विज्ञान की रोशनी में विभिन्न धर्मो की स्तिथी


इस धरती पर अधिकांश लोग बुद्धि का इस्तेमाल करते हैं। फिर भी कुछ लोग ऐसे हैं जो अपनी बुद्धि का इस्तेमाल नहीं करना चाहते, खास तौर पर गंभीर मामलों में। वे अपनी रोज मर्रा की जिंदगी में – फायदे और नुक्सान के मामलों में – तो बुद्धि का इस्तेमाल करते हैं पर गंभीर मामलों में अपनी बुद्धि के इस्तेमाल करने में दूर दूर तक वास्ता नहीं रखते। जो बुद्धी का इस्तेमाल नही करना चाहते उन्हें इससे आगे पढने की जरूरत नही है और जो बुद्धि से तनिक भी वास्ता रखते हैं, वे आगे पढें।

जो लोग बुद्धिमान हैं और जिन्होंने अपना जीवन इस खोज में लगाया है कि इस दुनिया का रहस्य क्या है वे इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि इस दुनिया को चलाने वाला कोई तो है।  वे सभी मानते हैं कि इस ब्रह्माण्ड में सब कुछ इतने सुनियोजित ढंग से चल रहा है कि कोई बहुत बड़ी ताकत तो है जो इसे चला रही है। और वह ताकत सोचती – समझती है यानि जिन्दा है, वह सचेतन है, वह सब कुछ जानती है और सब कुछ समझती है। वह ताकत सर्व शक्तिमान भी है, वह हम इंसानों से कहीं अधिक जानने वाली और ताकतवर है। उसे इस दुनिया के सभी समझदार लोग भगवान कहते हैं, गॉड कहते है, अल्लाह कहते हैं।  उस सर्व शक्तीमान ताकत के अलग अलग धर्मों में,  अलग अलग भाषाओँ में, देशों में अलग अलग नाम हैं। पर इस बात पर सब एकमत हैं कि वह ताकत सर्व शक्तिमान है।  कुछ धर्म – जैसे कि बौद्ध धर्म – भगवान को इस रूप में नहीं मानते पर वे भी मानते है कि यह दुनिया एक नियम में बंध कर चल रही है; जब महात्मा बुद्ध से यह पूछा गया कि क्या भगवान् हैं तो वह मौन हो गए; जब पूछा कि क्या भगवान नहीं हैं तो भी वे मौन रहे। उनका यह आचरण यही बताता है कि इस सवाल का जवाब बहुत गम्भीर है, इन्सान की समझ से परे है, आम इन्सान को इस पचडे मे नही पडना चाहिये। आम आदमी तो केवल इतना भर समझ लें कि यह स॔सार नियमो से बन्धा है, नियमो सै चल रहा है।  इस संसार का नियम बद्ध होना ही एक सर्व शक्तिमान ताकत – या सर्व शक्तिमान नियम –  को मानना है। उस रहस्य को जानना ही बोध्तव (Enlightenment) को प्राप्त करना है या भगवान को प्राप्त करना है। कुछ लोग – नास्तिक लोग – सर्व शक्तिमान ताकत का वजूद नहीं मानते, वे भी मानते हैं कि स॔सार नियमो से बन्धा है। पर उसकी संख्या दुनिया में कम ही है।

एक तरफ एक भगवान् हैं जोकि सर्व शक्तिमान हैं और दूसरी तरफ इंसान हैं। लेकिन इंसान भगवान को नहीं जानते। उसे कैसे जाना जाये ?

इस बारे में दो तरह के मत हैं – दो तरह के विचार हैं।

एक मत कहता है कि अगर भगवान् है तो उसे जाना भी जा सकता है, उसे कोई भी इंसान जान सकता है, जानने का रास्ता चाहे कैसा भी हो, कोई भी हो। दूसरा मत कहता है कि उसे – यानि भगवान को – कोई भी नहीं जान सकता, चाहे कोई कुछ भी करे। इन्सानों की इस परेशानी को हल करने के लिये भगवान अपने एक “प्रतिनिधी” की चुनता है और उसके द्वारा अपना “पैगाम” भेजता है। वह भगवान एक इंसान को चुनता है यह बताने के लिए कि वह क्या है। वह भगवान केवल उसी एक इंसान को बताता है कि वह क्या है, कैसा है, क्या चाहता है, क्या कहता है, वगैरा। यह कुछ ऐसा ही है, जैसे भगवान ने अपना एक “प्रतिनिधि” नियुक्त कर दिया हो, जो भगवान के स्थान पर खुद ही इन्सानों से बात करने का अधिकार रखता हो।  वह भगवान  क्या कहता है, क्या चाहता है, केवल उसके उस प्रतिनिधि की ही बात मानी जाएगी। उसी एक इंसान का नाम पैगम्बर है। ईसाई और मुस्लिम धर्म के अपने अपने पैगम्बर हैं।

एक मामूली सी भी बुद्धी रखने वाले इन्सान को इस मत को सही स्वीकार करने में दो बडी दिक्कतें हैं।

पहली समस्या:

भगवान का “एकमात्र प्रतिनिधी” बनने  का पूरा मामला केवल उस प्रतिनिधी और भगवान के बीच का है। संसार के बाकि इंसानो के लिये यह गुप्त है। वे प्रतिनिधी के इस दावे की सच्चाई नही जान सकते। वे भगवान से नही मिल सकते और पूछ सकते कि क्या उस प्रतिनिधी का दावा सही है। यदि कोई झूठे ही ऐसा दावा कर दे तो उसकी सच्चाई कैसे परखी जाये? आखिर इन्सान झूठ भी तो बोल देते हैं। इसक क्या ईलाज है? फिर, बात यहीं खतम नही हो जाती। यदि वह “प्रतिनिधि” यह दावा करने लगे कि क्योंकि वह जो कह रहा है वह उसके शब्द नहीं हैं बल्कि खुद भगवान ही उसके मुख से बोल रहे हैं तो सच्चाई पता करना और भी मुश्किल हो जाता है।  यदि वह “प्रतिनिधि” उससे भी आगे बढ़ कर यह कहने लगे कि उसके मुख से जो भगवान कह रहा है उसे यदि स्वीकार नही जाएगा – उस पर अविश्वास किया जाएगा – तो यह भयंकर अपराध होगा और उस अपराधी को मार दिया जाएगा – और ऐसा वह नहीं कह रहा बल्कि भगवान ही कह रहें हैं – तो उस दावे की सच्चाई पता करने के सभी रास्ते बंद हो जाते हैं। एक तरफ सर्व शक्तिमान भगवान है और दूसरी तरफ इंसान हैं, जो उस भगवान् को नहीं जानते और – दावा किया जाता है – ना ही वे (इंसान) उस भगवान् को जान सकते हैं। बीच में एक “प्रतिनिधि” आ जाता है और कहता है कि वह भगवान् को जानता है और इंसानों को बताएगा कि वह भगवान् कैसा है और क्या कहता है। यह सब एक तरह से इस दुनिया में ऐसा रास्ता खोल देता है जहाँ कोई भी व्यक्ति ताकत के बल पर ऐसा दावा कर सकता है और दुनिया में मार काट मचा सकता है। ऐसे में वे सभी लोग – सामान्य इंसान – जिनके पास बुद्धि है और समझ बूझ है बेबस हो जायेंगे और उनके पास कोई तरीका नहीं बचेगा कि वे इस तरह के दावों की सच्चाई जान सकें।

दूसरी समस्या:

यदि भगवान् का स्वयं “प्रतिनिधि ” होने का दावा करने वाले दो अलग – अलग लोग खड़े हो जाएँ और उन दोनों की बातें आपस में मेल ना खाती हों – एक दूसरे के उलट हों – तो किस की बात सही मानी जाए? एक सामान्य आदमी तो यही समझेगा कि पहला “प्रतिनिधि” दूसरे “प्रतिनिधि ” को झूठा बता रहा है और दूसरा “प्रतिनिधि” पहले “प्रतिनिधि” को झूठा बता रहा है। कम से कम, एक सामान्य आदमी यह तो कहेगा ही कि दोनों “प्रतिनिधीयो” में से एक तो अवश्य ही झूठा है। फिर यह कैसे पता चले कि दोनों में से कौन सा झूठ बोल रहा है? पैगम्बरवाद के दावों के अनुसार (कि उसकी कही गयी बातों पर अविश्वास नही किया जा सकता) तो यह बंदूकों से लड़ कर ही तय होगा कि किसका दावा सही है। इस तरह की बातें और दावे इंसानों को गुमराह करने और आपस में मार काट मचाने का काम नहीं तो और क्या हैं ? पैगम्बरवाद के इस तरह के दावो के कारण ही इस धरती पर पिछले २००० सालों से मार काट मची है और खून खराबा होता आया है।

तो क्या सर्व शक्तिमान भगवान् नहीं है? बहुत ही समझदार – बुद्धीमान – लोग और सामान्य बुद्धी (common sense)  रखने वाले लोग सभी इस नतीजे पर पहुंचते हैं कि कोई तो ताकत है जो इस ब्रहमान्ड को नियमो मे बान्ध कर चला रही है।

इस बारे में सनातन धर्म का द्रष्टिकोण आम आदमी की समझ मे आने वाला और कही अधिक तर्क संगत है।

बुद्धिमान और सामान्य बुद्धि वाले  लोग इसी नतीजे पर पहुँचते हैं कि कोई सर्व शक्तिमान ताकत तो जरूर है, जो इस ब्रह्माण्ड को कायदे से नियमों में बांध कर चला रही है। उस ताकत को कोई भी नाम दिया जा सकता है और उसके अलग अलग नाम होने से कोई फर्क नही पडता।

वह परम शक्ति केवल एक है।

और यदि वह वजूद में है तो उसे जाना भी जा सकता है।  यदि उसे एक इन्सान जान सकता है तो उसे सभी इंसान जान सकते हैं। उसे जानने का “विशेषाधिकार” केवल किसी एक ही आदमी के पास नही हो सकता। विशेषाधिकार के इस तरह के दावे मुर्खतापूर्ण और स्वार्थो से भरे हैं।

भगवान को जानने के लिये इंसान को किसी बिचोलिये की जरूरत नही है।

उसे कोई भी इंसान जान सकता है, हालाँकि उसको जानने की कुछ शर्तें, कायदे या नियम तो हो सकते है। पर उस भगवान को जानने के लिए किसी भी बिचोलिये पर विश्वास करने या निर्भर रहने की जरूरत नहीं है।

कोई भी इंसान उन शर्तों को पूरा कर के खुद भगवान से मिल सकता है, उसे देख सकता है, उसे जान सकता है, उस अतिभोतिक स्तिथी को प्राप्त कर सकता है। भगवान महावीर ने यही समझाया है। भगवान बुद्ध ने यही समझाया है। भगवान कृष्ण ने यही समझाया है। भारतवर्ष में उपजे हुए सभी धर्म यही समझाते हैं।

यही सिद्धान्त आधुनिक विज्ञान भी हमे समझाता है। सत्य को जानने के लिये “प्रयोग” करना होता है; उस “प्रयोग” को कोई भी और कहीं भी कर सकता है और हर बार सत्य वही निकलेगा। कोई एक आदमी – अकेला आदमी – सत्य जानने का दावा नही कर सकता। ऐसा दावा कुदरत के नियम के खिलाफ है। कुदरत सबके साथ एक जैसा बर्ताव करती है। कुदरत कभी भी ऐसा नही करती कि केवल एक आदमी ही उसको जाने। जिसने भगवान को देख लिया है, उसके दर्शन कर लिये हैं, वह बाकी आम आदमियों के लिये एक शिक्षक तो हो सकता है, एक मार्ग दर्शक तो हो सकता है पर इससे अधिक और कुछ भी नही, फिर चाहे वह पैगम्बर हो या कोई महान सन्त महात्मा हो। भगवान बुद्ध ने तो इस बारे में यहां तक कहा है कि “अप्प दीपक भव” यानि व्यक्ति को खुद ही उस “अन्तिम सत्य” को पाना होगा, दूसरा आदमी – पैगम्बर समेत – केवल मदद कर सकता है, मार्ग दिखा सकता है।

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