जम्मू कश्मीर बैंक का कालाधंधा और उस पर छापेमारी


रंजीत सिंह

जम्मू कश्मीर बैंक पर छापेमारी हो रही है, उसके चेयरमैन परवेज अहमद को बर्खास्त कर दिया गया है और बैंक के दस्तावेजों की जांच जारी है। ऐसा क्यों किया गया है, आऔ हम इसके बारे मे जानकारी हासिल करें।

मोदी सरकार का कार्यकाल आरंभ होते ही, उसके गृहमंत्री अमित शाह ने देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ सफाई अभियान चालू कर दिया है। सबसे पहले अमित शाह की दृष्टि पड़ी है जम्मू-कश्मीर में फैले भ्रष्टाचार, आतंकियों की फंडिंग करने वौर हवाला करोबार का केंद्र बिंदु बन चुके जम्मू कश्मीर बैंक और उसके अधिकारियों पर। उस पर अब कड़ी कार्रवाई शुरू हो चुकी है।

आज एक ओर जहां  जम्मू कश्मीर बैंक के चेयरमैन और बोर्ड डायरेक्टर परवेज़ अहमद को पद से हटाकर आर के छिब्बर को नया चेयरमैन और बोर्ड डायरेक्टर नियुक्त कर दिया गया है, वही दूसरी ओर परवेज़ को पद से हटाए जाने के ठीक बाद एंटी करप्शन ब्यूरो ने  जम्मू कश्मीर बैंक के हेडक्वार्टर पर छापेमारी शुरू की है।

परवेज अहमद को हटाने के ठीक बाद स्टेट विजिलेंस टीम ने जम्मू कश्मीर बैंक के श्रीनगर स्थित हेडक्वार्टर पर छापेमारी शुरू की, जो अभी भी जारी है। इस समय बैंक के दस्तावेजों रिकार्ड्स की गहन छानबीन की जा रही है। इसके अतिरिक्त भ्रष्टाचार और भर्तियों में धाँधली के आरोप में पूर्व चेयरमैन परवेज़ अहमद को गिरफ्तार भी किया जा सकता है।

नवनियुक्त जम्मू कश्मीर बैंक के चेयरमैन आर के छिब्बर 1947 के बाद जम्मू एंड कश्मीर बैंक के पहले गैर कश्मीरी गैर मुस्लिम चेयरमैन हैं। आज हुई इस अप्रत्याशित कार्यवाही का उद्देश्य जम्मू कश्मीर बैंक में गहरी जड़ें जमा कर बैठे अलगाववादी समर्थकों के वर्चस्व को तोड़ना भी है।

जम्मू एंड कश्मीर बैंक और उसके वरिष्ठ अधिकारियों पर हवाला ट्रांजैक्शन, जेहादी आतंकवादियों की सहायता करने, कश्मीर में आतंकवाद फैलाने में सहयोग करने, कर्मचारियों की भर्ती में धांधली करने जैसे कई गम्भीर आरोप हैं। परंतु आज तक, कभी भी, किसी भी सरकार के शासन में इन आरोपों पर कोई जांच नहीं हुई थी।

वर्ष 2018 में इस बैंक में क्लर्क भर्ती में कश्मीर घाटी के शांतिदूत अभ्यर्थियों को, जम्मू क्षेत्र के हिन्दू अभ्यर्थियों के मुकाबले कम अंक आने के बावजूद प्राथमिकता दी गई थी, जिसके उपरांत जब जम्मू के अभ्यर्थियों ने विरोध किया वौर प्रश्न खड़े किये तो मामले को दबाने हेतु परीक्षा पास न करने वाले कश्मीरी शांतिदूत अभ्यर्थियों को निकाले बिना, जम्मू के अभ्यर्थियों को भर्ती कर लिया गया।

जम्मू कश्मीर बैंक में घाटी के अलगाववादी समर्थकों का पूरी तरह आधिपत्य है। कहने को तो जम्मू कश्मीर बैंक एक सार्वजनिक बैंक है, परंतु बैंक में चल रहे गोरखधंधे वौर काले कारनामे बाहर ना जाएं इसीलिए बैंक को आरटीआई के दायरे तक से बाहर रखा गया है।सार्वजनिक क्षेत्र का बैंक होने के कारण यह निरंतर सरकार से वित्तीय सहायता तो लेता रहा है परंतु पारदर्शिता व् उत्तरदायित्व के मामले मे यह कभी भी सरकार के प्रति जवाबदेह नहीं रहा है।

जम्मू कश्मीर बैंक द्वारा KYC (नो योर कस्टमर) के नियमों को फॉलो नहीं करने के कारण RBI द्वारा इनपर ₹3 करोड़ का फाइन भी लगाया जा चुका है। इसके अतिरिक्त इस बैंक के NPA (नॉन-परफॉर्मिंग एसेट्स) भी सुरसा के मुंह समान निरंतर बढ़ते ही जा रहे हैं।

इस बैंक के इतिहास और स्थापना की बात करें तो 1938 में महाराजा हरि सिंह ने इसे स्थापित किया था। जम्मू कश्मीर का भारत में विलय होने के पश्चात यह राज्य सरकार के अधीन आ गया और उसके बाद से ही यह अलगाववादी समर्थकों, हवाला करोबार, भर्तियों में धाँधली व् पैसों के अवैध लेन-देन का अड्डा बन गया, जिसमें तबसे लेकर आजतक कश्मीर घाटी के अलगाववादी समर्थकों का ही कब्जा रहा।

आपको यह जानकर अचरज होगा कि पिछले वर्ष जब इस बैंक के 80 वर्ष पूरे होने का उत्सव मनाया गया तो उस पूरे कार्यक्रम में कहीं भी बैंक के संस्थापक महाराजा हरि सिंह की तस्वीर और उनके नाम का नामोनिशान तक नहीं था।स्थिति यह है कि बैंक की अधिकारिक वेबसाइट पर भी बैंक के संस्थापक का कहीं कोई उल्लेख नहीं है।

परंतु आज हुई इस कार्यवाही से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि आने वाले समय में इस प्रकार के गोरखधंधों में लिप्त संस्थानों पर मोदी नीत भारत की सरकार कठोर कर्यवाही कर देश विरोधियों के हौसले, उनके एजेंडे और उनकी कमर तोड़ने का काम पूरे समर्पण व् लगन के साथ करने का मन बनाकर बैठी है। एक कहावत है “देर आयद, दुरूश्त इयद” यानि “भले ही काम देर से हुआ, पर सही हुआ”।

2 Comments (+add yours?)

  1. IPC
    Jun 12, 2019 @ 21:58:23

    सही सुझाव ! धन्वाद

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  2. Vishva Pratap Garg
    Jun 12, 2019 @ 12:59:29

    श्रीमान रंजीत सिंह जी,

    एकदम असाधारण खबर और आपकी उम्दा पत्रकारिता का एक और बढिया पोस्ट।

    किन्तु आपका ध्यान इस ओर भी आकर्षित करना चाहता हूं कि “गोरखधंधा” शब्द एक निम्न कोटि की संज्ञा है जो अवैध /भ्रष्ट व अनैतिक कार्यों के संदर्भ में प्रयोग की गई है।

    सर, अनन्त कोटि ब्रह्मांड नायक एक शिवलिंग स्वरुप महायोगी भगवान शिव गुरु स्वरूप में “गुरू गोरखनाथ “कहलाए जाते हैं। “गोरख” जिनका अर्थ है “गौमाता” के रक्षक। हिन्दू पुराणों में “गौ” में 33 कोटि देवि देवताओं का निवास माना गया है। जिसका एक अर्थ यह भी हुआ सदाशिव भगवान शिव का वह स्वरूप जिसमें वह न केवल सभी देवि देवताओं के पूज्यनीय गुरु हैं अपितु उनका पालन पोषण व संरक्षण भगवान शिव की प्राण उर्जा से ही हो रहा है। भगवान शिव को चाहें आप देवों के देव “महादेव” के रूप में पूजे या भक्त वत्सल “भोलेनाथ” के रूप में या फिर महायोगी भगवान शिव के गुरू स्वरूप “गुरू गोरखनाथ” के रूप में। वह तो हर रूप में शिव ही हैं और शिव ही रहेंगे जो सदैव भक्तजनों का कल्याण ही करते हैं कोई धंधा नहीं। ऐसे शब्दों के प्रयोग से भगवान शिव की गरिमा का हनन तो होता ही है साथ ही लोगों की धार्मिक भावनाओं को ठेस भी पहुंचती है।

    अगर आप इस अवांछित शब्द के स्थान पर किसी बेहतर संज्ञा जैसे काला धंधा /अवैध धंधा/ अनैतिक धंधा / भ्रष्ट आचरण /भंवरजाल /मकड़जाल /ठगी/420/ घपला इत्यादि जैसे शब्दों का प्रयोग करें तो आपकी ज्वलंत पत्रकारिता उम्दा ही प्रतीत होगी।

    अलख निरंजन!

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