अबला जीवन हाय तेरी यही कहानी! – आठ मार्च अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर विशेष


प्रभात कुमार रॉय

जंग-ए-आजादी के दौर में राष्ट्रकवि मैथलीशरण गुप्त ने आंख के आंसूओं में अपनी कलम डूबाकर इन पंक्तियों की रचना की थी

अबला जीवन हाय तेरी यही कहानी

आंचल में है दूध और आंखों में पानी !

आज़ादी के दौर में यक़ीनन यह कहानी बहुत कुछ बदल चुकी है। देश की महिलाएं सातवें आसमान में देश का झंडा गाड़कर अस्ट्रानोट कल्पना चावला बन रही हैं। किरन बेदियां बनकर नृशंस अपराधियों से लोहा ले रही हैं। अरुणा राय और मेधा पाटेकर बनकर सामाजिक अन्याय से जूझ रही हैं। रजिया सुल्तना, महारानी लक्ष्मी बाई,सरोजनी नायडू सुचेता कृपलानी, इंदिरा गांधी, प्रतिभा पाटिल जैसी राजनेता बनकर देश के सर्वोच्च पदों पर आसीन रही है। मीरा कुमार जैसी विदुषी बनकर लोकसभा की सदारत कर चुकी हैं। भारतीय महिलाएं अरुणा आसफअली,मदर टेरेसा, इंदिरा गांधी, सुब्बालक्ष्मी, लता मंगेश्कर जैसी तेजस्वी और प्रतिभाशाली होकर भारत रत्न बन चुकी है।

किंतु ऐसी भी अभागी कन्याएं अभी तक लाखों की तादाद में हैं, जो गर्भ में ही कत्ल कर दी जाती हैं। दहेज की बलिवेदी पर जिंदा जला दी जाती है। जिन पर नृशंस ढंग से तेजाब फेंक दिया जाता हैं। जिनको जबरन अपहरण करके वेश्यालयों में गर्क कर दिया जाता है। करोडों ऐसी बच्चियां है जो स्कूल तक नहीं जा पाती है। बाल मजदूरी करने के लिए अभिशप्त और मजबूर हैं। साहिर ने बड़ी मार्मिक पंक्तियां लिखी थी जो आज भी प्रासंगिक हैं

औरत संसार की किस्मत है फर भी तक़दीर ही हेठी है

अवतार पैगंबर जनती है फिर भी शैतान की बेटी है

आठ मार्च, अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर कई वर्ष पूर्व केंद्रीय सरकार ने संसद के पटल पर महिला आरक्षण विधेयक को पेश करने का संकल्प दिखाया था। किंतु देश का दुर्भाग्य ही है कि यह विधेयक संसद में लंबित पड़ा हुआ है। इस विधेयक के तहत संसद और राज्य की विधयिकाओं में महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण प्रदान करने का प्रावधान प्रस्तावित किया गया है। राज्य सभा ने इस विधेयक को पारित कर दिया है,किंतु लोकसभा के पटल पर अभी तक इसे पेश नहीं किया गया है। लोकसभा में यह विधयेक पारित हो जाएगा, अभी इसमें संशय बरक़रार है। इस विधेयक पर सब राजनीतिक दलों की सहमति अभी तक बन नहीं पाई है। लालू यादव और मुलायम सिंह की पार्टियां इस प्रस्तावित विधेयक की सदैव ही मुखर विरोधी रही हैं, क्योंकि समाजवादी पार्टी और राजद महिला आरक्षण विधेयक के तहत पिछड़ी महिलाओं को आरक्षण देने की हिमायती रही है। अर्थात आरक्षण के अंदर ही एक और आरक्षण प्रदान कर दिया जाए। भारत के पंचायती राज में महिलाओं को पचास फीसदी आरक्षण प्राप्त हो ही चुका है।

जंगे आजादी के इतिहास में राजा राममोहन राय, ईश्वरचंद्र विद्यासागर, स्वामी दयानंद और विवेकानंद ने अत्यंत मुखर तौर पर महिलाओं के सशक्तिकरण के पक्ष में अपना स्वर बुलंद किया था। स्वामी दयानंद ने प्रखर स्वर में उद्घोष किया था केवल मां ही बच्चे का प्रथम गुरुकुल होती है। यदि वह ही शिक्षित है तो समस्त परिवार शिक्षित हो जाता हैं।ब्रम्हसमाज और आर्यसमाज ने स्त्री शिक्षा के लिए अप्रतिम कार्य किया। सर्वविदित है कि सामंती काल में महिलाओं की सामाजिक दशा निरंतर ही खराब होती चली गई थी। पुर्नजागरण काल में जिसे आमतौर पर रैनेसां के नाम से जाना जाता रहा है, महिलाओं के विषय में भारतीय समाज का नज़रिया बहुत सारे सामाजिक सुधारकों की बहुत जद्दोजहद के पश्चात ही कुछ परिवर्तित हुआ । इस काल में सामाजिक रुप से यह समझा सोचा जाता रहा कि महिलाओं को का स्थान केवल घरबार तक ही सीमित रहे। बस यही बहुत है कुछ है उनके लिए। यहां तक कि सती प्रथा जैसी नंशृस सामाजिक कुप्रथा को धर्मिक तौर पर बाकायदा महिमामंडित किया गया। एक दौर विशेष के भारतीय समाज में महिलाएं और दलित दोनो ही दोयम दर्जे के नागरिक बनाए गए थे। हांलाकि इस काल में भी रजिया सुल्ताना, चांद बीबी, नूरजहा़ं, अहिल्याबाई होल्कर जैसी महिलाएं इतिहास के पटल पर उभरी, किंतु आमतौर पर ये सभी उच्च सामंती परिवारों से संबंधित रही थी। अंगे्रजी काल पर नज़र डाले तो महारानी लक्ष्मीबाई, बेगम हजरतमहल, अवंतीबाई जैसी अनेक वीरांगनाएं सन् 1857 के प्रथम स्वातंत्रय संग्राम की कयादत करती रही। इसके बाद जंग ए आज़ादी के दौर में मैडम भीकाईजी कामा, ऐनी बेसेंट, सरोजनी नायडू, कस्तूरबा गांधी, दुर्गावती, कमलादेवी चट्टोपाध्याय,  बानो जहांगीर कोयाजी, लक्ष्मी सहगल, उषा मेहता और अरुणा आसफअली जैसी अनेक मध्यवर्गीय महिलाओं ने सार्वजनिक राजनीतिक संघर्ष में बहुत बुलंदी हासिल की।

विगत 68 सालों के आजादी के दौर में पर विहंगम दृष्टिपात करें तो भारतीय महिलाओं के मध्य शिक्षा दीक्षा के क्षेत्र में गुणात्मक परिवर्तन आया है। सामाजिक बेड़ियां निरंतर टूटकर बिखर रही हैं। देश आज भी एक बहुत बहादुर प्रधानमंत्री के तौर पर इंदिरा गांधी को स्मरण करता है। भारत रत्न जैसा सर्वोच्च राष्ट्रीय सम्मान सन् 1942 की अजेय योद्वा अरुणा आसपफअली, गरीबों की मसीहा मदर टेरेसा, राजनेता इंदिरा गांधी, विरल गायिका एम एस सुब्बालक्ष्मी और लता मंगेशकर को प्रदान किया गया।

महादेवी वर्मा और सुभद्रा कुमरी चौहान जैसी विलक्षण कवियत्रियां देश में सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, जयशंकर प्रसाद और सुमित्रानंदन पंत जैसा ही सम्मान पाती है और लाखों भारतवासियों के लिए प्रबल प्रेरणा स्रोत बन जाती है। महाश्वेतादेवी, अमृता प्रीतम, अरुंधती रॉय और अनिता देसाई जैसी महान् लेखिकाएं राष्ट्रीय पटल पर उभरती हैं और भारतीय साहित्य को अत्यंत समृद्व कर जाती हैं। अमृता शेरगिल,अंजली इला मेनन जैसी पेंटर कलाकारों का सारी दुनिया लोहा मानती है। लता मंगेशकर साथ ही साथ एम.एस.सुब्बालक्ष्मी, बेगम अख्तर,गंगूबाई हंगल, गिरजा देवी, किशोरी अमोनकर, प्रभा आत्रो जैसी गायिकाएं आजादी के दौर की अमिट स्वरलहरियां बन जाती हैं। सामाजिक संघर्ष के मैदान में आईएएस का परित्याग कर अरुणा रॉय अपना इक़बाल बुलंद करती है। मेधा पाटेकर यहां वहां देशभर में अपना परचम लहराती है। सिनेमा के क्षेत्र में भी मीरा नायर, शबाना आजमी, अपर्णा सेन जैसी अनेक महिलाओं की योग्यता को समूची दुनिया ने स्वीकारा है।

वायुसेना के लड़ाकू विमानों को उड़ाती हुई महिलाओं को देखकर प्रतीत होता है कि अब नीले आसमान को छू ही लेगीं भारत की महिलाएं! हर क्षेत्र में महिलाएं बहुत कुछ हासिल कर चुकी हैं, किंतु वास्तविक मंजिल अभी भी बहुत दूर बहुत दूर है। देश की आधी अनपढ़ आबादी में अस्सी फीसदी संख्या भारतीय महिलाओं की है। गांव देहातों में बदलाव की गति अत्यंत धीमी रही है। कथित तौर पर विकसित पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में स्त्री-पुरुष आबादी के अनुपात आ चुका गंभीर असंतुलन दर्शाता है कि गर्भ में कत्ल कर दी जाने वाली कन्याओं की तादाद निरंतर गति से बढ रही है। लड़कियों के विषय में सामंती सोच अभी तक कितनी ताकतवर बनी हुई। इस सोच को पूर्णतः बदलना होगा और कन्या भ्रूण हत्या कानून का अत्यंत कड़ाई से पालन करना ही होगा। अन्यथा इस भयावह प्राकृतिक असंतुलन पर काबू पाना मुश्किल हो जाएगा। इस बारे में आर्य समाज एवं अन्य धार्मिक संगठन प्रगतिशील भूमिका निर्वाह कर सकते हैं, जिनका जनमानस पर अच्छा खासा प्रभाव है। संसद द्वारा शिक्षा को मौलिक अधिकार बना दिए जाने के पश्चात इस बात ही आशा जग चुकी है कि अब देश में कदाचित कोई बच्चा अनपढ़ नहीं रह पाएगा। देर से ही सही एक शानदार शुरुआत हुई है, बशर्ते इस पर सख़्ती अमल किया जाए और सर्वशिक्षा अभियान कहीं भ्रष्टाचार की भेंट न चढ़ जाए? जब देश की सब महिलाएं शिक्षित हो जाएगीं तब हम कह सकेगें कि अब अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाने का हमारे लिए काई मतलब है।

गुमराह नौजवान ही कत्लो-गारद अंजाम देता है !


(प्रभात कुमार रॉय)

विविधताओं से परिपूर्ण रहे भारत की अंतर्निहित शक्ति वस्तुत इसकी अनेकता में एकता के तहत ही कायम बनी रही है। धार्मिक, मजहबी,  भाषाई,  इलाकाई और सांस्कृतिक विविधता वस्तुतः भारत की आंतरिक कमजोरी का नहीं, वरन् भारत की विरल राष्ट्रीय एकता और शक्ति का अज्रस स्रोत रही है। ब्रिटिश साम्राज्यवादियों ने भारत पर आधिपत्य स्थापित करने के लिए फूट डालो और राज करो की कुटिल कूटनीति और राजनीति को अंजाम दिया था। दुर्भाग्यवश आजाद भारत में भी ब्रिटिश विरासत की कुटिल कूटनीति और राजनीति बाकायदा कायम बनी रही है। असम में बोडो आतंकवादियों के एक गिरोह द्वारा अंजाम दिए गए वहशियाना कत्ल-ओ-गारद के कारण अस्सी से अधिक बेगुनाह नागरिकों को अपनी जानें कुर्बान करनी पड़ी। भारत के पूर्वोत्तर इलाकों में एक कबीला दूसरे कबीले का आखिरकार दुश्मन क्यों बन बैठा है। भारत का बेहद गरीब इलाका रहा है पूर्वोत्तर, जहां कि बंगला देश से आए हुए घुसपैठियों की भरमार बनी रही है। नगालैंड में सन् १९५० के दशक में विद्रोहियों ने सबसे पहले अपना बगावती सर उठाया था। इसके बाद मिजोरम में बगावत का परचम बुलंद हुआ। असम के उल्फा के बागियों ने तो कत्ल-ओ-गारद की इंतहा बरपा कर दी थी। अनेक दशकों से पृथकतावादी गिरोहों ने समूचे पूर्वोत्तर पर आतंकवादी कहर बरपा किया हुआ है। अनेक बार बिगड़े हुए हालात का सामना करने के लिए भारत सरकार को फौज को उतारना पड़ा है। सदियों सदियों से पूर्वोत्तर के लोग भारतवासी रहे हैं, किंतु असम, मिजोरम, मणिपुर, नगालैंड, बोडोलैंड आदि इलाकों के बागी आतंकवादी गिरोह हिंसक ताकत के बलबूते पर भारत से पृथक होकर अपने अपने लिए नए पृथक राष्ट्र निर्मित करना चाहते हैं। इसके लिए भारतवासी होकर भी भारतवासयों को कत्ल कर रहे हैं।

कश्मीर घाटी के हालात भी किसी हद तक तकरीबन पूर्वोत्तर सरीखे रहे हैं, जहां पृथकतावाद की आतंकवादी गिरोहो ने बहुत खून खराबा कराया है. आतंकवादी गिरोहों में कश्मीरी भारतवासी की बड़ी तादाद सदैव बनी रही है, जिन्होनों कि अन्य बेगुनाह भारतवासियों को कत्ल करने में जरा सी हिचक प्रदर्शित नहीं की है। तकरीबन एक लाख से अधिक लोग कश्मीर घाटी में विगत २६ वर्षों में हलाक हो चुके हैं,जिनमें तकरीबन पिचहत्तर हजार भारतवासी और तकरीबन पच्चीस हजार पाकिस्तानी घुसपैठी आतंकवादी रहे हैं। नक्सलपंथी गिरोहों ने विगत सैंतालिस वर्षो से देश के अनेक प्रांतों में मारकाट मचाई हुई है। नक्सल हिंसा के तहत कत्ल होने वाले भारतवासियों का आंकड़ा भी दिल दहलाने वाला रहा है, तकरीबन पचास हजार लोग नक्सल हिंसा में कुर्बान चुके हैं। नक्सल हिंसा के तहत शहीद हो जाने वाले सुरक्षा बलों के जवान और अधिकारी भी किसान और मजदूरों के बेटे रहे हैंकिसी धन्नासेठ का बेटा पुलिस अथवा मिलीट्री में कदापि भरती नहीं होता है। किसान और मजदूरों के हितों की लड़ाई लड़ने का क्रांतिकारी दावा पेश करने वाले नक्सल हिंसक गिरोह वस्तुतः किसान मजदूरों के बेटों को प्रायः हलाक करते रहते हैं। आतंकवादी हिंसा में इधर का कोई नागरिक अथवा पैरा मिलिट्री फोर्स का कोई जवान मरता है और उधर का कोई नक्सल नौजवान मरता है आखिरकार मरता तो कोई भारतवासी ही है।

पूर्वोत्तर से लेकर कश्मीर घाटी तक मुखतलिफ किस्मों के अनेक आतंकवादों का बोलबाला रहा है। भारत में विभिन्न इलाकों में सक्रिय रहे पृथकतावादी आतंकवाद और भारत के १५ प्रांतों में विस्तारित हो चुकी नक्सलपंथी बगावत के आखिरकार क्या बुनियादी कारण रहे हैं। भारतीय समाज में व्यापक तौर पर सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक असंतोष व्याप्त रहा है। व्यापक सामाजिक और आर्थिक असंतोष का समुचित निदान निकाल सकने में भारतीय हुकूमतें एकदम ही नाकाम सिद्ध हुई है। गरीबी रेखा की सरहद के नीचे जीने-मरने वाले भारतवासियों को और बेरोजगार नौजवानों को किसी आतंकवादी गिरोह का सरगना अपने कथित मुक्ति युद्ध के लिए तैयार कर लेता है़। भारत में आतंकवाद की कतारों में शामिल होने वाले नौजवान वैचारिक तौर से बहुत ही कम, किंतु आर्थिक विवशताओं के कारण कहीं अधिक बर्बर आतंकवादी गिरोहों की गिरफ्त में चले जाते है। जिन नौजवानों को रोजगार हासिल नहीं होता आतंकवादी गिरोह उनको विध्वंस और मारकाट के काम पर लगा देते हैं। आतंकवाद से पूर्णत निपटना है तो भारतीय हुकूमत को बर्बर आतंकवादियों के साथ ही साथ गुरबत और बेरोजगारी से जबरदस्त लोहा लेना होगा। भारतीयों के मध्य व्याप्त भयावह आर्थिक विषमता ने नक्सल गिरोहों को गुरिल्ला जंग के लिए बहुत विशाल जमीन उपलब्ध करा दी है। पृथकतावादी दहशतगर्द गिरोह भी सामाजिक और आर्थिक अंसतोष का कुटिल फायदा उठाकर नौजवानों को अपनी आतंकवादी पांतों में भरती करते रहते हैं। भारत की सरजमीन पर जातिय और सांप्रदायिक हिंसा की पृष्ठभूमि में भी संकीर्ण धर्मान्ध सरगनाओं की सिरफिरी बातों के जाल-जंजाल में नौजवानों का फंसते चले जाना है। एक जाति और संप्रदाय के भारतवासी दूसरे संप्रदाय और जाति के भारतवासियों को घरों को और बस्तियों को जलाकर खाक कर देते हैं और अकसर एक दूसरे का वहशियाना कत्ल अंजाम देते रहते हैं।

कवि नीजर ने अत्यंत सार्थक शब्द कहे कि

तन की हवस मन को गुनाहगार बना देती है बाग के बाग को बिमार बना देती है.

भूखे पेटों को देशभक्ति सिखाने वालो भूख इंसान को गद्दार बना देती है।

भारत में तो 67 वर्ष की आजादी के बाद भी 40 करोड़ भारतवासी गुरबत की सरहद के नीचे भूखे-नंगे होने के बावजूद किसी तरह से जिंदा हैं। भारतीय संपन्न समाज और भारतीय हुकूमत ने वस्तुतः कितना आसान अवसर आतंकवादियों को उपलब्ध करा दिया कि वे कहीं तो बेराजगारों को और गरीब भारतवासियों को नक्सलपंथी बना दे और कहीं अलगाववादी दहशतगर्द बना दें। आतंकवाद की आक्रमकता में वैचारिक गुमराही के साथ साथ भूख और गुरबत का भी निरंतर सक्रिय योगदान बना हुआ है। आतंकवाद से लोहा लेने के लिए मनोवैज्ञानिक वैचारिक संग्राम के साथ ही भौतिक और शारीरिक स्तर पर भी लोहा लेना होगा

बाल्यकाल से शिक्षा-दीक्षा के माध्यम से सभी भारतवासियों को इंसानियत और देशभक्ति के प्रबल संस्कारों को प्रदान करके ही पृथकतावादी, सांप्रदायिक और जातिवादी संकीर्णता को समाप्त किया जा सकता है। सभी किस्मों और रंगढंग के आतंकवादी और जातिय एवं सांप्रदायिक नरसंहारों को भारत की धरा से खत्म करना है तो विभिन्न वर्गों के मध्य विद़्यमान घनघोर आर्थिक और सामाजिक विषमताओं को अत्यंत कम करना होगा। आर्थिक विषमताओं के मध्य में इलाकाई विकास विषमताएं भी भारत भर में अति विशिष्ट बनी रही है। सभी तौर तरीके वाले देशद्रोही दहशतगर्द तत्वों को पूरी तरह से धराशाही करना होगा। इंसानियत से परिपूर्ण देशभक्ति को भारत की तर्ज-ए-जिंदगैी बनाना होगा। जंग-ए-आजादी के योद्धाओं के क्रांतिकारी पैगामों को युवी पीढ़ी तक पहुंचाना होगा, ताकि वे उन तमाम देशभक्त और राष्ट्रवादी संस्कारों से लैस हो सकें, जिनको दौर ए आजादी में दुर्भाग्यवश तिलांजली दे दी गई है। भौतिक समृद्धि और विकास को ही सबकुछ सफलता समझने वाली पूंजीवादी और बाजारपरस्त विनाशकारी अपसंस्कृति से कड़ा लोहा लिए बिना भारत के नौजवानों को गुमराह होने से कदापि नहीं रोका जा सकता है। गुमराह होकर ही नौजवान वस्तुतः आतंकवादी बन जाते हैं। फिर वो गुमराह नौजवान नक्सलपंथी बन जाए, कश्मीरी दहशतगर्द बन जाए अथवा पूर्वोत्तर के आतंकवादी बन जाए। नौजवानों की गुमराही के लिए आखिर समूचे समाज और हुकूमत को क्योंकर जिम्मेदार नहीं करार दिया जाता है ?

(पूर्व सदस्य नेशनल सिक्योरिटी एजवाईजरी कॉऊंसिल)

आज का भारत और फिरकापरस्त ताकतें


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