोड़े ही अन्तराल में सब कोई क्रियाशील हो गये, एक चींटी के कमर कस लेने से। किसी को कोई अत्यिधक भागदौड़ भी नहीं करनी पड़ी। बस थोड़ा-सा भय और थोड़ा-सा अपने कर्तव्य का आभास और एहसास हो गया तो पूरी कार्यपद्धति में क्रियाशीलता आ गयी।

तो यही व्यवस्था और इसी व्यवस्था के लोग अच्छा काम कर सकते हैं। यही राजनीतिज्ञ, अिधकारी, नौकरशाह, प्रबन्धक, अध्यापक, व्यापारी, वकील, डॉक्टर सभी ठीक से काम कर सकते हैं। बस आम आदमी को चींटी बनना होगा।

चींटी भी एक सांकेतिक बिम्ब है। चींटी निरूपित करती है सीढ़ी में जो सबसे नीचे और छोटा-सा बिन्दु है उसे।

यदि व्यक्ति भौतिक और सामाजिक रूप से चींटी का स्वरूप नहीं ले सकता तो कम से कम अपने ‘इगो’ को, अहंकार को तो चींटी स्वरूप बना ही सकता है। तब भी वह बहुत कुछ कर सकने में सक्षम हो जायेगा। चींटी के बराबर हमारा अस्तित्व हो, या कम से कम चींटी के बराबर हमारा अहंकार हो और हममें हौसला हो तथा त्यागमय कर्म हो तो हम हाथी को भी सकारात्मक और सम्यक् रूप से क्रियाशील कर सकते हैं। पूरी व्यवस्था को बाध्य कर सकते हैं कि वह अपनी सोच की दिशा में समुचित परिवर्तन करे। व्यवस्था को संवेदनशील भी बना सकते हैं और क्रियाशील भी।

इस कहानी में ग़ौर करिए सबसे शक्तिशाली कौन है? उत्तर चींटी मिलता है। और चींटी सबसे शक्तिशाली है संवेदना के गुण के कारण ! धनबल , बाहुबल , संसाधन बल या ज्ञान बल में राजा रानी साँप आग पानी हाथी चींटी से कहीं आगे थे लेकिन संवेदना का बल न होने के कारण किसी ने कुछ नहीं किया । संवेदना ही मुख्य आंतरिक ताक़त है जो कार्य करने को विवश करती है । इसलिए शिक्षा और ट्रेनिंग के दौरान संवेदना का विकास सबसे ज़रूरी है ।

भारतीय संविधान संवेदना का एक महत्वपूर्ण श्रोत है,उसे जानने से चींटियों को , आम जनता को अपनी ताक़त का अहसास भी होने लगता है और देश के लोगों और प्रकृति से जुड़ाव व संवेदना पैदा होने लगती है ।

दो बातें और , अब हम सबको अपनी बाक़ी सारी प्रतबद्धताओं से ऊपर उठकर देश और मानवता के आधार पर सोचना होगा । दूसरे , इस अवधारणा को मन से निकालना होगा कि समय , ज़माना या युग ख़राब है ।

मेरी एक पुरानी कविता है –
‘वह भी ज़माने को बुरा कहने लगा है
लगता है
वह भी बुरे माहौल में रहने लगा है ‘

अगर आप अच्छे हैं, हम अच्छे हैं और ईश्वर वही है तो ज़माना बुरा कैसे हो सकता है ?

समग्रता में देखने पर तो सभी समय ईश्वरीय ही लगेगा । हमारा संविधान हममें यह विश्वास भरता है कि वर्तमान और भविष्य समय बहुत अच्छा है ।

यदि कहीं कोई कमी दिखती है उसे तो दूर करने की कोशिश भी हम सब को ही करनी है उसी चींटी की तरह ।
और अंत में:

कितना दर्द सहा होगा आजादी के मतवालों ने ;
जिन्होंने भारत मां की खातिर होम दिया अपने जीवन को , लेकिन फिर भी मरते मरते लब पर वंदे मातरम आता था।

ऐसे मां के वीर सपूत भगत सिंह राजगुरु सुखदेव चंद्र शेखर आज़ाद सुभाष चंद्र बोसे मास्टर सूर्य सेन और हज़ारों क्रन्तिकारी भारत माँ के सपूतों को नमन कोटि कोटि प्रणाम करते हुए – आओ हम यह व्रत लें कि हम भारत के निवासियों की तरक्की सुख और उज्वल भविष्य के लिए हम जो हम से बन पड़े वो करें। आज जब भारत उठ रहा है और आगे बढ़ रहा है हम अपनी मेहनत , संवेदना और कार्य से देश को उनके सपनों को पूरा करें !

२ / २:

अच्छे दिन कब आयेगें?

दिवार पर पेशाब करता व्यक्ति पूछता है , अच्छे दिन कब आयेंगे ?

बिजली चोरी करता व्यक्ति पूछता है, अच्छे दिन कब आयेंगे?

यहाँ-वहाँ कचरा फैंकता व्यक्ति पूछता है, अच्छे दिन कब आयेंगे?

कामचोर सरकारी कर्मचारी पूछता है, अच्छे दिन कब आयेंगे?

टेक्स चोरी करता व्यक्ति पूछता है, अच्छे दिन कब आयेंगे?

देश से गद्दारी करता व्यक्ति पूछता है, अच्छे दिन कब आयेंगे?

नोकरी पर देरी से व जल्दी घर दौड़ता कर्मचारी पूछता है, अच्छे दिन कब आयेंगे?

​लड़कियों से छेड़खानी करता व्यक्ति पूछता है, अच्छे दिन कब आयेंगे​

राष्ट्रगान के समय बातें करते स्कूलों के कुछ लोग पूछते है, अच्छे दिन कब आयेंगे?

स्कूल में बच्चों को न भेजने वाले लोग पूछते हैं, अच्छे दिन कब आयेंगे?

कसाई जैसे कमीशनखोर डाक्टर पूछता है अच्छे दिन कब आयेंगे?

सड़क पर रेड सिगनल तोड़ते लोग पूछते, अच्छे दिन कब आयेंगे?

किताबों से दूर भागते विद्यार्थी पूछते हैं, अच्छे दिन कब आयेंगे?

कारखानों में हराम खोरी करते लोग पूछते हैं, अच्छे दिन कब आयेंगे?

यदि खुद नहीं बदल सकते तो अच्छे दिनों की आस छोड़ दो।
क्योंकि देश आपके उपदेश से नहीं, आचरण से बदलेगा, तब आएंगे अच्छे दिन !

कांग्रेस देश पर 55 लाख 87 हजार 149 करोड़ का कर्ज छोड़ के गई है !
जिसका 1 वर्ष का ब्याज भरना पड़ रहा है = 4 लाख 27 हजार करोड़ !

यानि 1 महीने का = 35 हजार 584 करोड़ !
यानि 1 दिन का = 1 हज़ार 186 करोड़ !
यानि 1 घंटे का = 49 करोड़ !
यानि 1 मिनट का 81 लाख !
यानि 1 सेकेंड का 1,35,000!

जरा सोचिए ! जब देश लूटेरी कांग्रेस की मेहरबानी से
प्रति सेकेंड 1 लाख 35 हजार रूपये का तो सिर्फ पुराने कर्जे का ब्याज भर रहा है तो देश के अच्छे दिन आसानी से कैसे आएंगे..???

अत: जितना सम्भव हो भारतीय प्रोडक्ट ही ख़रीदे, देश को लूटने से बचाये, अर्थव्यस्था की मजबूती में अपना अमूल्य योगदान देकर भारतवर्ष को फिर से समृद्ध बनाये…!

यदि भारत के 121 करोड़ लोगों में से सिर्फ 10% लोग प्रतिदिन 10 रुपये का रस पियें तो महीने भर में होता है लगभग ” 3600 करोड़ “…!!!!

अगर आप…कोका कोला या पेप्सी पीते हैं तो ये ” 3600 करोड़ ” रुपये देश के बाहर चले जायेँगे…। कोका कोला, पेप्सी जैसी कंपनियाँ प्रतिदिन ” 7000 करोड़ ” से ज्यादा लूट लेती हैं..।

आपसे अनुरोध है क आप… गन्ने का जूस/ नारियल पानी/ आम/ फलों के रस आदि को अपनायें और देश का ” 7000 करोड़ ” रूपये बचाकर हमारे किसानों को दें…। ” किसान आत्महत्या नहीं करेंगे..”

फलों के रस के धंधे से  ” 1 करोड़ ” लोगो को रोजगार मिलेगा और 10 रूपये के रस का गिलास 5 रूपये में ही मिलेगा…।

स्वदेशी अपनाओ,  राष्ट्र को शक्तिशाली बनाओ..। स्वदेशी अपनाए देश बचाएे अगर सभी भारतीय 90
दिन तक कोई भी विदेशी सामान नहीं ख़रीदे… तो भारत दुनिया का दूसरा सबसे अमीर देश बन सकता है.. सिर्फ 90 दिन में ही भारत के 2 रुपये 1 डॉलर के बराबर हो जायेंगे.. हम सबको मिल कर ये कोशिश आजमानी चाहिए क्युकी ये देश है हमारा..!!!!

आज याद करो भगत सिहं व साथियों को ! श्रद्धांजली – आजाद भारत मे भ्रटाचारी सत्ता मे न आने पायें !!

1 of 3:          श्रीपाल सिंह

भगत सिंह और उनके साथी एक संगठन के सदस्य थे जिसका नाम था : हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन।  उसी संगठन के कमांडर इन चीफ थे चंद्र शेखर आज़ाद।  उस संगठन के रण बाँकुरों में कोई किसी से कम नहीं था। यह सही है कि उन सब में सबसे अधिक प्रसिद्धि भगत सिंह को मिली।  और यह भी सही है कि ‘सोशलिस्ट’ शब्द भगत सिंह के कहने पर ही जोड़ा गया था।  लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि १९२७ से १९३१ का दौर कम्युनिज्म , सोवियत संघ , लेनिन (जो १९२३ में दिवंगत हो गए थे), स्टालिन आदि के चरम उत्कर्ष का दौर था।  हर कोई पढ़ा लिखा आदमी उस विचार धारा से प्रभावित था।  इसी बात का फायदा उठा कर आज बहुत से लोग – तथाकथित क्रांतिकारी – भगत सिंह से १९३१ के विचारों का हवाला देतें हैं और उस विचारधारा की अच्छाई साबित करना चाहते हैं।  यह बात तर्कसंगत नहीं है।  उस समय – १९३१ में – भी बहुत से क्रांतिकारी ईश्वर में विश्वास रखते थे , चंद्र शेखर आज़ाद भी उनमे से एक थे।  अंग्रेज़ों ने इन क्रांतिकारियों पर मुकदमा चलाने के लिए एक कमीशन बनाया था जिसका नाम था : दिल्ली कांस्पीरेसी कमीशन।  उस कमीशन की प्रोसीडिंग्स  पढ़ने पर पता चलता है की आम तौर पर सभी क्रांतिकारी ईश्वर में निष्ठा रखने वाले लोग थे।  आज जब सोवियत संघ दुनिया के नक़्शे से मिट गया , जब कम्युनिस्ट चीन खुद एक राष्ट्र वादी देश है जो पूंजीवादी रास्ते पर चल रहा है , तो आज एक नई सोच की जरुरत है जो पूंजीवाद के लूट खसोट वाले रूप का भी मुकाबला कर सके और दुनिया को सही रास्ता भी दिखा सके।  आज भगत सिंह के १९३१ के विचारों की दुहाई दे कर पुरानी  और फेल विचारधारा को सही नहीं ठहराया जा सकता।  भारत ने एक अति विकसित और वैज्ञानिक आध्यात्मिक विचारधारा दुनिया को दी है , उसने बुद्ध दुनिया से सामने पेश किया है। हाँ , यह अलग बात है कि कोई आदमी न तो कम्युनिज्म मार्क्स लेनिन स्टालिन माओ को पढ़े और समझे और नाही आध्यत्मिक साहित्य व विचारों को पढ़े समझे और भगत सिंह का नाम लेकर  क्रन्तिकारी लफ़ाज़ी करे।   जिन लोगों ने मार्क्स दिया (जर्मनी) जिन लोगों ने लेनिन दिया (रूस ) वे लोग आज  आगे बढ़ कर श्री अरविन्द और विवेकानंद को महान विचारक और ऋषि मानते हैं, जो दुनिया की वर्तमान समस्याओं का बेहतर हल दे सकते हैं।

2 of 3: किरन मोहित

अब सब क़ैदी चुप हो चले थे. उनकी निगाहें उनकी कोठरी से गुज़रने वाले रास्ते पर लगी हुई थी.
भगतसिंह और उनके साथी फाँसी पर लटकाए जाने के लिए उसी रास्ते से गुज़रने वाले थे.

एक बार पहले जब भगतसिंह उसी रास्ते से ले जाए जा रहे थे तो पंजाब कांग्रेस के नेता भीमसेन सच्चर ने आवाज़ ऊँची कर उनसे पूछा था, “आप और आपके साथियों ने लाहौर कॉन्सपिरेसी केस में अपना बचाव क्यों नहीं किया.” भगतसिंह का जवाब था, “इन्क़लाबियों को मरना ही होता है, क्योंकि उनके मरने से ही उनका अभियान मज़बूत होता है, अदालत में अपील से नहीं.”

वॉर्डेन चरतसिंह भगतसिंह के ख़ैरख़्वाह थे और अपनी तरफ़ से जो कुछ बन पड़ता था, उनके लिए करते थे. उनकी वज़ह से ही लाहौर की द्वारकादास लाइब्रेरी से भगतसिंह के लिए किताबें निकल कर जेल के अन्दर आ पाती थीं.

भगतसिंह को किताबें पढ़ने का इतना शौक़ था कि एक बार उन्होंने अपने स्कूल के साथी जयदेव कपूर को लिखा था कि वो उनके लिए कार्ल लीबनेख़ की ‘मिलिट्रिज़म’, लेनिन की ‘लेफ़्ट-विंग कम्युनिज़्म’ और अपटन सिनक्लेयर का उपन्यास ‘द स्पाई’ कुलबीर के ज़रिये भिजवा दें.

भगतसिंह जेल की कठिन ज़िन्दगी के आदी हो चले थे. उनकी कोठरी नंबर 14 का फ़र्श पक्का नहीं था. उस पर घास उगी हुई थी. कोठरी में बस इतनी ही जगह थी कि उनका पाँच फिट, दस इंच का शरीर बमुश्क़िल उसमें लेट पाये.

भगतसिंह को फांसी दिए जाने से दो घंटे पहले उनके वकील प्राणनाथ मेहता उनसे मिलने पहुंचे. मेहता ने बाद में लिखा कि भगतसिंह अपनी छोटी-सी कोठरी में पिंजड़े में बन्द शेर की तरह चक्कर लगा रहे थे. उन्होंने मुस्करा कर मेहता को स्वागत किया, और पूछा कि आप मेरी किताब ‘रिवॉल्युशनरी लेनिन’ लाये या नहीं? जब मेहता ने उन्हें किताब दी तो वो उसे उसी समय पढ़ने लगे मानो उनके पास अब ज़्यादा समय न बचा हो. मेहता ने उनसे पूछा कि क्या आप देश को कोई सन्देश देना चाहेंगे? भगतसिंह ने किताब से अपना मुँह हटाये बग़ैर कहा, “सिर्फ़ दो संदेश… साम्राज्यवाद मुर्दाबाद और ‘इन्क़लाब ज़िन्दाबाद!”

इसके बाद भगतसिंह ने मेहता से कहा कि वो पंडित नेहरु और सुभाष बोस को मेरा धन्यवाद पहुंचा दें, जिन्होंने मेरे केस में गहरी रुचि ली थी.

भगतसिंह से मिलने के बाद प्राणनाथ मेहता राजगुरु से मिलने उनकी कोठरी पहुँचे. राजगुरु के अन्तिम शब्द थे, “हम लोग जल्द मिलेंगे.” सुखदेव ने मेहता को याद दिलाया कि वो उनकी मौत के बाद जेलर से वो कैरम बोर्ड ले लें जो उन्होंने उन्हें कुछ महीने पहले दिया था.

जेल अधिकारियों ने तीनों क्रान्तिकारियों को बता दिया कि उनको वक़्त से 12 घंटे पहले ही फांसी दी जा रही है. अगले दिन सुबह छह बजे की बज़ाय उन्हें उसी शाम सात बजे फांसी पर चढ़ा दिया जायेगा. भगतसिंह मेहता द्वारा दी गयी किताब के कुछ पन्ने ही पढ़ पाये थे. उनके मुँह से निकला, “क्या आप मुझे इस किताब का एक अध्याय भी ख़त्म नहीं करने देंगे?!”

भगतसिंह ने जेल के मुस्लिम सफ़ाई कर्मचारी बेबे से अनुरोध किया था कि वो उनके लिए उनको फांसी दिये जाने से एक दिन पहले शाम को अपने घर से खाना लाएँ.
लेकिन बेबे भगतसिंह की ये इच्छा पूरी नहीं कर सके, क्योंकि भगतसिंह को बारह घंटे पहले फांसी देने का फ़ैसला ले लिया गया और बेबे जेल के गेट के अन्दर ही नहीं घुस पाया.

थोड़ी देर बाद तीनों क्रान्तिकारियों को फांसी की तैयारी के लिए उनकी कोठरियों से बाहर निकाला गया. भगतसिंह, राजगुरु और सुखदेव ने अपने हाथ जोड़े और अपना प्रिय आज़ादी गीत गाने लगे-
कभी वो दिन भी आयेगा
कि जब आज़ाद हम होंगें
ये अपनी ही ज़मीं होगी
ये अपना आसमाँ होगा!

फिर इन तीनों का एक-एक करके वज़न लिया गया. सब के वज़न बढ़ गये थे. इन सबसे कहा गया कि अपना आख़िरी स्नान करें. फिर उनको काले कपड़े पहनाये गए. लेकिन उनके चेहरे खुले रहने दिये गए. चरतसिंह ने भगतसिंह के कान में फुसफुसा कर कहा कि वाहे गुरु को याद करो. भगतसिंह बोले, “पूरी ज़िन्दगी मैंने ईश्वर को याद नहीं किया. असल में मैंने कई बार ग़रीबों के क्लेश के लिए ईश्वर को कोसा भी है. अगर मैं अब उनसे माफ़ी माँगूँ तो वो कहेंगे कि इससे बड़ा डरपोक कोई नहीं है. इसका अन्त नज़दीक आ रहा है. इसलिए ये माफ़ी माँगने आया है!”

जैसे ही जेल की घड़ी ने 6 बजाये, क़ैदियों ने दूर से आती कुछ पदचापें सुनीं. उनके साथ भारी बूटों के ज़मीन पर पड़ने की आवाज़ें भी आ रही थीं. साथ में एक गाने का भी दबा स्वर सुनायी दे रहा था, “सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है…!” सभी को अचानक ज़ोर-ज़ोर से ‘इन्क़लाब ज़िन्दाबाद’ और ‘हिन्दुस्तान आज़ाद हो’ के नारे सुनायी देने लगे.

फांसी का तख़्ता पुराना था लेकिन फांसी देनेवाला काफ़ी तन्दुरुस्त. फांसी देने के लिए मसीह जल्लाद को लाहौर के पास शाहदरा से बुलवाया गया था.

भगतसिंह इन तीनों के बीच में खड़े थे. भगतसिंह अपनी माँ को दिया गया वो वचन पूरा करना चाहते थे कि वो फाँसी के तख़्ते से ‘इन्क़लाब ज़िन्दाबाद’ का नारा लगायेंगे.
लाहौर ज़िला कांग्रेस के सचिव पिंडीदास सोंधी का घर लाहौर सेन्ट्रल जेल से बिल्कुल लगा हुआ था. भगतसिंह ने इतनी ज़ोर से ‘इन्कलाब ज़िन्दाबाद’ का नारा लगाया कि उनकी आवाज़ सोंधी के घर तक सुनायी दी.

भगतसिंह की आवाज़ सुनते ही जेल के दूसरे क़ैदी भी नारे लगाने लगे.

भगतसिंह, राजगुरु, सुखदेव – तीनों युवा क्रांतिकारियों के गले में फांसी की रस्सी डाल दी गयी. उनके हाथ और पैर बाँध दिये गए. तभी जल्लाद ने पूछा, सबसे पहले कौन जायगा? सुखदेव ने सबसे पहले फांसी पर लटकने की हामी भरी. जल्लाद ने एक-एक कर रस्सी खींची, और उनके पैरों के नीचे लगे तख़्तों को पैर मार कर हटा दिया.
काफी देर तक शव तख़्तों से लटकते रहे.

अंत में शवों को नीचे उतारा गया, और वहाँ मौज़ूद डॉक्टरों – लेफ़्टिनेंट-कर्नल जेजे नेल्सन और लेफ़्टिनेंट-कर्नल एनएस सोधी – ने उन्हें – तीनों क्रान्तिकारियों को – मृत घोषित किया.

एक जेल अधिकारी पर इस फांसी का इतना असर हुआ कि जब उससे कहा गया कि वो मृतकों की पहचान करें तो उसने ऐसा करने से इनक़ार कर दिया. भावुकता दिखानेवाले – और नाफ़र्मानी करनेवाले – उन अधिकारी के साथ रिआयत नहीं बरती गयी, और उसी जगह पर उनको निलंबित कर दिया गया.

एक जूनियर अफ़सर ने फिर ये काम अंजाम दिया.

पहले योजना थी कि इन सबका अन्तिम संस्कार जेल के अन्दर ही किया जायेगा, लेकिन फिर ये विचार त्यागना पड़ा जब अधिकारियों को आभास हुआ कि जेल से धुआँ उठते देख बाहर खड़ी भीड़ जेल पर हमला कर सकती है.
आनन-फानन में जेल की पिछली दीवार तोड़ी गई.
उसी रास्ते से एक ट्रक जेल के अन्दर लाया गया. बहुत अपमानजनक तरीक़े से क्रान्तिकारियों के शवों को एक सामान की तरह ट्रक में डाल दिया गया.

पहले तय हुआ था कि उनका अन्तिम संस्कार रावी के तट पर किया जायेगा, लेकिन रावी में पानी बहुत ही कम था, इसलिए सतलुज के किनारे शवों को जलाने का फ़ैसला लिया गया. शहीदों के पार्थिव शरीर को फ़ीरोज़पुर के पास सतलुज के किनारे लाया गया. तब तक रात के 10 बज चुके थे. इस बीच उप पुलिस अधीक्षक कसूर सुदर्शनसिंह कसूर गाँव से एक पुजारी जगदीश अचरज को बुला लाये.

अभी शवों में आग लगायी ही गई थी कि लोगों को इसके बारे में पता चल गया. जैसे ही ब्रितानी सैनिकों ने लोगों को अपनी तरफ़ आते देखा, वो शवों को वहीं छोड़ कर अपने वाहनों की तरफ़ भागे. सारी रात गाँव के लोगों ने शवों के चारों ओर पहरा दिया.

अगले दिन दोपहर के आसपास ज़िला मजिस्ट्रेट के दस्तख़त के साथ लाहौर के कई इलाक़ों में नोटिस चिपकाये गए जिसमें बताया गया कि भगतसिंह, सुखदेव और राजगुरु का सतलुज के किनारे हिन्दू और सिख रीति से अन्तिम संस्कार कर दिया गया.

इस ख़बर पर लोगों की कड़ी प्रतिक्रिया आई और लोगों ने कहा कि इनका अन्तिम संस्कार करना तो दूर, उन्हें पूरी तरह जलाया भी नहीं गया. ज़िला मैजिस्ट्रेट ने इसका खंडन किया लेकिन किसी ने उस पर विश्वास नहीं किया.

भगतसिंह और उनके दोनों साथियों के सम्मान में लोग जुलूस में चलने लगे। शोक जुलूस नीला गुंबद से शुरु हुआ. देखते-देखते वह तीन मील लम्बा हो गया था।
पुरुषों ने विरोधस्वरूप अपनी बाहों पर काली पट्टियाँ बांध रखी थीं। महिलाओं ने काली साड़ियाँ पहन रखी थीं. लगभग सब लोगों के हाथ में काले झंडे थे. लाहौर के मॉल से गुज़रता हुआ जुलूस अनारकली बाज़ार के बीचोबीच रुका.

अचानक पूरी भीड़ में उस समय सन्नाटा छा गया जब घोषणा की गयी कि भगतसिंह का परिवार तीनों शहीदों के बचे हुए अवशेषों के साथ फ़ीरोज़पुर से वहाँ पहुँच गया है.
जैसे ही तीन फूलों से ढ़के ताबूतों में उनके शव वहाँ पहुंचे, भीड़ भावुक हो गयी. लोग अपने आँसू नहीं रोक पाये.
वहीं पर एक मशहूर अख़बार के सम्पादक मौलाना ज़फ़र अली ने एक नज़्म पढ़ी जिसका लब्बोलुआब था, ‘किस तरह इन शहीदों के अधजले शवों को ख़ुले आसमान के नीचे ज़मीन पर छोड़ दिया गया.’

उधर, जेल वॉर्डेन चरतसिंह सुस्त क़दमों से अपने कमरे में पहुँचे और फूट-फूट कर रोने लगे. अपने 30 साल के कॅरियर में उन्होंने सैंकड़ों फांसियाँ देखी थीं। उनकी याद में किसी ने मौत को इतनी बहादुरी से गले नहीं लगाया था जितना भगतसिंह और उनके दो कॉमरेडों ने.

किसी को इस बात का अंदाज़ा नहीं था कि 16 साल बाद उनकी शहादत भारत में ब्रिटिश साम्राज्य के अन्त का एक कारण साबित होगी और भारत की ज़मीन से सभी ब्रिटिश सैनिक हमेशा के लिए चले जायेंगे.

इंक़लाब के हौसलो को दुःखों तकलीफों दर्दो से तपाने वालें शहीद ए आज़म ने घर के माहौल से ही वतनपरस्ती इंसानियत अपनो के लिए अपनेपन का एहसास किया था।
शहीद ए आज़म के जन्म के बाद दोनों क्रांतिकारी चाचा सरदार स्वर्ण सिंह संधू तो घर आ गए इनको टीवी की बीमारी के कारण छोड़ा गया था जो घर मे आने के बाद कम उम्र में चल बसे ,सरदार अजीत सिंह संधू जिनके किस्से सुनकर शहीद ए आज़म खुद को गौरवान्वित महसूस करते थे वो रंगून(म्यामांर)जेल से ईरान,तुर्की होते हुए जर्मनी चले गए थे,वो जर्मन रेडियो से ब्रिटेन के विरुद्ध प्रचार करते थे,जो 45 वर्ष देश से दूर रहे ।

घर पर शहीद ए आज़म ने निःसन्तान चाची हुकुमकौर की सिसकियां सुनी पूरे बचपन,जो सरदार स्वर्ण सिंह की विधवा थी ,चाची हरनाम कौर रोज सरदार अजीत सिंह की खबर के लिए उनके घर वापसी के लिए तरसती थी,उनके दुःखों में नन्हा भगत उनकी गोद मे बैठकर उनको संभालने का प्रयास करता था।

नन्हा भगत अपनी चाचियों के आंसू पूछता ओर कहता आप रोना बन्द करके मेरे बड़ा होंने की दुआ करो,में बदला लूंगा अपनी चाचियों के दुखों का, भगत की बात सुनकर उसकी चाची उसको गले लगाकर आंसुओ से आंखे भर लेती थी।

बचपन से ही भगत ने अंग्रेजो के खिलाफ अपने दिल को इतना ठोस कर लिया था कि इनके आगे नही झुकना है इनको झुकाना है,भगत की जिंदगी से जुड़े तमाम किस्से बताते है कि कैसे उसकी बेखौफ शहीदी की इबारत उसके हर पल के इंक़लाब से बनी थी ।

शहीद ए आज़म के आदर्श रहे सरदार करतार सिंह सराभा (ग्रेवाल) जो ग़दर पार्टी के अध्यक्ष थे जिन्हें 1915 में अंग्रेजो ने लाहौर षड्यंत्र केस में गिरफ्तार किया और 1916 में उनको 19 वर्ष कुछ माह की उम्र में फांसी लगा दी , शहीद ए आज़म सराभा की एक फोटो हमेशा अपने साथ रखते थे,

1919 में रॉलेक्ट एक्ट के विरुद्ध जलियांवाला बाग में बैशाखी वालें दिन भारतीयों के जत्थे इकट्ठा थे जिन निहत्थों पर जनरल ओ डायर ने बारूदों गोलियों से कत्लेआम कर दिया, बताते है बाग से खून से सनी मिट्टी उठाकर न जाने पंजाब की धरती के कितने सूरमे बागी बने।

शहीद ए आज़म कभी भी अंग्रेजो के विरुद्ध हिंसात्मक होने के बाद उन्हें एहसास हुआ कि गोली से आज़ादी नही भारतीय परिवारों की बर्बादी होगी ,उन्होंने वैचारिक क्रांति के बारे में खुद को मजबूत किया,असेम्बली में खाली जगह बम विस्फोट करके खुद को पकड़वाया ओर अपनी आवाज विदेशो तक पहुचाई, जिस से भारत के लिए विदेशो में एक दयनीय भावना उत्पन्न हुई,ओर उन्होंने ब्रिटिश सरकार पर दबाब देना शुरू किया ।

शहीद ए आज़म ने जेल में रहकर वैचारिक लेख लिखे लोगो को जागरूक करने के लिए ईश्वर ,धर्म,साम्राज्यवाद के विरुद्ध समझाने का प्रयास किया। 1931 मे रूस का सोवियत सघं और सटालिन अपने चरम उतकषॆ पर थे। कमयुनिजम,  Marx, Lenin, Stalin भगत सिहं आदि के साम्राजवाद के खिलाफ लडाई मे आदषॆ थे। यह तो सोवियत सघं के पतन के बाद ही पता चला कि उनकी विचारधारा से बेहतर तो बुद्ध आदि की आधयातमिक विचारधारा ही है।

अंतिम समय मे शहीदी से एक दिन पहले माँ विद्यावती से मुलाकात के वक़्त शहीद ए आज़म के भावुक अल्फाजो ने माँ ओर नजदीक खड़े दरबानों की आंखों में आँसू झलका दिये ।

“माँ कल मेरी मिट्टी लेने तू मत आना कुलवीर को भेज देना तू रो देगी,तो सब कहेंगे भगत की माँ रो रही है ,”

सुखदेव ,राजगुरु कभी भी अंग्रेजो की प्रताड़ना से न खुद कमजोर पड़े ,न भगत के हौसलो को मुरझाने दिया,देश की फिजाओं में शहीद ए आज़म,सुखदेव,राजगुरु सांस की तरह घुल गए थे,हर आती जाती सांसों के साथ इनका जिक्र होता था।

3 of 3: अछे दिन कब आयेगें?

ये मेसेज 2019 तक संभलकर रखना और पूरा पढ़ना फिर विचार करना

दिवार पर पेशाब करता व्यक्ति पूछता है ,अच्छे दिन कब आयेंगे !

बिजली चोरी करता व्यक्ति पूछता है, अच्छे दिन कब आयेंगे

यहाँ-वहाँ कचरा फैंकता व्यक्ति पूछता है, अच्छे दिन कब आयेंगे

कामचोर सरकारी कर्मचारी पूछता है, अच्छे दिन कब आयेंगे

टेक्स चोरी करता व्यक्ति पूछता है, अच्छे दिन कब आयेंगे

देश से गद्दारी करता व्यक्ति पूछता है, अच्छे दिन कब आयेंगे

नोकरी पर देरी से व जल्दी घर दौड़ता कर्मचारी पूछता है, अच्छे_ दिन कब आयेंगे

​लड़कियों से छेड़खानी करता व्यक्ति पूछता है, अच्छे दिन कब आयेंगे​

राष्ट्रगान के समय बातें करते स्कूलों के कुछ लोग पूछते है, अच्छे दिन कब आयेंगे

स्कूल में बच्चों को न भेजने वाले लोग पूछते हैं, अच्छे दिन कब आयेंगे

कसाई जैसे कमीशनखोर डाक्टर पूछता है अच्छे दिन कब आयेंगे

सड़क पर रेड सिगनल तोड़ते लोग पूछते, अच्छे दिन कब आयेंगे

किताबों से दूर भागते विद्यार्थी पूछते हैं, अच्छे दिन कब आयेंगे

कारखानों में हराम खोरी करते लोग पूछते हैं, अच्छे दिन कब आयेंगे

यदि खुद नहीं बदल सकते
तो अच्छे दिनों की आस छोड़ दो।
क्योंकि देश आपके उपदेश से नहीं,
आचरण से बदलेगा,
तब आएंगे अच्छे दिन !
कांग्रेस देश पर 55 लाख 87 हजार 149 करोड़ का
कर्ज छोड़ के गई है !
जिसका 1 वर्ष का ब्याज भरना पड़ रहा है = 4 लाख
27 हजार करोड़ !
यानि 1 महीने का = 35 हजार 584 करोड़ !
यानि 1 दिन का = 1 हज़ार 186 करोड़ !
यानि 1 घंटे का = 49 करोड़ !
यानि 1 मिनट का 81 लाख !
यानि 1 सेकेंड का 1,35,000!
जरा सोचिए ! जब देश लूटेरी कांग्रेस की मेहरबानी से
प्रति सेकेंड 1 लाख 35 हजार रूपये का तो सिर्फ पुराने
कर्जे का ब्याज भर रहा है तो देश के अच्छे दिन
आसानी से कैसे आएंगे..???

अत: जितना सम्भव हो भारतीय प्रोडक्ट ही ख़रीदे,
देश को लूटने से बचाये, अर्थव्यस्था की मजबूती में
अपना अमूल्य योगदान देकर भारतवर्ष को फिर से
समृद्ध बनाये…!

यदि भारत के 121 करोड़ लोगों में से सिर्फ 10% लोग प्रतिदिन 10 रुपये का रस पियें तो महीने भर में होता है लगभग ” 3600 करोड़ “…!!!!

अगर आप…कोका कोला या पेप्सी पीते हैं तो ये ” 3600 करोड़ ” रुपये देश के बाहर चले जायेँगे…।

कोका कोला, पेप्सी जैसी कंपनियाँ प्रतिदिन ” 7000 करोड़ ” से ज्यादा लूट लेती हैं..।

आपसे अनुरोध है क आप… गन्ने का जूस/ नारियल पानी/ आम/ फलों के रस आदि को अपनायें और देश का ” 7000 करोड़ ” रूपये बचाकर हमारे किसानों को दें…। ” किसान आत्महत्या नहीं करेंगे..”

फलों के रस के धंधे से  ” 1 करोड़ ” लोगो को रोजगार मिलेगा और 10 रूपये के रस का गिलास 5 रूपये में ही मिलेगा…।

स्वदेशी अपनाओ,  राष्ट्र को शक्तिशाली बनाओ..।
स्वदेशी अपनाए देश बचाएे अगर सभी भारतीय 90
दिन तक कोई भी विदेशी सामान नहीं ख़रीदे…

तो भारत दुनिया का दूसरा सबसे अमीर देश बन सकता है.. सिर्फ 90 दिन में ही भारत के 2 रुपये 1 डॉलर के बराबर हो जायेंगे.. हम सबको मिल कर ये कोशिश आजमानी चाहिए क्युकी ये देश है हमारा..!!!!

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