महाराणा प्रताप, उसका घोडा और हाथी


 

विकास भदोरिया

महाराणा प्रताप के बारे में अंग्रेज इतिहासकार हैरिस लिखता है –

“यद्यपि आगरे का नया शहर बसाने में अकबर का ध्यान लग रहा था, तो भी राज्य की वह तृषा, जो कि उसकी तख्तनशीनी के शुरु के सालों में नज़र आई थी, न बुझी | हिन्दुस्तान के एक राजा का हाल सुनकर, जो कि अकलमन्दी और दिलेरी के वास्ते मशहूर था | जिसका इलाका बादशाह की राजधानी से सिर्फ बारह मंजिल के फासिले पर था, उसको बादशाह ने फौरन फ़तह करने का इरादा किया | खासकर इस वजह से कि वह इलाका उसके मौरुसी राज्य और नये फ़तह किए गए मुल्क के बीच में था | इस राजा का नाम राणा प्रताप था | राणा का खिताब उसके खानदान के सब राजाओं को हिन्दुस्तान के पुराने दस्तूर के मुवाफ़िक दिया जाता था | उसकी मदद करने वाला अगर कोई दूसरा राजा होता, तो वह अपने मुल्क चित्तौड़ की आज़ादी फिर हासिल कर लेता | तो भी उसने बड़े दरजे की कोशिश की, जो कि इस मुल्क की तवारिख में हमेशा याद रहेगी”

1540 ई.

एक ओर चित्तौडगढ़ के दुर्ग पर मेवाड़ के महाराणा उदयसिंह का पुन: अधिकार हुआ, तो दूसरी ओर इसी शुभ घड़ी में 9 मई, 1540 ई. को कुम्भलगढ़ दुर्ग के एक भाग कटारगढ़ में महारानी जयवन्ता बाई के गर्भ से कुंवर प्रताप का जन्म हुआ

(कुंवर प्रताप का एक जन्म स्थान पाली में स्थित जूनी कचहरी में भी बताया जाता है, जो कि सही नहीं है)

महारानी जयवन्ता बाई –

ये महाराणा उदयसिंह की पत्नी व मेवाड़ की पटरानी थीं | इनका नाम विवाह से पूर्व जीवन्त कंवर था | ये जालौर के अखैराज सोनगरा चौहान की पुत्री थीं | इन्होंने अपने वैवाहिक जीवन में कईं कष्ट देखे| कुंवर प्रताप की आदर्श थीं |

महाराणा उदयसिंह –

इनका जन्म 1522 ई. में हुआ | ये राणा सांगा व रानी कर्णावती के पुत्र थे | इनका आरम्भिक जीवन काफी कष्टप्रद रहा | महाराणा उदयसिंह की कुल 22 रानियां, 24 पुत्र व 17 पुत्रियां थीं |

गुरु राघवेन्द्र – ये कुंवर प्रताप व कुंवर शक्ति के गुरु थे

एक दिन जब आचार्य राघवेन्द्र कुंवर प्रताप व कुंवर शक्ति को शिक्षा दे रहे थे, तभी अचानक एक शेर दबे पाँव से कुंवर शक्ति की तरफ बढ़ा

जब कुंवर शक्ति ने मुड़कर पीछे देखा, तब तक कुंवर प्रताप शेर का काम तमाम कर चुके थे

रानी सज्जा बाई सोलंकिनी – इनके 2 पुत्र थे –

1) कुंवर शक्तिसिंह – इनका जन्म 1540 ई. में हुआ | बचपन से इनकी अपने पिता महाराणा उदयसिंह से अनबन थी | इन्हें राजगद्दी का कोई मोह नहीं था | इनके वंशज शक्तावत कहलाए |

2) वीरमदेव – इनके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं | जब महाराणा प्रताप छापामार युद्धों में व्यस्त थे, उस कठिन समय में 15 वर्षों तक वीरमदेव ने महाराणा प्रताप के परिवार की रक्षा की | इनके पास 500 सैनिक हमेशा रहते थे | वीरमदेव ने महाराणा प्रताप के परिवार के किसी भी सदस्य को आंच तक नहीं आने दी | इनको घोसुण्डा की जागीर मिली |

महाराणा प्रताप की माता व विमाताएँ –

1) महारानी जयवन्ता बाई
2) रानी सज्जाबाई सोलंकिनी
3) रानी धीरबाई भटियानी
4) रानी वीरबाई झाली
5) रानी राजबाई सोलंकिनी
6) रानी करमेती बाई राठौड़
7) रानी कंवरबाई राठौड़
8) रानी लखमदे राठौड़
9) रानी बाईजीलाल कंवर राठौड़
10) रानी लक्खाबाई
11) रानी प्यारकंवर राठौड़
12) रानी गनसुखदे बाई चौहान
13) रानी सुहागदे बाई चौहान
14) रानी वीरकंवर
15) रानी लाड़कंवर
16) रानी सैवता बाई खींचण
17) रानी किशनकंवर
18) रानी गोपालदे बाई
19) रानी जीवत कंवर
20) रानी कंवरबाई खींचण
21) रानी लच्छाकंवर
22) रानी लालकंवर पंवार

अकबर के दरबारी कवि दुरसा आढ़ा लिखते हैं :-

“माई एहड़ा पूत जण, जेहड़ा राणा प्रताप |
अकबर सूतो औंझके, जाण सिराणे सांप ||”

तनवीर सिंह सारंगदेवोत ठि. लक्ष्मणपुरा

अंग्रेज इतिहासकार स्मिथ लिखता है “वास्तव में प्रताप एेसा व्यक्तिवादी विद्रोही था, जो अकबर के महान साम्राज्य के सपने को नष्ट करने में जुटा हुआ था | वह अपने राज्य की स्वतंत्रता को अपने से चिपटाए हुए था | शाही दरबार में सम्मानपूर्ण स्थान के वादे को उसने तिरस्कारपूर्वक ठुकरा दिया था | जो दूसरे राज्यों ने किया था, उसका कोई अनुकूल प्रभाव प्रताप पर नहीं पड़ा | उसने मेवाड़ की स्वतंत्रता को अपने हृदय से लगाए रखने, जब तक बन पड़े उसकी रक्षा करने और फिर उसकी रक्षा के लिए जान देने की ठान रखी थी”

1544 ई.

गिरीसुमेल का युद्ध –

ये युद्ध अफगान बादशाह शेरशाह सूरी और मारवाड़ के राव मालदेव के बीच हुआ | मारवाड़ की पराजय हुई |

जालौर मारवाड़ का हिस्सा था, इसलिए जालौर के अखैराज सोनगरा चौहान (महाराणा प्रताप के नाना) मारवाड़ की ओर से लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए |

1551 ई.

जैसलमेर महारावल लूणकरण का देहान्त | इनके पुत्र कुंवर मालदेव हुए, जो महाराणा प्रताप के बहनोई थे |

कुंवर प्रताप 9-10 वर्ष तक कुम्भलगढ़ में रहे | फिर चित्तौड़गढ़ में पधारे |

कुंवर प्रताप ने मेड़ता के जयमल राठौड़ से तलवारबाजी सीखी

रानी धीरबाई भटियानी को कुंवर प्रताप की वीरता से ईर्ष्या हुई, तो महाराणा उदयसिंह ने अपनी प्रिय रानी की बात मानते हुए कुंवर प्रताप को तलहटी में रहने के लिए भेज दिया | इसी तरह कुंवर प्रताप का सम्पर्क भीलों से हुआ |

कुछ समय बाद महारानी जयवन्ता बाई अपने पुत्र कुंवर प्रताप के साथ दुर्ग के नीचे स्थित महल में रहने लगीं | इसी महल के पास भामाशाह भी रहते थे | कुंवर प्रताप और भामाशाह बचपन के मित्र थे |

1555 ई.
जैताणा का युद्ध
(कुंवर प्रताप का प्रथम युद्ध)

महाराणा उदयसिंह ने डूंगरपुर रावल आसकरण पर कुंवर प्रताप के नेतृत्व में सेना भेजी ये युद्ध बांसवाड़ा के आसपुर में सोम नदी के किनारे हुआ डूंगरपुर के रावल आसकरण ने राणा सांवलदास के नेतृत्व में फौज भेजी राणा सांवलदास का भाई कर्णसिंह मारा गया मेवाड़ की ओर से कोठारिया व केलवा के जग्गा जी वीरगति को प्राप्त हुए | जग्गा जी के पुत्र पत्ता चुण्डावत हुए |

मेवाड़ की विजय हुई और 15 वर्ष के कुंवर प्रताप ने वागड़ के बड़े हिस्से पर अधिकार कर मेवाड़ में मिला लिया |

ये कुंवर प्रताप के कुंवरपदे काल (राज्याभिषेक से पूर्व) की पहली उपलब्धि थी

कुंवरपदे काल (राज्याभिषेक से पूर्व) की दूसरी उपलब्धि

कुंवर प्रताप ने छप्पन के राठौड़ों को पराजित कर छप्पन (56 इलाकों के समूह) पर अधिकार कर लिया

बांसवाड़ा-प्रतापगढ़ के बीच का भाग छप्पन कहलाता है

27 जनवरी, 1556 ई.

बादशाह हूमायुं की पुस्तकालय की सीढ़ियों से गिरकर मृत्यु

1557 ई.
हरमाड़े का युद्ध

हाजी खां व राव मालदेव की सम्मिलित सेना द्वारा महाराणा उदयसिंह की मेवाड़ी सेना की पराजय

इसी वर्ष महाराणा उदयसिंह ने मीराबाई को चित्तौड़गढ़ बुलाने के लिए ब्राम्हणों को भेजा | मीराबाई सदा-सदा के लिए अपने कान्हा में विलीन हो गईं | मीराबाई कुंवर प्रताप की बड़ी माँ थीं |

केसरी सिंह बारहठ –

“पग-पग भम्या पहाड़, भम्या पग-पग भांखरा |
महाराणा अर मेवाड़, हिरदै बसिया हिन्द रै ||”

कर्नल जेम्स टॉड लिखता है “मैं उन पहाड़ियों पर चढ़ा हूँ, उन नालों को पार किया है और उन मैदानों में घूमा हूँ, जो प्रताप के गौरवमय रंगमंच में पढ़ते हैं | मैंने इनके वंशजों से पूछताछ की, तो वे कई बार इनकी गाथा सुनाते-सुनाते रो पड़ते थे”

महाराणा प्रताप की 11 रानियां व उनके 17 पुत्र –

1) महारानी अजबदे बाई –

1557 ई. में बिजौलिया के सामन्त राम रख/माम्रख पंवार की पुत्री अजबदे बाई से महाराणा प्रताप का विवाह हुआ

आगे चलकर अजबदे बाई मेवाड़ की महारानी बनीं | महाराणा प्रताप की सभी पत्नियों में उनका सबसे अधिक साथ इन्होंने ही दिया |
अजबदे बाई ने महाराणा प्रताप के लिए अपनी ज्योतिष विद्या से 100 वर्षों का पंचांग बनाया |

अजबदे बाई के गुरु मथुरा के विट्ठल राय जी थे | गोंडवाना की रानी दुर्गावती व आमेर की हीर कंवर (जोधा बाई के नाम से मशहूर) ने भी इन्हीं गुरु से शिक्षा प्राप्त की |

गुरु विट्ठल राय जी को कृष्ण भक्ति के कारण मुगल यातनाएं भी सहनीं पड़ी | गोंडवाना की रानी दुर्गावती ने इनको 108 गांव प्रदान किए |

पुत्र –
१) महाराणा अमरसिंह
२) कुंवर भगवानदास

2) रानी पुरबाई सोलंकिनी –

पुत्र –
१) कुंवर गोपाल
२) कुंवर साहसमल – ये महाराणा प्रताप के तीसरे पुत्र थे | धरियावद के रावत इन्हीं के वंशज हैं | ये धरियावद के पहले कुंवर साहब भी हैं |

3) रानी फूलबाई राठौड़ – ये मारवाड़ के राव मालदेव की पौत्री व रामसिंह की पुत्री थीं |

पुत्र –
१) कुंवर चंदा सिंह – ये महाराणा प्रताप के दूसरे पुत्र थे | इन्हें आंजणा (दरिया के पास) की जागीर दी गई |
२) कुंवर शेखासिंह – ये महाराणा प्रताप के चौथे पुत्र थे | इन्हें बहेड़ा, नाणा, बीजापुर (गोडवाड़) की जागीर दी गई|

4) रानी चम्पाबाई झाली – ये
बड़ी सादड़ी के झाला मान की बहन थीं

पुत्र –
१) कुंवर कचरा/काचरा सिंह – इन्हें गोगुन्दा तहसील में स्थित जोलावास की जागीर दी गई |
२) कुंवर सांवलदास
३) कुंवर दुर्जन सिंह

5) रानी जसोदाबाई चौहान –

पुत्र –
१) कुंवर कल्याणदास/कल्याणसिंह – इन्हें उदयपुर के निकट परसाद नामक जागीर दी गई

6) रानी शाहमती/सेमता बाई हाडा –

पुत्र –
१) कुंवर पुरणमल – ये महाराणा प्रताप के 11वें पुत्र थे | इन्हें मांगरोप, गुरलां, गाडरमाला, सींगोली की जागीर दी गई | इनके वंशज पुरावत कहलाते हैं |

7) रानी आशाबाई/आसबाई खींचण –

पुत्र –
१) कुंवर हाथी सिंह – इन्हें दांतड़ा व गेंडल्या की जागीर दी गई
२) कुंवर रामसिंह – इन्हें उडल्यावास व मानकरी की जागीर दी गई

रानी अलमदे बाई चौहान –

पुत्र –
१) कुंवर जसवन्त सिंह – इन्हें जालोद व कारुंदा की जागीर दी गई

9) रानी रत्नावती पंवार – ये महारानी अजबदे बाई की बहन थीं | महारानी अजबदे बाई की इच्छा थी कि उनकी बहन का विवाह महाराणा प्रताप से हो | ये विवाह रानी रत्नावती पंवार की इच्छा के विरुद्ध हुआ, क्योंकि वे महाराणा प्रताप के साथ जंगलों में संघर्षपूर्ण जीवन नहीं व्यतीत करना चाहती थीं |

पुत्र –
१) कुंवर माल सिंह

10) रानी अमर बाई राठौड़ –

पुत्र –
१) कुंवर नाथा सिंह

11) रानी लखा बाई राठौड़ –

पुत्र –
१) कुंवर रायभाण सिंह

  • महाराणा प्रताप की पुत्रियां –

ज्यादातर इतिहासकारों का मानना है कि महाराणा प्रताप की कोई पुत्री नहीं थी, लेकिन कुछ इतिहासकारों के अनुसार महाराणा प्रताप की ये 5 पुत्रियां थीं –

१) कुसुमावती
२) दुर्गावती
३) रखमावती
४) रामकंवर
५) सुककंवर

बावजी चतुर सिंह जी –

“दिल्ली तखत तुलावणै, कर तुरकां तुलियाह |
नमिया जै नमिया नहीं, अणनमिया नमियाह ||”

तनवीर सिंह सारंगदेवोत ठि. लक्ष्मणपुरा —

एक अंग्रेज इतिहासकार लिखता है “जिस शान के साथ दिल्ली का बादशाह अपने बड़े से तख्त पर बैठकर हिन्दुस्तान पर हुकूमत करता था, ठीक उसी शान के साथ मेवाड़ का राणा कीका जंगलों में पत्थर पर बैठकर उसी हुकूमत का विरोध करता था”

1556-57 ई.

अकबर की पानीपत, जैतारण, अजमेर व नागौर विजय

1558 ई.

बेदला के प्रतापसिंह चौहान (महाराणा प्रताप के ससुर) का देहान्त

इनके पुत्र बलभद्र सिंह चौहान बेदला के शासक बने | इन्होंने आगे चलकर महाराणा प्रताप का छापामार युद्धों में साथ दिया |

1559 ई.

अकबर की ग्वालियर विजय

ग्वालियर के राजा रामशाह तंवर का चित्तौड़ आगमन

राजा रामशाह तंवर के पुत्र शालिवाहन तंवर कुंवर प्रताप के बहनोई थे

इसी वर्ष 16 मार्च को मचीन्द (राजसमन्द) में महाराणा प्रताप व महारानी अजबदे बाई के पुत्र कुंवर अमरसिंह का जन्म हुआ

1560 ई.

तिलवाड़ा का युद्ध –

अकबर ने मुनीम खां को भेजकर बैरम खान को पराजित किया

1561 ई.

एक अफगान मुबारक खां द्वारा बैरम खान का कत्ल

इसी वर्ष अकबर ने गागरोन दुर्ग पर कब्जा किया

इसी वर्ष अकबर ने आदम खान को मालवा भेजकर बाज बहादुर पर फतह हासिल की

1562 ई.

अकबर की मेड़ता विजय

मेड़ता के वीर जयमल राठौड़ का चित्तौड़ आगमन

इसी वर्ष राव मालदेव का देहान्त हुआ | उनके पुत्र राव चन्द्रसेन मारवाड़ की राजगद्दी पर बैठे | राव चन्द्रसेन महाराणा प्रताप के बहनोई थे |

1563 ई.

महाराणा उदयसिंह की भोमट के राठौड़ों पर विजय इस युद्ध में कुंवर प्रताप भी लड़े, लेकिन नेतृत्व महाराणा उदयसिंह ने किया

1564 ई.

“अकबर की गोंडवाना विजय”

अकबर ने आसफ खां को 10000 की फौज समेत भेजा

गोंडवाना की रानी दुर्गावती के अथक प्रयासों के बावजूद उन्हें पराजय मिली

किले में जौहर हुआ, रानी दुर्गावती की 2 रिश्तेदार महिलाओं ने जौहर नहीं किया, इन दोनों को शाही हरम में भेजा गया

इस विजय से मुगलों को 1000 हाथी मिले, पर आसफ खां ने धोखाधड़ी करते हुए सिर्फ 200 हाथी ही अकबर को नज़र किए

(इसी आसफ खां ने हल्दीघाटी युद्ध का नेतृत्व किया)

इसी वर्ष अकबर ने पूरे हिन्दुस्तान में जजिया कर माफ किया

अक्टूबर 1567 ई. – फरवरी, 1568 ई.

चित्तौड़ का तीसरा साका हुआ

1569 ई.

अकबर की रणथम्भौर विजय

इसी वर्ष अकबर ने कालिंजर दुर्ग भी फतह किया

इसी वर्ष अकबर व हीर कंवर के पुत्र सलीम का जन्म हुआ, जो आगे चलकर जहांगीर के नाम से मशहूर हुआ

1570 ई.

महाराणा उदयसिंह कुम्भलगढ़ पधारे व फिर से सैनिकों की नई भर्ती प्रारम्भ की

कुम्भलगढ़ से वे फिर गोगुन्दा पधारे जहां वे बीमार रहने लगे

“अकबर का नागौर दरबार”

इसी वर्ष नवम्बर-दिसम्बर में अकबर ने नागौर दरबार रखा, जहां राजपूताने के कई शासक उपस्थित हुए, पर महाराणा उदयसिंह ने इसमें भाग नहीं लिया

इस दरबार में जितने भी शासक थे, सभी ने बादशाही मातहती कुबूल की, पर मारवाड़ के राव चन्द्रसेन भरे दरबार से उठकर चले गए और जंगलों में प्रवेश किया |

नागौर में मालवा के बाज बहादुर ने अकबर के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया

अकबर का दरबारी कवि दुरसा आढ़ा –

“अकबर कीना याद, हिन्दु नृप हाजर हुवा |
मेदपाट मरजाद, पग लागो न प्रतापसी ||”

तनवीर सिंह सारंगदेवोत ठि. लक्ष्मणपुरा

कर्नल जेम्स टॉड लिखता है “मेवाड़ का एेसा कोई स्थान नहीं है, जहां महाराणा प्रताप और उनके वीर साथियों ने बहादुरी न दिखाई हो”

महाराणा प्रताप व उनके भाई –

1) महाराणा प्रताप
2) कुंवर शक्तिसिंह
3) कुंवर वीरमदेव/विक्रम
4) कुंवर जगमाल
5) कुंवर सागरसिंह
6) कुंवर अगर
7) कुंवर पच्चन
8) कुंवर सिम्हा
9) कुंवर मानसिंह
10) कुंवर कान्हा
11) कुंवर कल्याणमल
12) कुंवर लूणकरण सिंह
13) कुंवर शार्दुल सिंह
14) कुंवर सुल्तान सिंह
15) कुंवर महेशदास
16) कुंवर चन्दासिंह
17) कुंवर रुद्रसिंह
18) कुंवर खानसिंह
19) कुंवर नगजसिंह
20) कुंवर साहेब खान
21) कुंवर भवसिंह
22) कुंवर बेरिसाल
23) कुंवर जैतसिंह
24) कुंवर रायसिंह

“गोडवाड़ का युद्ध”

गोडवाड़ मारवाड़ का इलाका था

गोडवाड़ में मुगल सेना के पड़ाव की खबर कुंवर प्रताप को मिली, तो कुंवर प्रताप ने बीमार अवस्था में लेटे हुए महाराणा उदयसिंह से ये कहते हुए फौज की मांग की कि “चित्तौड़ के विध्वंस का भारी मूल्य चुकाना होगा तुर्कों को, सो हमको हुजूर (दाजीराज) से फौज मिल जावे तो बेहतर रहेगा”

कुंवर प्रताप के नेतृत्व में मेवाड़ी सेना ने मुगल सेना को पराजित किया

कुंवर प्रताप ने चित्तौड़ के नरसंहार के प्रतिशोध स्वरुप मुगलों के डेरे उखाड़ते हुए गोड़वाड़ को लूट लिया व कुछ समय बाद गोड़वाड़ को मेवाड़ में मिला लिया

कुंवर प्रताप व रानी फूल बाई राठौड़ के पुत्र शैखासिंह को गोड़वाड़ की जागीर दी गई

“महाराणा प्रताप व अकबर की शत्रुता”

चित्तौड़ के विध्वंस में कुंवर प्रताप के लगभग 1700 रिश्तेदारों ने अपने प्राणों की आहुति दी थी | गोडवाड़ के युद्ध से महाराणा प्रताप व मुगल सल्तनत के मध्य एक एेसे संघर्ष का आरम्भ हुआ, जो जीवनपर्यन्त चला |

ये संघर्ष महज एक या दो युद्धों तक सीमित नहीं था

5000 राजपूतों, 1000 वीरांगनाओं, 1000 अफगान, 30000 की प्रजा व महाराणा प्रताप के 1700 रिश्तेदारों का नरसंहार भूलाने वाला नहीं था

जहां अकबर का मकसद महाराणा प्रताप को झुकाना, अपने विशाल साम्राज्य में से मेवाड़ की स्वतंत्रता छीनना था, वहीं महाराणा प्रताप का मकसद चित्तौड़ नरसंहार का प्रतिशोध, अपने स्वाभिमान को जीवित रखना व मेवाड़ को स्वाधीन रखना था

किसी एक युद्ध से इस संघर्ष का परिणाम नहीं निकलने वाला था, नतीजतन सिवाय दिवेर के युद्ध के यहां कोई भी निर्णायक युद्ध नहीं हुआ

1567 से 1597 ई. तक के 30 वर्षों में महाराणा प्रताप अधिकतर जंगलों में व छोटे-छोटे महलों में रहे व बड़े दुर्गों में रहने से परहेज किया

1571 ई.

अकबर ने आमेर के राजा भारमल को महाराणा उदयसिंह के पास सन्धि प्रस्ताव लेकर भेजा, पर महाराणा उदयसिंह ने इसे अस्वीकार किया

इसी वर्ष अकबर ने आगरा के स्थान पर फतेहपुर सीकरी को अपनी राजधानी बनाई

मारवाड़ के महाराजा मानसिंह जी महाराणा प्रताप की प्रशंसा में ये दोहा लिखते हैं –

“गिरपुर देस गमाड़, भमिया पग-पग भाखरां |
मह अंजसै मेवाड़, सह अंजसै सिसोदिया ||”

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डरपोक अकबर ने 7 फ़ीट 8 इंची बहलोल खान को भेजा था महाराणा प्रताप का सर लाने। कभी नहीं हारा था बहलोल खान। मुगलिया अकबर का सबसे खतरनाक सेना नायक था बहलोल खां। कहा जाता है कि उसका हाथी जैसा बदन था और ताक़त का जोर इतना कि नसें फटने को होती थीं । ज़ालिम इतना कि तीन दिन के बालक को भी गला रेत-रेत के मार देता था बशर्ते वो काफिर हिन्दू का हो। एक भी लड़ाई कभी हारा नहीं था अपने पूरे करियर में ये बहलोल खां। 7 फुट 8 इंच की हाइट से, कहा जाता है कि, घोडा उसने सामने छोटा लगता था। अकबर को बहलोल खां पर खूब नाज था।

फिर हल्दीघाटी का युद्ध हुआ, अकबर और महाराणा प्रताप की सेनाएं आमने सामने थी, अकबर महाराणा प्रताप से बहुत डरता था इसलिए वो खुद इस युद्ध से दूर रहा। उसने अब इसी बहलोल खां को अकबर ने भिड़ा दिया महाराणा प्रताप से। लड़ाई पूरे जोर पर थी और ताक़त का पहाड़ बने बहलोल खां का आमना-सामना हो गया अपने प्रताप से। अफीम के ख़ुमार में डूबी हुई सुर्ख नशेड़ी आँखों से भगवा अग्नि की लपट सी प्रदीप्त रण के मद में डूबी आँखें टकराईं और जबरदस्त भिडंत शुरू हो गई। कुछ देर तक तो राणा यूँ ही मज़ाक सा खेलते रहे मुगलिया बिलाव के साथ और फिर गुस्से में आ के अपनी तलवार से एक ही वार में घोड़े सहित हाथी सरीखे उस नर का पूरा धड़ बिलकुल सीधी लकीर में चीर दिया। ऐसा फाड़ा कि बहलोल खां का आधा शरीर इस तरफ और आधा उस तरफ गिरा। ऐसे-ऐसे युद्ध-रत्न उगले हैं सदियों से भगवा चुनरी ओढ़े रण में तांडव रचने वाली मां भारती ने!

तुलाराम राजक

महाराणा प्रताप के बारे में कुछ रोचक जानकारी यह है:-
1. महाराणा प्रताप एक ही झटके में घोड़े समेत दुश्मन सैनिक को काट डालते थे।

2. जब इब्राहिम लिंकन भारत दौरे पर आ रहे थे । तब उन्होने अपनी माँ से पूछा कि- हिंदुस्तान से आपके लिए क्या लेकर आए ? तब माँ का जवाब मिला- ”उस महान देश की वीर भूमि हल्दी घाटी से एक मुट्ठी धूल लेकर आना, जहाँ का राजा अपनी प्रजा के प्रति इतना वफ़ादार था कि उसने आधे हिंदुस्तान के बदले अपनी मातृभूमि को चुना ।” लेकिन बदकिस्मती से उनका वो दौरा रद्द हो गया था | “बुक ऑफ़ प्रेसिडेंट यु एस ए” किताब में आप यह बात पढ़ सकते हैं |

3. महाराणा प्रताप के भाले का वजन 80 किलोग्राम था और कवच का वजन भी 80 किलोग्राम ही था|
कवच, भाला, ढाल, और हाथ में तलवार का वजन मिलाएं तो कुल वजन 207 किलो था।

4. आज भी महाराणा प्रताप की तलवार कवच आदि सामान उदयपुर राज घराने के संग्रहालय में सुरक्षित हैं |

5. अकबर ने कहा था कि अगर राणा प्रताप मेरे सामने झुकते है, तो आधा हिंदुस्तान के वारिस वो होंगे, पर बादशाहत अकबर की ही रहेगी|लेकिन महाराणा प्रताप ने किसी की भी अधीनता स्वीकार करने से मना कर दिया |

6. हल्दी घाटी की लड़ाई में मेवाड़ से 20000 सैनिक थे और अकबर की ओर से 85000 सैनिक युद्ध में सम्मिलित हुए |

7. महाराणा प्रताप के घोड़े चेतक का मंदिर भी बना हुआ है, जो आज भी हल्दी घाटी में सुरक्षित है |

8. महाराणा प्रताप ने जब महलों का त्याग किया तब उनके साथ लुहार जाति के हजारो लोगों ने भी घर छोड़ा और दिन रात राणा कि फौज के लिए तलवारें बनाईं | इसी समाज को आज गुजरात मध्यप्रदेश और राजस्थान में गाढ़िया लोहार कहा जाता है|ऐसे लोगो को सभी भारतीयों का नमन!

9. हल्दी घाटी के युद्ध के 300 साल बाद भी वहाँ जमीनों में तलवारें पाई गई। आखिरी बार तलवारों का जखीरा 1985 में हल्दी घाटी में मिला था |

10. महाराणा प्रताप को शस्त्रास्त्र की शिक्षा “श्री जैमल मेड़तिया जी” ने दी थी, जो 8000 राजपूत वीरों को लेकर 60000 मुसलमानों से लड़े थे। उस युद्ध में 48000 मारे गए थे । जिनमे 8000 राजपूत और 40000 मुग़ल थे |

11. महाराणा के देहांत पर अकबर भी रो पड़ा था |

12. मेवाड़ के आदिवासी भील समाज ने हल्दी घाटी में
अकबर की फौज को अपने तीरो से रौंद डाला था । वो महाराणा प्रताप को अपना बेटा मानते थे और राणा बिना भेदभाव के उन के साथ रहते थे । आज भी मेवाड़ के राजचिन्ह पर एक तरफ राजपूत हैं, तो दूसरी तरफ भील |

13. महाराणा प्रताप का घोड़ा चेतक महाराणा को 26 फीट का दरिया पार करने के बाद वीर गति को प्राप्त हुआ | उसकी एक टांग टूटने के बाद भी वह दरिया पार कर गया। जहाँ वो घायल हुआ वहां आज खोड़ी इमली नाम का पेड़ है, जहाँ पर चेतक की मृत्यु हुई वहाँ चेतक मंदिर है |

14. राणा का घोड़ा चेतक भी बहुत ताकतवर था उसके मुँह के आगे दुश्मन के हाथियों को भ्रमित करने के लिए हाथी की सूंड लगाई जाती थी । यह हेतक और चेतक नाम के दो घोड़े थे|

15. मरने से पहले महाराणा प्रताप ने अपना खोया हुआ 85 % मेवाड फिर से जीत लिया था । सोने चांदी और महलो को छोड़कर वो 20 साल मेवाड़ के जंगलो में घूमे ।

16. महाराणा प्रताप का वजन 110 किलो और लम्बाई 7’5” थी, दो म्यान वाली तलवार और 80 किलो का भाला रखते थे हाथ में।

17. महाराणा प्रताप के हाथी की कहानी: आप सब ने महाराणा प्रताप के घोड़े चेतक के बारे में तो सुना ही होगा, लेकिन उनका एक हाथी भी था। जिसका नाम था रामप्रसाद। रामप्रसाद हाथी का उल्लेख अल- बदायुनी, जो मुगलों की ओर से हल्दीघाटी के युद्ध में लड़ा था ने अपने एक ग्रन्थ में किया है। वो लिखता है की- जब महाराणा प्रताप पर अकबर ने चढाई की थी, तब उसने दो चीजो को ही बंदी बनाने की मांग की थी । एक तो खुद महाराणा और दूसरा उनका हाथी रामप्रसाद।

18. आगे अल बदायुनी लिखता है की- वो हाथी इतना समझदार व ताकतवर था की उसने हल्दीघाटी के युद्ध में अकेले ही अकबर के 13 हाथियों को मार गिराया था । वो आगे लिखता है कि- उस हाथी को पकड़ने के लिए हमने 7 बड़े हाथियों का एक चक्रव्यूह बनाया और उन पर 14 महावतो को बिठाया, तब कहीं जाकर उसे बंदी बना पाये।

19. अब सुनिए एक भारतीय जानवर की स्वामी भक्ति।उस हाथी को अकबर के समक्ष पेश किया गया । जहाँ
अकबर ने उसका नाम पीरप्रसाद रखा।

20. रामप्रसाद को मुगलों ने गन्ने और पानी दिया। पर उस स्वामिभक्त हाथी ने 18 दिन तक मुगलों का न तो दाना खाया और न ही पानी पिया और वो शहीद हो गया। तब अकबर ने कहा था कि- जिसके हाथी को मैं अपने सामने नहीं झुका पाया, उस महाराणा प्रताप को क्या झुका पाउँगा?

इसलिए भारतीय इतिहास और अपने भारतीय होने पर गर्व करो।

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